इतिहास का पुनर्लेखन और संकीर्ण राष्ट्रवाद – राम पुनियानी

6:34 pm or March 29, 2018
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इतिहास का पुनर्लेखन और संकीर्ण राष्ट्रवाद

  • राम पुनियानी

हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा के सत्ता में आने के बाद से, पाकिस्तान की तरह, भारत में भी इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है। अब तक हम मध्यकालीन इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण के बारे में सुनते रहे हैं। हमें यह बताया जाता है कि दुष्ट मुस्लिम विदेशी आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए, तलवार की नोंक पर इस्लाम फैलाया और हिन्दू मंदिरों को तोड़ा। इस तरह के इतिहास का एक नमूना है राणा प्रताप का स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में महिमामंडन। यहां तक कि अब हमें यह भी बताया जा रहा है कि राणा प्रताप ने अकबर की सेना को हल्दी घाटी के युद्ध में पराजित किया था! यह भी कहा जा रहा है कि आर्य, जो वर्तमान हिंदुओं के पूर्वज बताए जाते हैं, भारत के मूल निवासी थे और हड़प्पा व मोहनजोदाड़ो, आर्य संस्कृति का हिस्सा थे।

इतिहास के हिन्दुत्ववादी संस्करण को बढ़ावा देने के लिए, मोदी सरकार ने एक समिति की नियुक्ति की है जिसकी रपट के आधार पर स्कूली पाठ्यक्रम बदला जाएगा। सरकार के शब्दों में इस समिति का उदेश्य है ‘आज से 12,000 वर्ष पूर्व, भारतीय संस्कृति के उदय और उसके उद्भव और दुनिया की अन्य संस्कृतियों के साथ उसकी अंतःक्रिया का समग्र अध्ययन‘। केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि अब तक यह पढ़ाया जाता रहा है कि भारत में कुछ तीन से चार हजार वर्ष पूर्व, मध्य एशिया से प्रवासी आए और यहां की आबादी के चरित्र को परिवर्तित कर दिया। इस धारणा को चुनौती दिए जाने की जरूरत है।

इस समिति का मुख्य फोकस प्राचीन भारतीय इतिहास, और विशेषकर आर्यों के उदय पर होगा। अब तक इस संबंध में अलग-अलग सिद्धांत प्रचलित हैं। जोतिराव फुले, आर्यों के भारत में आगमन को एक आक्रमण बताते हैं, जिसके कारण नीची जातियों का दमन शुरू हुआ। लोकमान्य तिलक ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि आर्य, आर्कटिक क्षेत्र से भारत आए थे। आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक को यह अच्छी तरह से पता था कि अगर हिन्दुओं की श्रेष्ठता, और भारत की धरती पर उनके स्वामित्व को सिद्ध किया जाना है, तो यह साबित किया जाना होगा कि आर्य इस देश के मूल निवासी थे। परंतु वे लोकमान्य तिलक के सिद्धांत का खुलकर विरोध भी नहीं करना चाहते थे। मरता क्या न करता। उन्होंने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि आर्य निःसंदेह आर्कटिक से आए थे परंतु आर्कटिक पहले हमारे बिहार और उड़ीसा में था और बाद में भूगर्भीय परिवर्तनों के चलते वहां पहुंच गया जहां वह अब है, अर्थात उत्तरी ध्रुव पर।

आर्यों के भारत में आगमन के संबंध में जो भी सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, वे हिन्द-आर्य भाषाओं के अध्ययन पर आधारित हैं। इस समय जो सिद्धांत सब से अधिक प्रचलित है वह यह है कि आर्य कई किश्तों भारत आए। हड़प्पा व मोहनजोदाड़ो सभ्यताओं के अवशेष बताते हैं कि वह मूलतः एक शहरी संस्कृति थी। वेद, जो निःसंदेह आर्यों द्वारा लिखे गए हैं, के अध्ययन से यह लगता है कि आर्य घुमंतु और ग्रामीण थे।

