जाति धर्म को हम नहीं मानते – राह दिखाते केरल के बच्चे ! – सुभाष गाताडे

3:55 pm or April 11, 2018
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एक अलग किस्म का ‘केरल माडल’

जाति धर्म को हम नहीं मानते – राह दिखाते केरल के बच्चे !

  • सुभाष गाताडे

केरल के जानेमाने फुटबाल खिलाड़ी विनीत की जिन्दगी का एक छोटा सा कदम पिछले दिनों राष्ट्रीय सूर्खियां बना था।

अपने बेटे के जन्म प्रमाणपत्र के लिए दी गयी उनकी दरखास्त में उन्होने जाति और धर्म का काॅलम खाली छोड़ा था। पत्राकारों द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने टकासा जवाब दिया था कि मेरी सन्तान वयस्क होने पर खुद तय करेगी कि वह अपने आप को क्या प्रस्तुत करना चाहती है ? उसका पिता होने के नाते मैं जनम से प्राप्त अपनी पहचान उस पर कैसे लाद सकता हूं ?

पिछले दिनों केरल विधानसभा में कैबिनेट मंत्राी सी रविन्द्रनाथ द्वारा दिए गए लिखित जवाब के बाद अब साफ हो चला है कि सी के विनीत अकेले नहीं हैं। रेखांकित करनेवाली बात है कि केरल के स्कूलों में पढ़नेवाले – पहली से बारहवीं कक्षा तक के – एक लाख चैबीस हजार से अधिक बच्चों ने अपने प्रवेश फार्म में धर्म या जाति का उल्लेख नहीं किया है।  इनमें से एक लाख 23 हजार बच्चे पहली से दसवीं कक्षा के हैं जबकि एक हजार से अधिक बच्चे ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ते हैं। @https://www.telegraphindia.com/india/kerala-kids-keep-caste-religion-out-219238@

फिलवक्त छात्रों की यह संख्या – कुल छात्रों की संख्या 42 लाख से महज तीन फीसदी दिखती हो, मगर एक ऐसे समय में जबकि धर्म के नाम पर दंगा-फसाद- झगड़े आये दिन की बात हो गए हों, जाति को लेकर उंचनीच की भावना और तनाव 21 वंी सदी की दूसरी दहाई में भी मौजूद हों, उस प्रष्ठभूमि में यह ख़बर ताजी बयार की तरह प्रतीत होती है। 11 वीं एवं 12 वीं कक्षा के हजार से अधिक छात्रों का इस सूची में होना यह बताता है कि उनके माता पिता ने यह अहम फैसला एक दशक से पहले लिया था।

इंडियन रैशनेलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेन्द्र नायक बताते हैं कि दस साल पहले उनके शहर मंगलौर में एक मल्याली युगल ने भी अपनी जुड़वा सन्तानों को स्कूल में दाखिला देने के पहले जाति और धर्म के काॅलम को भरने से इन्कार कर दिया था। केरल के कांग्रेस के विधायक वी टी बलराम और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोकसभा सदस्य एम बी राजेश भी उन माता पिताओं में शुमार हैं जिन्होंने बच्चों के एडमिशन फार्म में जाति और धर्म लिखने से तौबा किया था।

संविधान की धारा 51 – जो नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को लेकर है तथा जिसमें वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता, सुधार और खोजबिन की प्रव्रत्ति को विकसित करने पर जोर देती हो – का उल्लंघन जब अपवाद नहीं नियम बनता जा रहा हो, उस प्रष्ठभूमि में केरल का यह अलग किस्म का माॅडल निश्चित ही प्रेेरित करता है।

कोई पूछ सकता है कि क्या यह परिघटना महज केरल केन्द्रित है। निश्चित ही नहीं !

इसी किस्म की ख़बर कुछ वक्त़ पहले मुंबई की अख़बारों की सूर्खियां बनी थीं, जब अन्तरधर्मीय विवाह करनेवाले एक युगल द्वारा अपनी नवजन्मी सन्तान के साथ किसी धर्म को चस्पां न करने का निर्णय सामने आया था। मराठी परिवार में जनमी अदिति शेड्डे और और गुजराती परिवार में पले आलिफ सुर्ती – जो चर्चित कार्टूनिस्ट आबिद सुर्ती के बेटे हैं – के अपने निजी जीवन के एक इस छोटेसे फैसले ने एक छोटीसी बहस खड़ी की थी। इस युगल का मानना था कि बड़े होकर उनकी सन्तान जो चाहे वह फैसला कर ले, आस्तिकता का वरण कर ले, अज्ञेयवादी बन जाए या धर्म को मानने से इन्कार कर दे, लेकिन उसकी अबोध उम्र में उस पर ऐसे किसी निर्णय को लादना गैरवाजिब होगा।

