आज भी मानवाधिकार की प्रतीक्षा में हैं किन्नर – डाॅ0गीता गुप्त

7:02 pm or March 29, 2018
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आज भी मानवाधिकार की प्रतीक्षा में हैं किन्नर

  • डाॅ0गीता गुप्त

समूचे विश्व में स्त्री और पुरुष से परे एक अन्य मानव वर्ग भी है, जिसे ट्रांसजेण्डर, तृतीय लिंगी, हिजड़ा, खोजवा, मौगा, ख़्वाज़ासरा, अरावनी, नपुंसक, छक्का, जोगप्पा, शिव-शक्ति, मंगलामुखी, किन्नर आदि कई नामों से जाना जाता है। वस्तुतः किन्नर हिमालय में आधुनिक कन्नौर प्रदेश के पहाड़ी लोगों की जाति का नाम है। जिनकी भाषा किन्नौरी, गलचा, लाहौली आदि बोलियों के परिवार की है। हरिवंषपुराण, महाभारत, कालिदासकृत कुमारसम्भव, तुलसीदासकृत रामचरितमानस, वाल्मीकिकृत रामायण और पौराणिक मिथकीय ग्रन्थों से लेकर कामसूत्र तक बौद्ध साहित्य में भी किन्नर का उल्लेख मिलता है। आजकल हिजड़ों के लिए भी ‘किन्नर ‘षब्द उपयोग में लाया जाता है।

प्राचीन मान्यताएँ जो भी हों, जबसे मानव जाति धरती पर है, तभी से किन्नरों का इतिहास है। किन्नर न जन्मजात स्त्रीलिंग होते हैं, न पुल्लिंग। प्रकृति ने इन्हें अन्तःलिंगी स्वरूप दिया है। अधिकतर किन्नर पुरुष शारीरिक संरचना के होते हैं किन्तु उनका व्यवहार स्त्रियोचित् होता है। बहुत कम किन्नर ऐसे होते हैं जिनकी शारीरिक संरचना स्त्रियों की होती है। परन्तु दोनों किन्नरों में जननांग अवशेषी रूप में तथा निष्क्रिय होते हैं। किन्नर इंसानों की वह अवस्था है जबकि गर्भ में शरीर के विकास-क्रम में किसी एक लिंग का निर्धारण होते-होतेे उसके विकास की प्रक्रिया बाधित हो जाती है अथवा कुछ समय बाद दूसरे लिंग का विकास होने लगता है। इस प्रकार किन्नर के अंग में पुरुष या स्त्री के अंग अविकसित अवस्था में होते हैं या फिर दोनों के अंगों का मिलावटी स्वरूप हो जाता है। इस अवस्था को मध्यलिंगता कहा जाता है ओैर यह हार्मोन्स की संरचना पर निर्भर करता है।

प्राचीन काल में किन्नर राजा-महाराजाओं के यहाँ नाच-गाकर अपना जीवन निर्वाह करते थे। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा नेपाल आदि राष्ट्रों में स्त्री की वेशभूषा धारण करनेे वाले हिजड़े टोलियों में रहते हैं। ये विभिन्न सामाजिक उत्सवों मंे नाचते -गाते हैं और पैसे माँगकर जीविका चलाते हैं। जबकि विश्व के अन्य देशों मंें हिजड़े सामान्य लोगों की तरह अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं तथा बच्चों को गोद लेकर अपना वंश चलाते हैं। राजस्थान, पंजाब, मारवाड़ व हरियाणा में हिजड़े बच्चे पैदा होने की संख्या तुलनात्मक रूप मंे अन्य प्रदेशों से अधिक है। प्रति वर्ष 40-50 हजार किन्नरों की संख्या-वृद्धि देश के लिए चिन्ताजनक है।

वर्ष 1871 से पहले तक भारत में किन्नरों की सामाजिक स्वीकार्यता थी। मगर ब्रिटिश शासनकाल में अँग्र्रेज़ों ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट आॅॅफ 1871 लागू कर दिया। फिर 1897 में किन्नरों के समुदाय को अपराधी जनजाति की श्रेणी में डालकर उनका जीवन अभिशप्त कर दिया। इनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए एक अलग रजिस्टर रखा जाने लगा और धारा 377 के तहत इनके कृत्यों को ग़ैर ज़मानती अपराध घोषित किया गया। स्त्रियों के परिधान अपनाने और सार्वजनिक स्थानों पर नाचने-गाने के चलते उन्हें दो वर्ष तक कारावास का दण्ड दिया जाने लगा। स्वाधीनता के बाद वर्ष 1951 में उन्हें क्रिमिनल ट्राइब्स से पृथक् किया गया परन्तु इसके बाद भी धारा 377 की तलवार तो लटकी ही रही। परिणामतः किन्नर संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित रहकर संकुचित दायरों में सिमटकर ही जीते रहे।

