यह कैसी सत्ता-संस्कृति है भाई? – कृष्ण प्रताप सिंह

4:46 pm or April 11, 2018
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यह कैसी सत्ता-संस्कृति है भाई?

  • कृष्ण प्रताप सिंह

अपको याद होगा, पिछले साल उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने के फौरन बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगभग इन्हीं दिनों अपने गृहनगर गोरखपुर में पत्नी सारा की हत्या के आरोपी नौतनवां के निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी के साथ एक कार्यक्रम का मंच साझा करने को लेकर निशाने पर थे। कवयित्री मधुमिता शुक्ला की बहुचर्चित हत्या में उम्रकैद भुगत रहे अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि ने तब मुख्यमंत्री को मंच पर कुछ कागजात दिये और पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया था। अब खबर है कि गत मंगलवार को गोरखपुर पहुंचे मुख्यमंत्री ने उन्हीं अमनमणि से जुड़े एक मामले में इंसाफ मांगने आये लखनऊ के आयुष सिंघल नामक फरियादी को उसकी पूरी बात सुने बिना धक्का देकर बाहर जाने को कह दिया। फरियादी की मानें तो वह उस गोरखनाथ मंदिर में, योगी जिसके पीठाधीश्वर हैं, उनके द्वारा पूजा-अर्चना और गोसेवा करने के बाद लगने वाले उनके जनता दरबार में गया था, जहां उन्हें अपनी फाइल दिखाई तो उन्होंने न सिर्फ फाइल फेंककर उसको धक्का दिया, बल्कि यह भी कहा कि अब उसके मामले में कभी कोई कार्रवाई नहीं होगी। इससे वह निराश तो है ही, अपमानित भी महसूस कर रहा है।

आयुष की शिकायत लखनऊ के पपनामऊ, चिनहट में 22.5 बीघे भूमि पर पितापुत्र अमरमणि व अमनमणि के कब्जे से जुड़ी है और उसका दूसरा पहलू भी हो सकता है। यह भी कि सब कुछ वैसा ही न हुआ हो जैसा वह बता रहा है। फिर भी, मुख्यमंत्री द्वारा उससे किये गये बरताव को किसी भी पहलू से उचित या स्वीकार्य नहीं करार दिया जा सकता। हमारा लोकतंत्र कैसा भी बूढ़ा, बदहाल, अशक्त या फटेहाल हो गया हो, उसमें सत्ताधीशों को राजाओं जैसे बरताव पर उतर कर जनता को जनार्दन के आसन से उतारने और प्रजा मानकर उस पर अपनी मर्जी थोपने व पीड़ित करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

हां, कथित रामराज्य की रट लगाते-लगाते मुख्यमंत्री राजतंत्रीय मानसिकता में ही जीने लगे हों और सत्तामद में खुद को राजा से कम नहीं मान पा रहे हों तो भी फरियादी से यों दुव्र्यवहार से पहले उन्हें कौटिल्य यानी चाणक्य का लिखा यह श्लोक जरूरत याद कर लेना चाहिए था, जिसमें राजा के कर्तव्यों का जिक्र है: प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्। {प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है। प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए। जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है।}

लेकिन वे तो चाणक्य को कौन कहे, उन गोविन्दवल्लभ पंत को भी याद नहीं कर पाये, जो प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर आगे के मुख्यमंत्रियों को अपना काम तत्परतापूर्वक निपटाने के लिए अपनी टेबल को पेपरों और कारीडोर को विजिटरों से पूरी तरह ‘फ्री’ रखने की नसीहत दे गये हैं। वे कहते थे कि जो भी फरियादी मुख्यमंत्री के पास आये, उसे पहली बार में ही बिना देरी के अपनी समस्या का सम्पूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाधान मिलना चाहिए।

