‘आर्ट आफ लिविंग’ वाकई ! -सुभाष गाताडे

6:16 pm or March 15, 2018
Lucknow: Art of Living founder Sri Sri Ravi Shankar in Lucknow on Wednesday. PTI Photo by Nand Kumar(PTI11_15_2017_000092A)

‘आर्ट आफ लिविंग’ वाकई !

  • सुभाष गाताडे

श्री श्री रविशंकर इन दिनों सूर्खियों में हैं। / अलबत्ता फिर एक बार गलत वजहों से/

चन्द रोज पहले एक न्यूज चैनल ‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए उन्होंने एक किस्म की अंधकारमय भविष्यवाणी प्रस्तुत की कि अगर मंदिर मसले का समाधान जल्द नहीं किया गया तो भारत सीरिया बन सकता है। मालूम हो कि सीरिया विगत कुछ वर्षों से ग्रहयुद्ध का शिकार है , जिसमें लाखों लोग मारे जा चुके हैं। उनका कहना था:

‘‘अगर अदालत मंदिर के खिलाफ निर्णय सुनाती है तो रक्तपात होगा। क्या आप सोचते हैं कि हिन्दू बहुमत इससे राजी होगा ? वह मुस्लिम समुदाय के खिलाफ असन्तोष को हवा देंगे। ^^(http://zeenews.india.com/india/aimim-leader-files-complaint-against-sri-sri-ravi-shankar-for-syria-in-india-comments-on-ayodhya-issue-2087781.html)

जैसे कि उम्मीद की जा सकती है कि इन ‘‘भडकाउ बयान’’ के लिए उनकी काफी भत्र्सना हुई और इस बात को मददेनज़र रखते हुए कि उनका यह बयान ‘‘सम्प्रदायों में तनाव’’ ;कपेंििमबजपवद इमजूममद बवउउनदपजपमेद्ध को बढ़ावा दे सकता है, देश के अलग अलग हिस्सों में उनके खिलाफ पुलिस में शिकायतें भी दर्ज हुईं। /वही, ] https://www.siasat.com/news/complaint-lodged-against-sri-sri-jamia-nagar-police-station-1327144/)

अधिक विचलित करनेवाली बात यह थी कि न ही बयान से उपजा गुस्सा और न ही पुलिस में दर्ज शिकायत का अयोध्या मामले के इन ‘‘स्वयंभू’’ मध्यस्थ कहे जानेवाले इन आध्यात्मिक गुरू पर कोई असर हुआ और मध्यप्रदेश के जबलपुर में भी रिपोर्टरों से गुफतगू करते हुए उन्होंने अपने इसी विवादास्पद बयान को दोहराया। और यह कहने के लिए अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की बात की। निश्चित ही वहां मौजूद किसी ख़बरनवीस ने उनसे यह पूछने की जुर्रत नहीं की कि क्या संविधान द्वारा तय मर्यादाओं का उल्लंघन या तयशुदा कानूनी विधानों की अनदेखी भी इसी दावे में शुमार की जा सकती है । (https://www.theweek.in/news/india/2018/03/08/sri-sri-reiterates-india-syria-ayodhya-not-resolved.html) क्या श्री श्री को नहीं पता होगा कि जहां तक ऐसे बयानों की बात है तो उनके बारे में कानून बिल्कुल स्पष्ट है। भले उनके अमल पर कोताही नज़र आए।

भारत के कानूनों के तहत धर्म के आधार पर दो समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाना एक आपराधिक कार्रवाई है। भारतीय दंड विधान की धारा ‘‘दंगा फैलाने की नियत से भडकाउ कार्रवाई करने के लिए ’8 /सेक्शन 153 / ; धर्म के आधार पर दो समुदायों के बीच शत्राुता को बढ़ावा देने के लिए / धारा 153 ए/; ‘‘राष्टीय एकता को बाधा पहुंचाने वाले वक्तव्यों, बयानों /153 बी/ ; ‘‘ऐसे शब्दों का उच्चारण जिनके जरिए दूसरे व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को आहत करना ’’ /सेक्शन 298 / ; ‘‘सार्वजनिक शांति व्यवस्था को बाधित करने वाले वक्तव्य / सेक्शन 505 /1/, बी और सी/ और ‘‘अलग अलग तबकों के बीच नफरत, दुर्भावना और दुश्मनी पैदा करनेवाले वक्तव्य /सेक्शन 505/2/; भारतीय दंड विधान की सेक्शन 153 ए या बी का किसी व्यक्ति द्वारा किया जा रहे उल्लंघन के खिलाफ कार्यकारी दंडाधिाकरी को कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है।