रेखांकित करनेवाली बात है कि अदालतें भी इस मामले में बेहद सकारात्मक रवैया अपनाती दिखती हैं।

देश की आला अदालत का हालिया निर्णय इसी बात की ताईद करता है कि बच्चे के लालन पालन के लिए उसे सौंपे जाने के मामले में धर्म एकमात्रा पैमाना नहीं हो सकता। (https://www.hindustantimes.com/india-news/religion-not-the-only-norm-for-custody-of-child-says-supreme-court/story-ZhZtNspE0mZ7mcnq5rBIkI.html)

मालूम हो अदालत नौ साल की एक बच्ची की अभिरक्षा/कस्टडी से सम्बधित एक मामले पर गौर कर रही थी, जिसमें उसकी नानी और दादी के बीच मुकदमा चल रहा था। मालूम हो कि बच्ची का पिता अपनी मां की हत्या के जुर्म में सज़ा भुगत रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बोबडे की अगुआईवाली पीठ ने इस मामले में बेटी की दादी की इस याचिका को खारिज कर दिया – जिन्होंने दावा किया था कि मुस्लिम पिता और उसकी हिन्दू पत्नी , जिसने विवाह के बाद इस्लाम धर्म कबूल किया था – कि उनकी पोती के लालनपालन का अधिकार उन्हें मिलना चाहिए क्योंकि वह ‘‘मुस्लिम’’ है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मुंबई उच्च अदालत के निर्णय पर ही मुहर लगा दी कि उसकी नानी ही बच्ची की अभिभावक हो सकती है। इस तरह अदालत ने बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि रखा।

प्रश्न उठता है कि आज जबकि विज्ञान के क्षेत्रा में हुई प्रचण्ड तरक्की ने हमें अब तक चले आ रहे तमाम रहस्यों को भेदने का मौका दिया है और दूसरी तरफ हम आस्था के चलते सुगम होती विभिन्न असहिष्णुताओं या विवादों के प्रस्फुटन को अपने इर्दगिर्द देख रहे हैं, उस दौर में सन्तान और माता-पिता/अभिभावक की धार्मिक आस्था के सन्दर्भ में किस किस्म की अन्तक्र्रिया अधिक उचित जान पड़ती है।

एक रास्ता यह दिखता है कि 21 वीं सदी में भी अपनी अपनी धार्मिक मान्यताओं से अपनी सन्तानों को लैस करने के माता-पिता के विशेषाधिकार पर हुबहू अमल होता रहे या दूसरा रास्ता यहभी हो सकता है कि इस मसले को खोल दिया जाए तथा इसे बालमन की विशिष्ट स्थिति में सिचुएट करके देखा जाए।

प्रख्यात ब्रिटिश विद्वान रिचर्ड डाॅकिन्स – जिन्होंने बाल मन पर होने वाले धार्मिक प्रभावों के परिणामों पर विस्तार से लिखा है – के विचारों से इस मसले पर रौशनी पड़ती दिखती है। अपनी बहुचर्चित किताब ‘गाड डिल्यूजन’ में वह एक छोटासा सुझाव यह देते हैं कि क्या हम ‘‘ईसाई बच्चा/बच्ची’’ कहने के बजाय ‘‘ईसाई माता-पिता की सन्तान’’ के तौर पर बच्चे/बच्ची को सम्बोधित नहीं कर सकते ताकि बच्चा यह जान सके कि आंखों के रंग की तरह आस्था को अपने आप विरासत मे ग्रहण नहीं किया जाता।

वैसे बच्चे के धर्म को लेकर जारी चर्चा में हम भारतीय संस्कृति की धूमिल होती जा रही वैज्ञानिक चिन्तन की धारा की झलक भी देख सकते हैं। सभी जानते हैं कि आज से ढाई हजार साल पहले महात्मा बुद्ध ने एक वैचारिक क्रान्ति का आगाज़ किया था। बुद्ध के बारे में यह बात प्रसिद्ध है कि उनके मृत्यु के पहले उनके परमशिष्य आनन्द ने उनसे अन्तिम सन्देश पूछा था। बुद्ध का जवाब था ‘अप्पो दीपम् भव्’ ! अपने दीपक आप बनो।

क्या हम अपनी सन्तानों को भी यह कहने का साहस बटोर सकते हैं।

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