वल्लभभाई पटेल: एक विरासत का विरूपण और उसे हड़पने का प्रयास -नेहा दाभाड़े

4:23 pm or February 28, 2018
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वल्लभभाई पटेल: एक विरासत का विरूपण और उसे हड़पने का प्रयास

नेहा दाभाड़े

ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के विचार और कार्य जटिल होते हैं और अक्सर वे उस काल की उपज हुआ करते  हैं, जिसमें वे इस धरती पर रहते और काम करते थे। सरदार वल्लभभाई पटेल भी इसका अपवाद नहीं हैं। वल्लभभाई पटेल को अक्सर भारत का लौह पुरूष कहा जाता है और उन्हें स्वतंत्रता के बाद के भारत, जो अनेक रियासतों का अनगढ़ समूह था, को एक राष्ट्र का स्वरूप देने का श्रेय दिया जाता है। पटेल, स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री थे। भारत के विभाजन और गांधीजी की हत्या के उस कठिन और उथलपुथल भरे दौर में देश के नेतृत्व को भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक राष्ट्र बनने की राह पर ले जाना था। उस दौर में नेहरू, पटेल और देश के अन्य शीर्ष नेताओं को कई कठोर और कठिन निर्णय लेने पड़े। इनमें से एक था आरएसएस पर प्रतिबंध। इस निर्णय को लेने और उसे अमली जामा पहनाने की पहल सरदार पटेल ने की थी। यह विडंबनापूर्ण है कि उन्हीं सरदार पटेल की विरासत पर आज आरएसएस-भाजपा कब्जा करना चाहते हैं और ऐसा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं मानो पटेल, राजनीति के संघी ब्रांड के समर्थक थे। दूसरे शब्दों में, पटेल हिन्दुत्ववादी थे। नेहरू का यह कहकर मखौल बनाया जाता है कि वे एक कमजोर रीढ़ वाले नेता थे और देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार थे। नेहरू और पटेल को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बताया जा रहा है और दोनों की अनुचित तुलना की जा रही है। इस तथ्य को तव्वजो नहीं दी जा रही है कि इन दोनों नेताओं ने देश के भविष्य का जो खाका खींचा था, वह एक-सा था और दोनों एक-दूसरे पर अटूट विश्वास करते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पटेल को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केन्द्र में लाते हुए कहा कि ‘‘यदि वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते, तो मेरे कश्मीर का एक हिस्सा आज पाकिस्तान के कब्जे में न होता‘‘। भाजपा और आरएसएस स्वयं को पटेल का विचारधारात्मक उत्तराधिकारी साबित करने में जुटे हुए हैं। पटेल की एक विशाल मूर्ति, जिसे ‘स्टैच्यू  ऑफ़ यूनिटी‘ का नाम दिया गया है और जिसके बारे में यह दावा किया जा रहा है कि पूरी तरह बन जाने के बाद वह विश्व का सबसे ऊँचा स्मारक होगी, के निर्माण की परियोजना की आधारशिला प्रधामंत्री मोदी ने रखी थी। पटेल के जन्मदिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ‘‘पटेल का कद कम करने और उनके योगदान को विस्मृत करने के प्रयास किए जाते रहे हैं परंतु सरदार तो सरदार थे। चाहे कोई सरकार या कोई पार्टी उनके योगदान को मान्यता दे अथवा नहीं, परंतु यह देश और उसके युवा उन्हें नहीं भुला सकते‘‘। इसी तरह, उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू ने भी पटेल की प्रशंसा में कसीदे काढ़े। ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर जननेताओं को हड़पना, आरएसएस की पुरानी रणनीति रही है। अंबेडकर और भगतसिंह के मामले में भी ऐसा करने का प्रयास किया गया। इसलिए यह आवश्यक है कि हम पटेल के बारे में सही तथ्यों को जाने और समझें।

यद्यपि पटेल, और आरएसएस के साथ उनके समीकरणों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, तथापि पटेल जैसे राष्ट्रनायकों को हड़पने के आक्रामक प्रयासों की पृष्ठभूमि में, निम्न बिंदुओं को दुहराना और उन पर जोर देना आवश्यक है। परंतु इसके पहले हमें यह समझना होगा कि ऐतिहासिक व्यक्तित्व बहुआयामी होते हैं और उन्हें उनकी पूरी जटिलताओं के साथ समझना काफी कठिन होता है। परंतु पटेल के बारे में निम्न तथ्य निर्विवाद हैं:

  1. पटेल, महात्मा गांधी के अनन्य प्रशंसक थे। महात्मा गांधी की हत्या से उन्हें गहरा दुःख पहुंचा था। वे जीवन भर पक्के कांग्रेसी रहे, यद्यपि विभाजन के पहले और उसके बाद हुई साम्प्रदायिक हिंसा में सिक्खों और हिन्दुओं को जो भोगना पड़ा, उसके कारण उनके मन में इन समुदायों के प्रति सहानुभूति थी।
  2. यद्यपि वे एक समुदाय के रूप में मुसलमानों पर अविश्वास करते थे क्योंकि मुसलमानों के एक तबके ने मुस्लिम लीग का साथ दिया था, तथापि देश के गृहमंत्री की हैसियत से वे समाज के सभी वर्गों की रक्षा करने के प्रति प्रतिबद्ध थे और उन्होंने कभी मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा को न तो प्रोत्साहन दिया और ना ही उसे सही ठहराया।
  3. सरदार पटेल, आरएसएस के समर्थक नहीं थे और वे हिन्दुत्व की राजनीति, जो संकीर्ण, भेदभाव करने वाली और श्रेष्ठतावादी है, के पैरोकार नहीं थे।

दक्षिणपंथी कई अलग-अलग कारणों से पटेल को हड़पना चाहते हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि आरएसएस ने देश के स्वधीनता संग्राम में कोई भूमिका नहीं निभाई थी। आरएसएस के सदस्य न तो स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जेल गए और ना ही उसके नेतृत्व की स्वतंत्रता पूर्व के किसी सामाजिक आंदोलन में कोई हिस्सेदारी थी – चाहे वह आंदोलन किसानों का हो, ट्रेड यूनियनों का या हिन्दू पारिवारिक कानूनों में सुधार और जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए। स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाना तो था ही, परंतु इसके साथ-साथ वह कई सार्वभौमिक मूल्यों का प्रतीक भी था। इनमें शामिल थे समानता, बहुवाद, प्रजातंत्र और समावेशीकरण। इसका लक्ष्य सिर्फ विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकना नहीं था। इसका लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना भी था जो जाति, धर्म और वर्ग आधारित ऊँचनीच से मुक्त हो। चूंकि पटेल, कांग्रेस के शीर्षतम नेताओं में से एक थे इसलिए आरएसएस उन पर कब्जा कर अपनी स्वीकार्यता  को बढ़ाना और अपने जनाधार को विस्तार देना चाहता है। दूसरे, नेहरू और पटेल के बीच तथाकथित मतभेदों का ढिंढोरा पीटकर वह समाज और राष्ट्र के संबंध में नेहरूवादी दृष्टिकोण की साख गिराना चाहता है क्योंकि यह दृष्टिकोण, हिन्दुत्ववादियों की सोच का धुर विरोधी है। हिन्दू श्रेष्ठतावादी, नेहरू का कद घटाकर भारत में जातिगत पदक्रम पर आधारित समाज की स्थापना करना चाहते हैं।

भाजपा नेताओं के बयानों और उनके भाषणों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सबसे पहले बेहतर यह होगा कि हम जानें कि पटेल, आरएसएस के बारे में क्या सोचते थे।

‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि आरएसएस ने हिन्दू समुदाय की सेवा की है। जहां मदद और संगठन की जरूरत थी, वहां आरएसएस ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा करने के लिए प्रयास किए। किसी भी समझदार व्यक्ति को इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। परंतु उसकी गतिविधियों का आपत्तिजनक पहलू यह था कि बदले की आग में जलते हुए उसके सदस्यों ने मुसलमानों पर हमले करने शुरू कर दिए। हिन्दुओं को संगठित करना और उनकी मदद करना एक बात है और हिन्दुओं ने जो दुःख भोगे, उनका बदला निर्दोष पुरूषों, महिलाओं और बच्चों से लेना दूसरी बात ।‘‘

गांधीजी की हत्या के बाद उन्होंने अपनी पीड़ा और क्षोभ को छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया।

‘‘उनके सभी भाषण साम्प्रदायिकता के जहर से भरे हुए थे। हिन्दुओं की रक्षा करने और उन्हें संगठित करने के लिए कतई यह आवश्यक नहीं था कि इस तरह का जहर फैलाया जाए। इस जहर का अंतिम नतीजा यह हुआ कि देश को गांधीजी के बेशकीमती जीवन से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद सरकार और जनता, दोनों के मन में आरएसएस के प्रति तनिक भी सहानुभूति नहीं बची। बल्कि उसका विरोध बढ़ता गया और यह विरोध तब बहुत तीव्र हो गया जब आरएसएस के लोगों ने गांधीजी की हत्या पर प्रसन्नता व्यक्त की और मिठाईयां बांटीं। ऐसी परिस्थितियों में सरकार के लिए आरएसएस के खिलाफ कार्यवाही करना अपरिहार्य हो गया।

