आम आदमी पार्टी का संकट ; पारदर्शिता का सवाल – वीरेन्द्र जैन

6:05 pm or March 21, 2018
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आम आदमी पार्टी का संकट ; पारदर्शिता का सवाल

  • वीरेन्द्र जैन

धुर वामपंथ और धुर दक्षिणपंथ को ना पसन्द करने वाले देश में मध्यममार्गी दलों को ही सत्ता सौंपने की परम्परा रही है इनमें से ही एक केन्द्र से कुछ वाम दिखने की कोशिश करता रहा है तो दूसरा केन्द्र से कुछ दक्षिण दिखने की कोशिश करता रहा है। प्रमुख दो दलों के कमजोर हो जाने पर तीसरा मध्यममार्गी दल या गठबन्धन  उभर कर आ जाता है जो कभी जनता पार्टी, कभी जनमोर्चा, कभी सन्युक्त मोर्चा, कभी आम आदमी पार्टी आदि के रूप में सामने आता रहा है। भ्रष्टाचार के आरोपों से बदनाम कर दी गयी काँग्रेस और साम्प्रदायिकता के आरोपों से घिरी भाजपा के बीच आम आदमी पार्टी ने अपनी ज़मीन तलाशी थी व हार की आशंकाओं के बीच भी शिखर के नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ कर अपने को राष्ट्रव्यापी चर्चा में ले आये थे। उल्लेखनीय है कि भाजपा और काँग्रेस दोनों ही दल नवउदारवाद के पक्ष में रहे हैं और आम आदमी पार्टी ने भी कभी नवउदारवाद की आलोचना नहीं की। जब वित्तमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने पहली बार नई आर्थिक नीतियों की घोषणा की थी तब भाजपा ने कहा था कि इन्होंने हमारी नीतियों को हाईजैक कर लिया है।

आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे एक जन आन्दोलन से उभर कर आयी थी। इस आन्दोलन के सूत्रधार अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने प्रतीक के रूप में अन्ना हजारे को आगे कर दिया था जो अनशन के द्वारा महाराष्ट्र में कुछ मंत्रियों को त्यागपत्र के लिए विवश कर चुके थे। अन्ना ने कभी सेना में साधारण सी नौकरी की थी और राजनीतिक दाव पेंचों से दूर रह कर अपने क्षेत्र में कुछ सुधारात्मक काम किये थे। केजरीवाल आयकर विभाग में अधिकारी थे और एक सोशल एक्टविस्ट के रूप में उन्होंने सूचना के अधिकार के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी थी और सरकार को कानून बनाने के लिए विवश कर दिया था। अनावश्यक गोपनीयता के नाम पर जनता से तथ्य छुपाने के विरोध में किये गये प्रयासों के खिलाफ सूचना का अधिकार सरकार हासिल किया गया था। इस गोपनीयता के सहारे सरकारों के अनेक भ्रष्टाचार छुपे रह जाते थे। इस कानून के सहारे भ्रष्टाचार को खत्म करने व जनलोकपाल लाने का आन्दोलन चलाया गया जिसे अनेक गैर सरकारी संगठनों समेत आम जन का दिली समर्थन मिला। इस आन्दोलन के लोकप्रिय हो जाने के बाद  उन्हीं अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के नाम से राजनीतिक दल की स्थापना की थी, जिन्होंने कभी आन्दोलन को हड़पने के लिए आये भाजपा नेताओं समेत स्वाभिमान पार्टी बना चुके रामदेव को राजनीतिक दलों से दूरी के नाम पर आन्दोलन स्थल से भगा दिया था। यह बात अलग है कि आन्दोलन में भाग लेने दूर दूर से आये लोगों को पूड़ी सब्जी खिलाने का काम आरएसएस बिना सामने आये कर रही थी, और हरियाणा के कुछ पूंजीपति उसे सहयोग कर रहे थे।

अरविन्द केजरीवाल ने संघ परिवार से काम निकालने के बाद दूरदृष्टि से संघ परिवार को वैसे ही छिटक दिया जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था जब उनकी समझ में आ गया था कि साम्प्रदायिक नीतियों के लिए बदनाम संघ अपने छुपे एजेंडे को लागू करने के लिए दूसरे लोकप्रिय आन्दोलनों को हड़पने की योजना रचता है। जनता पार्टी नामक पहली गैर काँग्रेसी सरकार इसी के कारण भंग हुयी थी।