दुःख की बात यह है कि किन्नर वर्ग अब तक अपनी पहचान का मोहताज़ रहा। क़ानूनन उसे जब कभी महिला या पुरुष के रूप में अपना लिंग बताना पड़ता था, तब उपहास का शिकार होना पड़ता था। वर्ष 2009 में मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के नगरीय निकाय में महापौर का चुनाव रिकार्ड मतों से जीतने के बावजूद किन्नर कमलाबाई को अपना पद गँवाना पड़ा। उनकी जीत को दो आधारों पर चुनौती दी गई। पहला यह कि कमलाबाई ने अपनी जाति नहीं बतलायी। दूसरे, नामांकन मंे महिला के रूप में स्वयं का उल्लेख किया। जबकि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णयानुसार हिजड़े पुरुष ही हैं और उन्हंे महिला नहीं माना जा सकता। अतः न्यायालय में दोनों आधार सही साबित हुए। इस कारण कमलाबाई का चुनाव रद्द कर उपविजेता को विजेता घोषित कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय में मामला पहुँचने पर भी कमलाबाई की हार ही हुई ।

ज्ञातव्य है कि वर्ष 2011 की जनगणना में किन्नरों को भी शामिल करके अलग वर्ग में गिनने का निर्णय लिया गया। पृथक् वर्ग में किन्नरों की गणना से सम्बन्धित तकनीकी सुझाव समिति के सुझावों को केन्द्र सरकार ने स्वीकृति दी थी। अक्तूबर 2012 में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपील की थी कि देश के किन्नरों को समान अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। किन्नरों के मानवाधिकार हेतु संघर्षरत् किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने भी इस मामले में याचिका दायर की थी। फिर विलम्ब से ही सही, सर्वाेच्च न्यायालय ने 15 अप्रैल 2014 को किन्नरों के प़़क्ष में अपना ऐतिहासिक निर्णय दिया। तदनुसार, उन्हंे तृतीय लिंग (थर्ड जेण्डर) के रूप में समाज में सम्मानजनक ढंग से जीने का अधिकार दे दिया गया। न्यायालय ने सभी आवेदनों में तीसरेे लिंग का उल्लेख अनिवार्य कर दिया। साथ ही सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश और सार्वजनिक नियुक्तियों मंे आरक्षण उपलब्ध कराने हेतु किन्नरों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी श्रेणियों के रूप में मानें।

ध्यान रहे कि न्यायालयीन निर्णयों को क़ानूनी जामा पहनाने की ज़िम्मेदारी सरकार की है। मगर इस दिशा में सरकारें उदासीन रहीं। दिसम्बर 2014 में राज्य सभा सांसद तिरुचि शिवा ने निजी विधेयक के रूप में ट्रांसजेण्डर पर्सन्स बिल प्रस्तुत किया, जिसे अप्रैल 2015 में राज्य सभा ने स्वीकृति प्रदान की । फिर केन्द्र सरकार ने कुछ नये प्रावधानों (उभयलिंगी विशेषाधिकार न्यायालयों एवं राष्ट्रीय तथा राज्य आयोगों द्वारा प्रस्तुत प्रावधानों सहित) एवं परिवर्तनों के साथ उभयलिंगी व्यक्तियों के अधिकार विधेयक 2015 प्रस्तुत किया। जिसे अप्रैेल 2016 में विधि एवं न्याय मन्त्रालय के पास भेजा गया और जुलाई 2016 में मन्त्रिमण्डल ने स्वीकृति प्रदान की। फिर अगस्त 2016 में यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया। पर इसमें कई कमियाँ थीं अतः इसे संसद की स्थाई समिति के पास भेज दिया गया। दरअसल इसमें किन्नरों के लिए विवाह, तलाक़ और गोद लेने जैसे मानवाधिकारों का समावेश ही न था जबकि ये किन्नरों के लिए अहम हैं। क्योंकि क़ानूनी मान्यता न होने के बावजूद कई किन्नर विवाह जैसे सम्बन्धों में हैं ।