अगर हम आध्यात्मिक गुरू के बयान को बारीकी से देखेंगे तो पता चलेगा कि अगर उनके खिलाफ दायर शिकायतों को प्रथम सूचना रिपोर्टों की शक्ल प्रदान की गयी तो उनके लिए कानूनी पचड़ों से बच निकलना आसान नहीं रहेगा। एक कार्यकर्ता जिसने दिल्ली के थाने में शिकायत दर्ज की है उसने कहा कि ‘अगर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी तो वह अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाएंगे।’ (https://www.siasat.com/news/complaint-lodged-against-sri-sri-jamia-nagar-police-station-1327144/)

कोई पूछ सकता है कि आखिर ऐसे विवादास्पद बयान देने का साहस लोग कैसे करते हैं। दरअसल ऐसे लोगों पर क्या कार्रवाई होती है वह इस बात से तय होता है कि सत्ता से उनकी कितनी नजदीकी है।

ऐसे तमाम उदाहरण दिखते हैं जब ऐसे लोग जिनकी दक्षिणपंथी विचारों के प्रति सहानुभूति जगजाहिर है वह बेधड़क ऐसे भडकाउ बयान देते जाते हैं और उनका कुछ नहीं होता।  (https://www.deccanchronicle.com/nation/crime/251217/telangana-case-against-bjp-mla-for-hate-speech.html)

बहुत अधिक वक्त नहीं हुआ जब भाजपा से जुड़े तमिलनाडु के पूर्व विधायक एच राजा अचानक सूर्खियों में आए, जब  त्रिपुरा के चुनावों के बाद हिन्दुत्व वर्चस्ववादी ताकतों ने लेनिन की एक मूर्ति तोड़ी थी और उसी समय उन्होंने फेसबुक पर लिखा:

‘‘ लेनिन कौन होता है ? भारत के साथ उसका ताल्लुक क्या है ? भारत के साथ कम्युनिस्टों का क्या सम्बन्ध है ? लेनिन की मूर्ति को त्रिपुरा में तबाह कर दिया गया। आज लेनिन की मूर्ति, कल तमिलनाडु के ई वी आर रामस्वामी की मूर्ति।“

रामस्वामी पेरियार की तमिलनाडु में अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि सभी द्रविड पार्टियां – चाहे अण्णाद्रमुम और द्रमुक तथा अन्य उनके योगदानों के प्रति नतमस्तक रहती हैं। डा अम्बेडकर ने जिस तरह महाराष्ट तथा शेष भारत के दलितों में अलख जगायी, उसी किस्म का काम पेरियार ने तमिलनाडु की शूद्र तथा अतिशू्रद जातियों में किया था और व्यापक आंदोलन को जन्म दिया था।

इस तथ्य के बावजूद कि राजा के इस फेसबुक वक्तव्य से समूचे राज्य में हिंसा हो सकती है, उनके खिलाफ कुछ भी कार्रवाई नहीं हुई। विपक्षी पार्टियों की तरफ से भले मांग की गयी कि उन्हें गिरफतार किया जाए और गुंडा एक्ट लगाया जाए। एच राजा ने तत्काल अपने फेसबुक पोस्ट से दूरी बना ली और कहा कि उस पेज को कई एडमिन देखते हैं। (https://www.thenewsminute.com/article/after-lenin-statue-razed-tripura-tn-bjp-members-warn-periyar-next-77502) किस्सा वहीं खतम हुआ। एक तरफ जबकि एच राजा को अपने आक्रामक पोस्ट के लिए ‘‘स्पष्टीकरण’’ के बाद कुछ भी विपरीत नहीं झेलना पड़ा, मगर एक किशोर जाकिर त्यागी उतना किस्मतवाला नहीं निकला। पिछले साल जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्राी बनाया गया और उन्होंने ऐलान किया कि अब गुंडों औरबदमाशों को यू पी छोड़ना होगा तो मुजफफरनगर के रहनेवाले इस किशोर ने व्यंग की शैली में लिखा:

‘‘गोरखपुर में योगीजी ने कहा कि अब गुंडों और बदमाशों यू पी छोड़ो। मैं यह कौन होता हूं कहनेवाला कि योगी आदित्यनाथजी के खिलाफ 28 मुकदमें दर्ज हैं जिनमें से 22 मामलों में गंभीर धाराएं लगी हैं।

बस इसी बात पर उसे कई सप्ताह जेल में बीताने पड़े और तमाम धाराओं के तहत – जिनमें एक देशद्रोह की भी धारा है – मुकदमे कायम किए गए।

हम पड़ताल करें तब तमाम ऐसे मामले मिल सकते हैं कि अगर आप साधारण व्यक्ति हैं और आपने ‘‘महान नेता’’ की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की या आप ने फेसबुक पर कुछ लिखा जिससे ‘‘आहत भावनाओं की ब्रिगेड’’ बौखला गयी और उसनेे आप के खिलाफ केस कर दिया। (https://thewire.in/227684/two-arrested-for-making-derogatory-remarks-against-pm-modi-up-cm-adityanath-and-hindu-gods/, https://thewire.in/200590/victorian-censorship-research-finds-section-67-act-grossly-misused/)

वैसे फिलवक्त़ जब श्री श्री के वक्तव्य के प्रति आधिकारिक प्रतिक्रिया का इन्तज़ार किया जा रहा है, यह देखना समीचीन होगा कि आखिर श्री श्री के ‘‘विवादास्पद’’ बयान से क्या तर्क निकलते हैं, मगर उसके पहले थोड़ी प्रष्ठभूमि पर भी चर्चा जरूरी है।

यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि अयोध्या – जो हमारी साझी विरासत का प्रतीक रही – उसका नाम पचीस साल पहले कलंकित हुआ जब पांच सौ साल पुरानी एक मस्जिद को साम्प्रदायिक फासीवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने नष्ट कर दिया। इन दिनों उस मामले की सुनवाई आला अदालत कर रही है जिसने यह तय किया है कि उसे एक ‘‘जमीन के विवाद’’ के तौर पर देखेगी और इसकी अगली सुनवाई 14 मार्च को होगी।

याद कर सकते हैं कि आला अदालत का हस्तक्षेप तब सामने आया था जब उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनउ पीठ द्वारा दिए एक फैसले पर स्थगनादेश दिया था, जिसने एक तरह से जमीन की मिल्कियत के सवाल को तीन पार्टियों के बीच के संपत्ति के विवाद के रूप में तब्दील कर दिया था और केस को तय करने के लिए वास्तविक तथ्यों पर गौर करने के बजाय जनता के विश्वासों और भावनाओं की दुहाई दी थी।   (2010, http://nsi-delhi.blogspot.in/2010/10/nsi-delhi-statement-vindicating-faith.html#more).

उच्च न्यायालय के इस फैसले की जबरदस्त भत्र्सना हुई थी क्योंकि यह स्पष्ट था कि उसे संतुलित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर नहीं दिया गया था और उसका मूल सूत्रा था कि दो समुदायों के बीच लम्बे समय से चल रहे विवाद को किसी तरह सुलटा दिया जाए। इसे ‘‘पंचायती’’ फैसला कहा गया क्योंकि यहां मध्यस्थ के शब्द को अंतिम शब्द माना गया था। इस फैसले ने एक तरह से हिन्दुत्व वर्चस्ववादी जमातों की लम्बे समय से चली आ रही मांग को ही पुष्ट कर दिया था जिसमें उनका दावा था कि आस्था के मामले किसी कानून एवं न्याय प्रणाली के परे होते हैं। और इसने उनके खेमे में प्रचंड खुशी का माहौल बना था और अपने एजेण्डा की जीत को देखते हुए उन्होंने दोनों समुदायों के बीच के अन्य विवादास्पद मुददों को ही उछालना शुरू किया था और यहां तक मांग की थी कि मुसलमानों को चाहिए कि मथुरा और वाराणसी तथा ऐसे तमाम मामलों में मुसलमानों को अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