भीड़ को दल समझने वाले केजरीवाल के सामने जब दल का पिरामिड बनाने का अवसर आया तो पता चला कि अनेक लोग तो आन्दोलन की लोकप्रियता के सहारे अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए जुट आये  थे और वे नींव की जगह शिखर पर पहुंचना व बने रहना चाहते थे। इस भीड़ को दल के रूप में संवारने के प्रयास में कुछ अच्छे लोग भी छूटते गये और जाते जाते वे केजरीवाल के साथ उनके दल को भी नुकसान पहुँचाते गये। सुप्रसिद्ध राजनीतिक कवि मुकुट बिहारी सरोज के शब्दों में कहा जा सकता है-

जिनके पांव पराये हैं, जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं

इसी तरह अरविन्द और उनकी आम आदमी पार्टी एक घटना बन कर रह गयी, भले ही विधानसभा चुनाव में उसे दो तिहाई से अधिक का बहुमत मिल गया हो। दल से प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रोफेसर आनन्द एडमिरल रामदास समेत अनेक लोग छिटक गये। इसी बीच केजरीवाल ने कैडर आधारित पार्टी बनाने की जगह चर्चित और पदासीन लोगों की सीधी और कटु आलोचनाओं के सहारे अपनी लोकप्रियता बढाने का फार्मूला चलाया व काँग्रेस समेत सत्तारूढ भाजपा को तीखी भाषा में चुनौती दी। भाजपा ने इसे बचकानी हरकत मान कर हँस कर नहीं टाला अपितु पार्टी की जड़ों में मट्ठा डालते हुए इसकी सारी कमजोरियों पर भरपूर वार किया। विधायकों की नकली डिग्रियों से लेकर उनके दाम्पत्य जीवन तक को निशाना बनाया व पूर्ण राज्य का दर्जा न होने के कारण उपराज्यपाल का भरपूर उपयोग करवा के इनकी हैसियत का अहसास करवा दिया। संसदीय सचिव के नाम पर 20 विधायकों की विधायकी पर तलवार लटकवा दी। कभी खास रहे कपिल मिश्रा ने किसी भी तरह के आरोप लगाते हुए उनकी छवि को गिराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। राज्यसभा चुनावों में टिकिट न मिलने के कारण उनके खास मित्र और लोकप्रिय प्रचारक कुमार विश्वास भी विरोधी बन गये। परिणाम यह निकला कि केजरीवाल को मौन धारण करना पड़ा व राजनीति छोड़ एक प्रशासनिक अधिकारी की तरह आधी अधूरी सरकार चलाने को विवश होना पड़ा।

उल्लेखनीय है कि कपिल मिश्रा द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप लगाये जाने पर पार्टी से दूर चले गये योगेन्द्र यादव ने कहा कि मेरे कितने भी मतभेद हों किंतु मैं केजरीवाल को भ्रष्ट नहीं मान सकता। किंतु राज्यसभा के तीन टिकिटों में से दो बाहर के लोगों को देने और अपनी पार्टी तक के लोगों को ऐसा करने के कारण न बताने पर उनकी छवि में गिरावट आयी। कुमार विश्वास जैसे उनके निजी मित्र और पार्टी के स्टार प्रचारक उनके स्टार आलोचक बन गये। सूचना का अधिकार लाने वाले व्यक्ति से ऐसी उम्मीद नहीं थी। यद्यपि यह सच है कि परेशान करने के उद्देश्य से उन पर मानहानि के अनेक मुकदमे लाद दिये गये हैं किंतु अचानक फिर से शिरोमणि अकाली दल के मजीठिया से क्षमा याचना करना पंजाब के विधायकों समेत किसी को समझ में नहीं आया व वे विद्रोही हो गये। पंजाब इकाई के अध्यक्ष ने स्तीफा दे दिया।

उनसे उम्मीदें लगाये लोग यह तो नहीं मानते कि वे बेईमान हो गये हैं और न ही उन्हें पद से दूर होते देखना चाहते हैं किन्तु जिस पारदर्शिता के नारे के साथ वे आये थे, उससे खुद ही दूर जाते दिख रहे हैं, इसलिए अपने प्रशंसकों की निगाह में सन्दिग्ध हो रहे हैं। अगर वे सच को बता कर अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हैं तो बहुत सम्भव है कि लोग फिर से उन्हें अपना मन दे दें। देखना होगा कि इसमें देर न हो जाये।

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