‘‘जहां तक आरएसएस और हिन्दू महासभा की गांधीजी की हत्या में भूमिका का प्रश्न है, चूंकि यह प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए मैं इन दोनों संगठनों की भूमिका के संबंध में कुछ कहना नहीं चाहता। परंतु हमें प्राप्त रपटें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संगठनों, विशेषकर पहले, की गतिविधियों के चलते देश में ऐसा वातावरण बना जिसके कारण यह भयावह त्रासदी संभव हो सकी। मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि हिन्दू महासभा का अतिवादी तबका इस षड़यंत्र में षामिल था। आरएसएस की गतिविधियां,सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं। हमें मिल रही रपटों से यह साफ है कि प्रतिबंध के बावजूद ये गतिविधियाँ बंद नहीं हुईं हैं। बल्कि जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा है, आरएसएस के तेवर और अवज्ञापूर्ण हो रहे हैं और वह और जोरशोर से अपनी विध्वंसक गतिविधियां कर रहा है‘‘।

पटेल के इस उद्धरण से साफ है कि वे आरएसएस की नफरत की राजनीति और मुसलमानों को निशाना बनाने की उसकी प्रवृत्ति के विरोधी थे। उन्होंने गांधीजी की हत्या की निंदा की थी और उस राजनीति की भी, जिसके चलते बापू को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसके विपरीत, आरएसएस ने कभी गांधीजी की हत्या की निंदा नहीं की और उल्टे वह उनके हत्यारे गोड़से के मंदिर बनवाता रहा है।

इस उद्धरण से यह भी स्पष्ट है कि भविष्य के भारत को पटेल किस रूप में देखते थे। एक पक्के कांग्रेसी और गांधीजी के अनुयायी होने के नाते, वे भारत की प्रगति और उसकी समृद्धि में सभी समुदायों के योगदान के कायल थे। यह तथ्य कि उन्होंने बिना एक बूंद खून बहाए, दर्जनों रियासतों को भारतीय संघ का हिस्सा बनाने में सफलता प्राप्त की और भारतीय उपमहाद्वीप को अनेकानेक टुकड़ों में बंटने से बचाया, इस तथ्य का द्योतक है कि वे भारत को विभिन्न समुदायों, संस्कृतियों और धर्मों के लोगों का देश मानते थे। बहुवाद और प्रजातंत्र उन्हें बहुत प्रिय थे। उनकी यह सोच भी हिन्दुत्ववादियों की इस मान्यता से बिल्कुल उलट है कि केवल हिन्दू ही भारत के असली नागरिक हैं और दूसरे धर्मों के लोग ज्यादा से ज्यादा यहां दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रह सकते हैं।

परंतु यह कहना भी सही नहीं होगा कि पटेल के विचारों में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे गलत या अनुचित ठहराया जा सके। वे मुसलमानों पर कुछ हद तक अविश्वास करते थे और इसका कारण यह था कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों के एक तबके का समर्थन हासिल था। स्पष्टतः, केवल इस कारण सभी मुसलमानों पर अविश्वास करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस का समर्थक भी था और द्विराष्ट्र सिद्धांत को सिरे से खारिज करता था। सरदार पटेल की कई नीतियों की आलोचना की जाती है और की जानी चाहिए। उदाहरणार्थ, उनके द्वारा बनाया गया ‘इवेक्विीज प्रापर्टी लॉ‘ (भारत छोड़कर जाने वालों की संपत्ति के संबंध में कानून), जिसके तहत मुसलमानों के व्यापार-व्यवसाय, उद्योग, दुकानें, मकान, जमीनें और समस्त चल व अचल संपत्ति को सरकार को अपने कब्जे में लेने का अधिकार मिल गया था। यह कानून उन लोगों पर भी लागू होता था, जिनके संबंध में पुलिस को यह संदेह था कि वे पाकिस्तान में बसने का इरादा रखते हैं। परंतु यह कानून राजनैतिक मजबूरियों के चलते बनाया गया था और पाकिस्तान द्वारा ऐसा ही कानून बनाए जाने की प्रतिक्रिया था। इसी तरह, भारत द्वारा लागू की गई परमिट प्रणाली भी अन्यायपूर्ण थी, जिसके तहत 15 अगस्त 1947 के बाद पाकिस्तान की यात्रा पर जाने वाले मुसलमानों की भारत की नागरिकता खतरे में पड़ जाती थी।

