अब क्या मिसाल दूं…

12:48 pm or June 2, 2014
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विवेकानंद-

रेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही दो ऐसे काम किए, जिनको लेकर बीजेपी पूरे 10 सालों तक झंडा उठाए रही। पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हुए हमलों के कारण बीजेपी लगातार यूपीए सरकार पर कमजोर होने का आरोप लगाती रही। पाकिस्तान उसे फूटी आंख नहीं सुहाता था। किसी पाकिस्तानी नेता को बुलाना तो दूर उससे बात करना भी बीजेपी को पसंद नहीं था। पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा धोखे से भारतीय सैनिकों के सिर काटने के बाद तो बीजेपी ने भारत की तत्कालीन सरकार को कायर ही करार दिया। कुछ उत्साही बीजेपी नेता तो युध्द तक की बात करने लगे थे। बहरहाल इन घटनाओं का विरोध होना ही चाहिए था। बीजेपी ने कुछ अलग तरीके से किया यह और बात है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी जब अपनी निजी यात्रा पर भारत आए तब बीजेपी नेताओं ने कैसे-कैसे बयान दिए आज तक लोगों के जहन में हैं। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और बीजेपी पाकिस्तानी बर्बरता, धोखे और भारत की नरमी को निशाना बनाती रही। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर होने का तमगा दे दिया। यह तब किया गया जबकि मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान का कई बार आया न्यौता भी ठुकरा दिया। क्योंकि भारतीय सैनिकों के साथ बर्बरता हुई थी। एक भारतीय प्रधानमंत्री की इतनी सख्ती के बाद भी बीजेपी उन्हें कमजोर कहती रही और यह प्रचारित करती रही कि बीजेपी के विरोध के डर के कारण मनमोहन सिंह पाकिस्तान नहीं गए। उसी बीजेपी ने सत्ता में आते ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए लाल कालीन बिछा दिया। अब बीजेपी को न सरबजीत की बेटी का अनाथ होना दिखा, न उसकी बहन के आंसू दिखाई दिए और न ही धर्मवती की चीखें सुनाई दीं जिसके पति का सिर पाकिस्तान के कायर सैनिक धोखे से काट ले गए थे। इसके लिए तर्क दिए जा रहे हैं कि हम पड़ोसी नहीं बदल सकते। निश्चित तौर पर यह सही बात है कि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते और संबंधों को सुधारने के लिए बातचीत सबसे अच्छा रास्ता है।

यह भी सही है कि भारत-पाकिस्तान में किसी न किसी वक्त बातचीत होनी ही है और होनी ही चाएि। इसके लिए दोनों ओर की सरकारों को ही प्रयास करना ही होगा। लेकिन आपके प्रयास सकारात्मक कोशिशें और दूसरे के प्रयास कायराना, नहीं हो सकते। बातचीत का यह रास्ता बीजेपी को तब बुरा क्यों लग रहा था जब यूपीए की सरकार थी। क्या बीजेपी के सत्ता में आते ही मुंबई हमलों के शिकार हुए परिजनों के जख्म भर गए? क्या धर्मवती के पति का सिर प्रकट हो गया या सरबजीत वापस जिंदा हो गए। ऐसा कुछ नहीं हुआ है। जाहिर है कि बीजेपी चुनाव से पहले एक सूत्रीय फार्मूले पर चल रही थी कि यूपीए सरकार को बदनाम किया जाए। बीजेपी अब पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते चाहती है, लेकिन तब उसके पेट में दर्द होता था जब मनमोहन सिंह कहते थे कि अगर अपने कार्यकाल में सिर्फ भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को बेहतर करने में कामयाब हो गया तो समझूंगा कि कार्यकाल का मकसद हासिल कर लिया है। दूसरी बात मोदी के न्यौते पर नवाज ने भारत आकर ऐसा कौन सा वादा कर दिया, जिसे मोदी की कूटनीतिक सफलता माना जाए। क्या वे मुंबई हमलों के आरोपियों को सजा दिलाने का पुख्ता वादा ले सके। क्या वे यह वादा ले सके कि अब सीमा पर से घुसपैठ नहीं होगी और शांति समझौते का उल्लंघन नहीं होगा। और खुद मोदी ने शरीफ से ऐसा क्या कह दिया जिसका उन पर कोई असर दिखाई दे। नवाज शरीफ ने मोदी ने जो भी वादे किए हैं, और मोदी ने जो भी उनसे कहा है, इससे पहले भी शरीफ यह वादे कई बार कर चुके हैं, और भारतीय प्रधानमंत्री यही मांगे करते रहे हैं। पिछले साल सितंबर में अमेरिका में जब मनमोहन सिंह से यही नवाज शरीफ मिले थे तब भारत की ओर से आतंकवाद सहित कई अहम मुद्दों को उठाया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि था कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नवाज शरीफ से कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए। मेनन ने यह भी बताया था कि प्रधानमंत्री मनमोहन ने नवाज के सामने मुंबई हमले का मुद्दा उठाया है। जिस पर पाक पीएम ने मनमोहन को भरोसा दिलाया कि मुंबई हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। हमले के दोषियों पर कार्रवाई होगी। सितंबर से अब तक आठ माह गुजर गए और पाकिस्तानी हुक्मरान अपने वादे को लेकर आठ कदम तक नहीं चले। शरीफ के इस दौरे से पहले भी आतंकियों के आका और मुंबई हमलों के गुनहगार हाफिज सईद ने भारत के खिलाफ जमकर जहर उगला। तब कैसे माना जाए कि पाकिस्तान अपने वादों पर खरा उतरेगा। नमो-नमाज में अटलजी द्वारा छोड़ी गई बात से आगे बात शुरू करने की सहमति बनी है, लेकिन मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी ही जमीन कारगिल में अपने ही सैकड़ों सैनिकों की कुर्बानी के पीछे इन्हीं नवाज शरीफ का हाथ था और यही नमाज शरीफ कश्मीर को लेकर के प्लान बनाए बैठे हैं, जिसे मीडिया ने एक वक्त पर जमकर दिखाया।