उक्त विधेयक किन्नर समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण देने को लेकर भी मौन है। जबकि समिति ने किन्नर समुदाय के सहजीवन एवं विवाह के अधिकारों के साथ-साथ सर्जरी या हार्मोन सम्बन्धी बदलाव के बिना भी उन्हें अपना लिंग चुनने के अधिकार की पैरवी की थी।‘‘एक विडम्बना यह है कि वर्ष 2016 के विधेयक के अन्तर्गत इस क़ानून के संचालन एवं क्रियान्वयन के विषय में कोई जानकारी नहीं दी गई है। अतएव ट्रांसजेण्डर विधेयक 2016 क़ानून -निर्माण की दिशा में एक बेहद अरुचिकर एवं निष्ठाहीन प्रयास साबित होता प्रतीत हो रहा है। हाशिए पर जीवन बिता रहे किन्नर समुदाय को क़ानूनी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में समाज एवं सरकार को पूर्ण ईमानदारी व निष्ठा से प्रयास करना चाहिए ताकि यह समुदाय समाज की मुख्य धारा का अंग बन सके।‘‘

अगस्त 2016 में संसदीय तदर्थ समिति को सौंपे गए विधेयक पर अब तक आशातीत परिणाम नहीं आए हैं। जबकि यह पहला सरकारी दस्तावेज़ था जो तृतीय लिंग समुदाय के मानवाधिकारों को मान्यता दिलवाने से सम्बन्धित था । यद्यपि इस विधेयक में भी ख़ामियाँ हैं ; जैसे ट्रांसजेण्डर व्यक्ति की सही परिभाषा नहीं दी गई है, न उनकी सही संख्या बतलायी गई है। फ़िलहाल यह विधेयक ठण्डे बस्ते में है। सामाजिक न्याय मन्त्री थावरचन्द गहलोत के अनुसार, संसद के अगले सत्र में इसे पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि आई. पी. सी. की धारा 377 के तहत ‘‘उभयलिंगी व्यक्तियों को अपराधीकरण के जोखिम में रखा गया है। हालांकि अगस्त 2017 में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा गोपनीयता के अधिकार सम्बन्धी अपने निर्णय में इस धारा के ग़ैर अपराधीकरण करने की आवष्यकता पर दृढ़ टिप्पणियाॅंॅ की गईं। यह मामला अब भी उनके पास विचाराधीन है।

अब किन्नरों के हक़ में सरकार चाहे जब भी क़ानून बनाये, पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद किन्नर समुदाय में जागृति की लहर निश्चित रूप से आई है। भारत में इनकी संख्या पचास लाख तक आँकी गई है। किन्नरों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता देने वाले देशों की संख्या नगण्य है। आस्ट्रेलिया में कुछ समय पूर्व ही ऐसा आदेश जारी हुआ है। नेपाल में वर्ष 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने लैंगिक अल्पसंख्यकों को आम नागरिकों की तरह अधिकार देने की पैरवी की थी। अमेरिका में सात लाख किन्नर हैंै। वहाँ भी मार्च 2014 में व्हाइट हाउस में एक आॅन लाइन याचिका दायर कर इन्हें सामाजिक पहचान देने की वकालत की गई लेकिन अभी तक वहाँ थर्ड जेण्डर जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।

भारत में सर्वाेच्च न्यायालय ने भले ही किन्नर समुदाय को तृतीय लिंग की मान्यता देे दी हो, लेकिन जब तक इस सम्बन्ध में ठोस क़ानून बनाकर सरकार उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं करेगी, तब तक किन्नरों को इसका लाभ नहीं मिलेगा। हालाँकि दुनिया भर में किन्नर समुदाय अब कार्पोरेट, कला, नौकरशाही, राजनीति आदि विविध क्षेत्रों में अपनी योग्यता साबित करने में जुट गया है। भारत के किन्नरों के लिए मुक्ति संगठन बनाने का प्रस्ताव रखे जाने के बाद से इस दिशा में काफ़ी प्रगति हो रही है। अभी तक दूसरों की ख़ुशी में नाच-गाकर बधाई देने और नेग माँगने तथा सड़कों, रेलों और घरों में पैसे माँगकर जीवन काटने वाला यह समुदाय अब एक नयी राह पर चलने को तत्पर है। किन्नर के रूप में प्रथम महापौर रायगढ़ ( छत्तीसगढ़) की मधु किन्नर, विधायक शबनम मौसी, पश्चिम बंगाल में इस्लामपुर की लोक अदालत में न्यायाधीश जोयिता मण्डल, पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले के कृष्णानगर महिला काॅलेज की प्राचार्य मानवी बंद्योपाध्याय, टेलीविज़न एंकर पद्मिनी प्रकाश, सिने तारिका व उद्यमी-कल्कि सुब्रह्मण्यम, भरतनाट्यम नर्Ÿाकी तथा किन्नरों के मानवाधिकारों की पैरोकार और चैदहवें अखाड़े की महामण्डलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, पहली विश्व सुन्दरी नताशा, पुलिस अफ़सर के0 पृथिवी यासिनी, प्रथम महिला कंास्टेबल गंगाकुमारी जैसे उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि यदि अवसर व सुविधाएँ सुलभ हों और समाज तथा सरकार ईमानदारीपूर्वक अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभायें तो उक्त समुदाय एक सामान्य नागरिक का जीवन जी सकता है। इतना ही नहीं, वह देश का गौरव भी बन सकता है।