कई अनुवांशिक अध्ययनों से यह पता चला है कि प्रवासी भारत के पश्चिम से यहां आए। समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह यह साबित करे कि हिन्दू यहां सबसे पहले आए थे। जब हमारे देश के समक्ष इतनी समस्याएं हैं तब इस तरह के अध्ययन पर धन और ऊर्जा खर्च करने का क्या औचित्य है? एरिक हाबस्वान ने कहा था, ‘‘इतिहास, राष्ट्रवाद के लिए वही है, जो अफीम, अफीमची के लिए‘‘। संकीर्ण राष्ट्रवाद अपने इतिहास को पीछे, और पीछे, ले जाना चाहता है, ताकि देश की धरती पर उसके एकाधिकार का दावा मजबूत हो सके। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों को किनारे करने के लिए यह सिद्धांत प्रतिपादित किया जा रहा है कि पाकिस्तान का निर्माण मोहम्मद बिन कासिन की सिन्ध पर विजय के साथ हुआ था। पाकिस्तान की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में से हिन्दू राजा गायब हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी व नेहरू के भारत की स्वाधीनता में योगदान को कोई स्थान नहीं दिया गया है। हिन्दू राष्ट्रवादी, सावरकर के इस सिद्धांत में विश्वास रखते हैं कि केवल वे ही हिन्दू हैं जो भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानते हैं। इसलिए, भारतीय इतिहास की शुरूआत, हिन्दुओं से होनी चाहिए। यह इस तथ्य के बावजूद कि हिंदू शब्द आठवीं सदी में अस्तित्व में आया।

यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार गांधी (अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज‘) और नेहरू (अपनी उत्कृष्ट कृति ‘भारत एक खोज‘) में भारत को सभी धर्मों के मानने वालों का देश बताते हैं और कहते हैं कि विभिन्न धर्मों की अंतःक्रिया से सांझी बहुवादी संस्कृति का जन्म हुआ और अनेकता में एकता स्थापित हुई। संस्कृतियां एक दूसरे के साथ अंतःक्रिया करती हैं, एक दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ बदलती हैं। यही बात संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज ‘एलायंस ऑफ़ सिविलाईजेशन्स‘ (सभ्यताओं का गठबंधन) में कही गई है। अनुवांशिक अध्ययनों से साबित हो चुका है कि मानव का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जहां से वह दुनिया के सभी हिस्सों में फैला। इससे यह सिद्धांत गलत सिद्ध हो गया है कि मानव का जन्म यूरोप अथवा एशिया में हुआ था। संस्कृतियों के बीच अंतःक्रिया एकतरफा नहीं होती। यह शनैः-शनैः होती है और इससे सभी संस्कृतियां प्रभावित होती हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ का दस्तावेज इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि सामाजिक प्रगति, संस्कृतियों की अंतःक्रिया का परिणाम होती है। यही समावेशी भारतीय राष्ट्रवाद का सिद्धांत भी है।

हिन्दू राष्ट्रवादी, जिनमें मोदी और उनके साथी शामिल हैं, हमेशा से यह मानते रहे हैं कि हिन्दू इस देश के मूल निवासी हैं। यह समिति किस निष्कर्ष पर पहुंचेगी, यह पहले से ही स्पष्ट है। अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देश का नेतृत्व अतीत को तोड़-मरोड़ रहा है। वह चाहता है कि जो लोग हिन्दू की उसकी परिभाषा में नहीं आते, उन्हें या तो हाशिये पर धकेल दिया जाए या उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर दिया जाए कि वे उन रीति-नीतियों को अपनाएं, जिन्हें वह हिन्दू मानती है भारतीय संविधान इन शब्दों से शुरू होता है, ‘‘हम भारत के लोग‘‘। इसे ‘‘हम हिन्दू‘‘ से प्रतिस्थापित करने की तैयारी हो रही है। यह हिन्दू राष्ट्रवाद को देश पर लादने का प्रयास है। यह ठीक वही है जो मुस्लिम साम्प्रदायिकतावादियों ने पाकिस्तान में किया। इतिहास में से चुनिंदा चीजों को लेकर उन्हें संकीर्ण राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। इस देश का कौन सा निवासी कहां से आया था यह हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण होना चाहिए? महत्व इस बात का होना चाहिए कि आज हमारे देश में कौन-कौन रह रहा है। संकीर्ण राष्ट्रवाद से केवल देश विघटित होगा।

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