दूसरे फैसले की बात करें तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। बीजेपी हमेशा यही कहती रही कि मनमोहन सिंह जनता के बीच जाने का कभी साहस नहीं दिखा पाए। सोनिया गांधी की कृपा से वे प्रधानमंत्री बने हैं। यह ठीक बात है। लेकिन अब मोदी ने क्या किया। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही ऐसे लोगों को मंत्री बना दिया जो जनता द्वारा नकारे गए हैं। स्मृति ईरानी अमेठी से चुनाव हारी हैं और अरुण जेटली अमृतसर से चुनाव हारे हैं, बावजूद इसके उन्हें महत्वपूर्ण मंत्रालय मोदी सरकार में दिए गए हैं। निश्चित तौर पर योग्यता डिग्रियों की मोहताज नहीं होती, लेकिन अनुभव हर जगह मायने रखता है। क्या बीजेपी के जीत कर ढेरों सांसदों में ऐसा कोई युवा नहीं था जो इस मंत्रालय के योग्य हो। जाहिर है यह मनमानी है। सही कहें तो शायद यह दिखाने का प्रयास कि मोदी के सामने जनता के नुमाइंदों की नहीं उनकी ही हैसियत है जो उनकी बिरुदाबली गाते रहे हैं। इसका एक और मकसद यह भी हो सकता है कि मोदी राहुल गांधी और अमरिंदर को नीचा दिखाना चाहते हैं कि देखिए आपके सामने जिन्हें जनता ने नकार दिया उसे हमने सिर पर बैठा लिया। आपसे पराजित होने के बाद भी उनका कद हमने ऊंचा कर दिया। सबसे ताजुब की बात की मीडिया में मोदी के हर फैसले को सकारात्मक बताने की होड़ मची हुई है। आखिर इसमें क्या सकारात्मक है कि जीत कर आए युवाओं को छोड़कर पराजित लोगों को मंत्री बनाया जाए। और इसमें क्या सकारात्म हो सकता है कि शहीदों के परिवार धरने पर बैठे रहें और बार-बार देश के साथ धोखा करने वाले मुल्क के प्रधानमंत्री की मेहमाननबाजी करें।

दरअसल बीजेपी का रवैया सदैव ऐसा ही रहा है। जब उसने 2009 में सत्ता संभाली थी, तब उन्हीं कार्यक्रमों और नीतियों को आगे बढ़ाया था जिनका विपक्ष में रहते हुए वह घोर विरोध करती रही थी। करीबियों को लाभ पहुंचाने के लिए पिछली सरकार ने भी कुछ ऐसे ही निर्णय लिए थे। पिछली सरकार जिस गति को प्राप्त हुई थी वह सबको पता है। देखना यह है कि मोदी को कौशल कहां तक और कितना कारगर सिध्द होता है। चलते-चलते एक और चर्चा जरूरी है। चुनाव प्रचार के दौरान ओर वोट पड़ने के बाद मीडिया में कई लोग गुजरात से आए और मोदी का गुणगान करते रहे। एक महाशय तो इतना आगे बढ़ गए कि रात दो-दो बजे तक लोगों के बेहिचक घूमने की बातें करते नजर आए। इन महोदय का कहना था कि मुस्लिम क्षेत्रों में हिंदू महिलाएं और हिंदू बहुल क्षेत्र में मुस्लिम महिलाएं रात को दो-दो बजे निसंकोच घूमती हैं। गुजरात के विकास और कानून व्यवस्था को लकर ऐसे कसीदे पढ़े गए कि मानो गुजरात स्वर्ग है, वहां रामराय है। लेकिन दो घटनाओं ने गुजरात की पोल खोल दी, जिसे मीडिया ने दिखाने से परहेज बरता। पहली घटना आसाराम बापू के खिलाफ गवाही देने वाले को सरेआम कोर्ट में गोली मार दी गई। और दूसरी घटना उसी अहमदाबाद में हुई जहां की कानून व्यवस्था की मिसाल दी जा रही थी। अहमदाबाद में मोदी की शपथ के मात्र एक दिन पहले दो समुदायों के बीच हुए सघर्ष हुआ जिसमें दर्जनों लोग घायल हुए और कई वाहनों को आग लगा दी गई। अहमदाबाद के जॉइंट पुलिस कमिश्नर मनोज शशिधर के मुताबिक लोगों ने एक दूसरे पर फायरिंग भी की।

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