ध्यान रहे अगर हम श्री श्री रविशंकर के साक्षात्कार को गौर से पढ़ें तो साफ दिखता है कि वह इलाहाबाद उच्च अदालत के फैसले की अंतर्वस्तु को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसने बहुसंख्यकवादी दावों को पुष्ट किया था तथा न्याय की अनदेखी की थी।

उन्होंने कहा कि इस विवाद को आसानी से सुलझाया जा सकता है बशर्ते मुसलमान अयोध्या पर अपने दावे को ‘‘छोड़ दें।’’ ‘‘मुसलमानों को चाहिए कि वह अयोध्या पर अपने दावे को छोड़ दें, सदिच्छा कायम करने के एक अवसर के तौर पर । .. अयोध्या मुसलमानों के लिए आस्था का स्थान नहीं है। (https://thewire.in/230168/sri-sri-ayodhya-controversy)

अपने साक्षात्कार में यह दावा करना कि अगर सर्वोच्च न्यायालय हिन्दुत्ववादियों की मांग को खारिज करता है तो हिन्दू हिंसा पर उतर आएंगे, इसके जरिए न केवल श्री श्री रविशंकर कानून के राज को चुनौती दे रहे थे बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों पर भी सवाल खड़ा कर रहे थे – जिनके सामने जाति, धर्म, जेण्डर, नस्ल, समुदाय आदि आधारों पर किसी भी तरह का भेदभाव संभव नहीं है। उनका वक्तव्य एक तरह से ऐसे लोगों/समूहों के लिए अप्रत्यक्ष अपील या आवाहन भी था जो हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखते हैं कि वह एक्शन के नए दौर के लिए तैयार रहें।

वैसे वे सभी लोग बेहद नर्म अंदाज में बोलनेवाले इन आध्यात्मिक गुरू पर फिदा दिखते हैं – जिनका वैश्विक आध्यात्मिकता कार्यक्रम 140 देशों में चलता है तथा जिससे 2 करोड़ सदस्य हैं, तथा जिसके प्रति युवाओं के एक हिस्से में काफी क्रेज है – उन्हें यह सुन कर आश्चर्य होगा कि ंगुरूजी किन किन विवादास्पद मसलों पर जुबां खोलते रहते हैं। वैसे उन्हें बारीकी से देखनेवाले बता सकते हैं कि किस तरह प्यार और खुशी और मीडिया की सहायता से बनायी गयी खिलंदडीपन की इमेज के बावजूद श्री श्री के लिए /बकौल सुश्री मीरा नंदा/ अपनी ‘‘हिन्दू राष्टवादी भावना को छिपा पाना असंभव है। और यह एक खुला सीक्रेट है कि राम मंदिर और अल्पसंख्यक मामलों के बारे में वह क्या सोचते हैं ?

ब्रिटेन की बहुचर्चित पत्रिका ‘द इकोनोमिस्ट’ ने उनकी राजनीति को बखूबी पकड़ा था:

‘‘आर्ट आफ लिविंग सभी आस्थाओं के सभी लोगों के लिए खुला है। मगर हक़ीकत यही है कि राम मंदिर की चर्चा करते हुए उनके गुरू आध्यात्मिक गुरू के बजाय राजनेता लगने लगते हैं, जो ‘‘अल्पसंख्यक समुदाय की तुष्टीकरण’’ के लम्बे इतिहास की बात करता है, और इस व्यवस्था की गैरबराबरी को दिखाता है जो मक्का में हज यात्रा पर जाने के लिए मुसलमानों को सबसिडी प्रदान करता है। (Page 100, The God Market, Meera Nanda, Random House.)

अब बात ठीक से समझ आ सकती है कि आर्ट आफ लविंग / जीवन की कला/ अचानक कभी कभी आर्ट आफ कोअर्शन /दमन की कला/या ‘आर्ट आफ हेटिंग अदर’ /अन्य से नफरत की कला/कैसे बन जाता है।

 

 

 

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