असल समस्या किन्नरों के आर्थिक-सामाजिक सशक्तिकरण की है, जिसके लिए शिक्षा व रोज़गार उपयुक्त आधार हैं। इदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय ने उनके लिए निःशुल्क शिक्षा सुविधा देने का निर्णय लिया है। राजस्थान के सभी शासकीय महाविद्यालयों में प्रवेश प्रपत्र पर तृतीय लिंग का प्रावधान कर उनकी निःशुल्क शिक्षा हेतु वर्ष 2015 में ही आदेश दिये जा चुके हैं। बिहार बोर्ड ने भी गत वर्ष पहली बार परीक्षा आवेदनपत्र तथा अंकसूची में तृतीय लिंग की श्रेणी का प्रावधान किया। वहाँ मैट्रिक-इण्टर परीक्षा में पहली बार 253 किन्नरों ने भाग लिया। वर्ष 2016 में यौन अल्पसंख्यक कार्यकत्र्री किन्नर अक्कई पद्मशाली को बेंगलुरु में वर्चुअल यूनीवर्सिटी फाॅर पीस एण्ड एजुकेशन की ओर से डाॅक्टरेट की उपाधि दी गई। पहली बार 80 किन्नरों ने भारतीय प्रबन्ध संस्थान में प्रवेशार्थ संयुक्त प्रवेश परीक्षा ( कैट ) में पंजीयन कराया। ग़ौरतलब है कि अमेरिका के कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी ने किन्नरों को महिला विद्यार्थी के रूप मेें अध्ययन की छूट देने की शुरुआत अक्तूबर 2017 से की है। साथ ही अमेरिकी रक्षा मन्त्रालय ने किन्नरों को सशस्त्र बलों में सेवा के अवसर देने की घोषणा भी कर दी है।

यह तो तय है कि किन्नरों के जीवन में बदलाव लाने के लिए सभी राज्यों को आगे आना होगा और उनके लिए कल्याण समिति का गठन करके सारी सुविधाएँ सुनिश्चित करनी होंगी। जैसे-‘‘1. पासपोर्ट, राशनकार्ड, मतदाता पत्र, पैन कार्ड, बैंक खाता, क्रेडिट कार्ड, वसीयत लिखने का अधिकार। 2.क़ानूनी तौर पर स्त्री प्रभाग में यात्रा करने का अधिकार । 3. विवाह और तलाक़ का अधिकार। 4.बच्चा गोद लेने का अधिकार। 5.साठ वर्ष से अधिक उम्र के हिजड़ों के लिए पंेंशन की सुविधा। 6.मकान बनाने की सुविधा। 7.व्यापार हेतु बैंक-लोन की सुविधा। 8. शिक्षा-संस्थानों में भर्ती, निःशुल्क शिक्षा और छात्रवृत्ति की सुविधा। 9. न्यायिक सुविधा में अनुदान। 10. लिंग-परिवर्तन सम्बन्धी शल्य क्रिया हेतु निःशुल्क मेडिकल सुविधा।‘‘

छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु सरकारों ने किन्नरों को लिंग परिवर्तन हेतु निःशुल्क चिकित्सा सुविधा सुलभ कराने की पहल की है। यह शल्य क्रिया सौ फ़ीसदी सफल होती है। इसमें तीन तरह की शल्य क्रिया होती है-अर्द्ध विकसित जननांग बाहर निकालने, योनि को आकार देकर उपयोगी बनाने तथा स्त्री या पुरुष का रूप देने की शल्य क्रिया। लिंग-परिवर्तन के बाद छत्तीसगढ़ की दो महिलाएँ एलीना और अमृता चैन की ज़िन्दगी बसर कर रही हैं। इसमें पाँच-छह लाख रुपये व्यय होते हैं। लिंग-परिवर्तन का अधिकार किन्नरों के लिए वरदानस्वरूप है। लेकिन यह अधिकार भी उन्हें उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने के बाद ही मिल सका है।