इन कदमों पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा सकते हैं परंतु इनसे कतई यह सिद्ध नहीं होता कि पटेल साम्प्रदायिक थे या वे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का अपने राजनैतिक या चुनावी हितों की खातिर समर्थन करते थे। हिन्दू श्रेष्ठतावादी, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और नफरत इसलिए फैलाते हैं ताकि उसके नतीजे में होने वाले साम्प्रदायिक धु्रवीकरण से उनको चुनावों में लाभ हो। इस महत्वपूर्ण अंतर पर पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है। देश के गृहमंत्री के रूप में अपने संवैधानिक कर्तव्यों से पटेल अच्छी तरह से वाकिफ थे और उनकी यह स्पष्ट मान्यता थी कि भारत एक हिन्दू राज्य नहीं है और यहां सभी नागरिकों को सुरक्षा पाने का समान अधिकार है। ‘‘मैं नहीं समझता कि भारत को एक हिन्दू राज्य, जिसका राज्यधर्म हिन्दू है, माना जा सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में कई अल्पसंख्यक समुदाय हैं जिनकी सुरक्षा हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है‘‘, उन्होने कहा था।

यह पटेल की प्रशंसा में गीत गाने वाली वर्तमान सरकार के दृष्टिकोण से एकदम भिन्न है। हमारे देश की वर्तमान सरकार, स्व-नियुक्त देशभक्तों और गौरक्षकों को अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा और नफरत फैलाने की खुली छूट दे रही है। गौहत्या के मनगढ़ंत आरोप लगाकर, मुसलमानों और दलितों की जान ली जा रही है। हमारा राजनैतिक नेतृत्व ऐसे लोगों को ‘अतिवादी‘ बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का प्रयास कर रहा है। एक जिम्मेदार और प्रजातान्त्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध राजनेता के बतौर, पटेल की ऐसे मामलों में बहुत स्पष्ट नीति थी। आज जहां घृणा-जनित अपराधों की देश में बाढ आई हुई है, वहीं पटेल ऐसे मौकों पर स्वयं हिंसाग्रस्त इलाकों में जाते थे और मुसलमानों की रक्षा करने और अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए प्रभावी प्रयास करते थे। एक बार जब गुंडों की भीड़ ने दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया की दरगाह को घेर लिया तो वे स्वयं वहां गए और पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिया कि वहां मौजूद मुसलमानों की रक्षा ही जानी चाहिए और दरगाह को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि ‘‘अगर आपको ऐसा लगता है कि आप वफादार मुसलमानों को केवल इसलिए परेशान करते रह सकते हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं तो हमारी स्वाधीनता का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा‘‘।

आज गौरक्षा को राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है और बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर के निर्माण को राष्ट्रवादी एजेंडा घोषित कर दिया गया है। सरदार पटेल का बाबरी मस्जिद के मामले में अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण था। वे इस समस्या का हल परस्पर चर्चा से निकालने के पक्षधर थे। सन् 1949 में एक भीड़ ने बाबरी मस्जिद को घेर लिया और मुअज्जिन (अजान देने वाले) को खदेड़कर वहां रामलला की एक मूर्ति स्थापित कर उसे हिन्दू मंदिर घोषित करने का प्रयास किया। इस घटना के एक माह के भीतर, पटेल ने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंदवल्लभ पंत को एक पत्र लिखकर कहा कि ‘‘इस तरह की समस्याओं का हल बलप्रयोग से निकालने का कोई सवाल ही उपस्थित नहीं होता‘‘। उन्होंने लिखा, ‘‘इस तरह के मसलों का शांतिपूर्ण हल निकाला जा सकता है यदि हम मुसलमानों को विश्वास में लेकर उनकी सहमति से कोई कदम उठाएं‘‘। स्पष्टतः पटेल का यह रूख, 1992 में बाबरी मस्जिद में जो कुछ हुआ, उसके एकदम विपरीत था।

प्रधानमंत्री का ताजा बयान, जिसमें उन्होंने कश्मीर के मुद्दे पर पटेल और नेहरू की परस्पर विरोधाभासी नीति की चर्चा की है, भी पटेल की विरासत को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पटेल का व्यक्तित्व, नेहरू से अलग था। उनकी अपनी पसंद-नापसंद थीं, अपना स्वभाव था और अपने पूर्वाग्रह थे। परंतु निश्चित तौर पर वे साम्प्रदायिक या संकीर्ण नहीं थे। वे एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जिसमें सभी नागरिकों को बराबर हक हासिल हों। गांधी, नेहरू और अंबेडकर की तरह उनके सपनों का भारत भी समानता पर आधारित था। उन्होंने बारडोली और अन्य स्थानों पर किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। अगर हिन्दू श्रेष्ठतावादी पटेल के बताए रास्ते पर चलना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले न्याय और समानता के लिए लड़ाई शुरू करनी चाहिए। तथ्य यह है कि विचारधारा के स्तर पर पटेल और संघ परिवार में तनिक भी समानता नहीं है। संघ परिवार का एकमात्र लक्ष्य, धर्म और जाति की दीवारों को और ऊँचा व और मजबूत बनाना है।

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