लैंगिक अल्पसंख्यकों के मामले में तमिलनाडु सरकार काफ़ी सचेत है। वहाँ की सरकार ने लिंग के काॅलम में ‘अन्य‘ का दर्जा देकर इनके लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोल दिये हैं और ट्रांसजेण्डर वेलफ़ेयर बोर्ड, पहचान पत्र, ग्रुप हाउसिंग, पेंशन व अन्य कल्याणकारी योजनाएँ लागू की हैं। मदुरै की अनुशया देश की पहली किन्नर हैं जो होमगाड्र्स (गृह रक्षा वाहिनी) में भर्ती की गईं। केरल वर्ष 2015 में ट्रांसजेण्डर नीति बना चुका है। आन्ध्रप्रदेश सरकार के मन्त्रिमण्डल ने 18 वर्ष से अधिक उम्र के किन्नरों को पेंशन देने हेतु दिसम्बर 2017 में नीतिगत निर्णय लिया है। उन्हें राशन कार्ड, पेंशन और छात्रवृत्ति के साथ-साथ स्किल डेवलपमेण्ट कोर्स की सुविधा भी दी जाएगी। केरल और उड़ीसा जैसे राज्यों में यह सुविधा पहले ही आरम्भ की जा चुकी है।

वर्तमान में विमर्श और अस्मिता से जुड़े आन्दोलनांे ने शिक्षित किन्नरों को बहुत प्रभावित किया है। किन्नरों के लिए बनाये गए मुक्ति संगठन भी इसमें सहायक सिद्ध हो रहे हैं। पर क़ानूनी बाधाएँ कम नहीं हो रहीं। संघ लोक सेवा आयोग और कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय मंे एक हलफ़नामा दाखिल कर न्यायाधीशों की पीठ को बताया गया कि ‘‘सिविल सेवा परीक्षा में किन्नरों को तृतीय लिंग के रूप में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि इस श्रेणी को सर्वाेच्च न्यायालय ने अब तक परिभाषित नहीं किया है। मेडिकल डिक्शनरी में ट्रांसजेण्डर की कोई परिभाषा नहीं है, न ही उनकी पहचान का कोई चिह्न है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को कौन प्रमाणित करेगा ? इसलिए उनके निर्णय को लागू करना कठिन है।‘‘ लेकिन इस बात से सहमत नहीें हुआ जा सकता क्योंकि चिकित्सकीय विज्ञान और शब्दकोष भलीभाँति ट्रांसजेण्डर कोे परिभाषित करते हैं तथा चिकित्सक सभी आवश्यक परीक्षण करके उसे प्रमाणित करने में पूर्णतः सक्षम हैं। इसलिए यही कहा जा सकता है कि न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी कर दी है ,जो दुर्भाग्यपूर्ण है। संघ लोक सेवा आयोग और कार्मिक प्रषिक्षण विभाग को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए और वास्तविकता को स्वीकारना चाहिए।

वस्तुतः किन्नर समुदाय की पीड़ा से रू-ब-रू होने की ज़हमत कोई नहीं उठाना चाहता। जबकि किन्नरों का इतिहास चार हजार वर्ष पुराना है तथापि यह समुदाय हाशिए पर है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ और समतामूलक समाज की स्थापना का राग अलापने वाले राजनेताओं और प्रबुद्ध वर्ग का इनकी पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है। इसलिए किन्नर समाज अभी तक आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से दयनीय दशा में है और भिक्षावृŸिा तथा वेश्यावृŸिा के लिए भी अभिशप्त है। समाज में किन्नरों की स्वीकृति आज इक्कीसवीं सदी में भी आसान नहीं है। उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक 2016 को किन्नरों के हित में सभी आवश्यक प्रावधानों सहित क़ानून का रूप अविलम्ब दिया जाना चाहिए। सामाजिक बहिष्कार से उत्पन्न भेदभाव, शैक्षिक सुविधाओं का अभाव, बेरोज़गारी, चिकित्सा-सुविधाओं की कमी जैसी अनगिनत ज्वलन्त समस्याओं से जूझते किन्नर समुदाय को समाज की मुख्य धारा में लाने के प्रयास नितान्त आवश्यक हैं। समाज-सुधारकों, सन्तों, मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय और तमाम राज्य महिला आयोगों सहित लेखकों और सामाजिक संगठनों का यह नैतिक दायित्व है कि वे किन्नरों को सामान्य मनुष्यों की भाँति ससम्मान जीवन जीनेे और मानवाधिकार दिलवाने हेतु अपनी भूमिका तय करें।

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