फिर फरियाद लेकर जनता दरबार में पहुंचे आयुष ने कुछ अमर्यादित, अशोभनीय, गैरकानूनी या उनकी शान में गुस्ताखी जैसा किया था, तो भी सभ्यता और शिष्टाचार का ही नहीं, सरकारी नियमों और परम्पराओं का भी तकाजा था कि वे उसे सार्वजनिक तौर पर धकियाने या अपमानित करने के बजाय उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई कराते। इसके लिए उन्हें कहीं जाने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि उनके ‘जनता दरबार’ में ही इसके लिए सक्षम मशीनरी मौजूद थी। इस सिलसिले में गोरखपुर के जिला मजिस्ट्रेट के. विजयेंद्र पांडियान का यह कथन विश्वसनीय नहीं लगता कि आयुष पूरे दस्तावेजों के साथ नहीं आया था और मुख्यमंत्री ने उसको उन्हें जुटा लेने के बाद आने को कहा था। ऐसा होता तो वह आश्वस्त होकर वापस चला जाता या अपमानित किये जाने का उलाहना देकर रोता-बिसूरता?

ऐसे में, जो कुछ भी हुआ, उसके मूल में जाना हो तो यह कोई बताने की बात नहीं है कि योगी के कई अपने भी स्वीकारते हैं कि ‘महाराज जी का स्वभाव ही कुछ ऐसा है’, जिसे वे मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बदल नहीं पा रहे। प्रदेश में अपराध उन्मूलन के नाम पर उन्होंने जिस तरह अपनी पुलिस को कथित अपराधियों को तथाकथित एन्काउंटरों में मार गिराने की छूट दे रखी है, वह नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रीकाल में गुजरात में हुई कई बहुचर्चित मुठभेड़ों की याद दिलाती है। विधानमंडल में होने वाली चर्चाओं में हस्तक्षेप करने या उनका जवाब देने खड़े होते हैं तो भी अभिमान व अहंकार को परे नहीं रख पाते। न सिर्फ विपक्ष को धमकाते हैं बल्कि समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों को ठेंगे पर धर देते हैं। भगवा छोड़ न कोई और रंग गवारा कर पाते हैं और न खुद को इस लोकतांत्रिक समझदारी से बावस्ता कर पाते हैं कि चमन में इख्तिलात-ए-रंगो बू सें बात बनती है, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो, हमीं हम हैं तो क्या हम हैं?

लेकिन मामले को देश की वर्तमान सत्ता-संस्कृति से जोड़कर देखें और इस सवाल का सामना करें कि योगी जैसे अगम्भीर व अंशकालिक {इसलिए कि वे स्वयं कह चुके हैं कि वे पूर्णकालिक नेता नहीं हैं} सत्ताधीशों को ऐसी निरंकुशता की प्रेरणा कहां से मिलती है और क्यों अब वे दिखावे के लिए भी लोकतांत्रिक नहीं हो पाते, तो योगी का कुसूर छोटा और जिसकी परम्परा से वे आते हैं, उस राजनीतिक व ‘सांस्कृतिक’ जमात का बहुत बड़ा लगता है।  आखिरकार वही तो अपने तमाम फासीवादी कुतर्कों के सहारे उन जैसों को आगे लाती, पालती-पोसती और बड़ा करती रहती है और उसी के कारण उत्तर प्रदेश के बाहर देश के उसके द्वारा शासित दूसरे हिस्सों में भी नाइंसाफियों के खिलाफ आवाजें उठाने वालों का हाल आयुष जितना ही बुरा है?

याद कीजिए, पिछले दिनों कई और सूबों के साथ महाराष्ट्र में किसान अपना हक मांगने सड़कों पर उतरे, तो क्या हुआ? पहले उन पर बेसिरपैर की तोहमतें लगाई गयीं, फिर आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। इस तरह वे एक बार फिर ठगे गये। फिर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने लोकपाल की अपनी पुरानी मांग के समर्थन में अनशन का एलान करते हुए कहा कि वे अपने मंच पर राजनीति नहीं होने देंगे। लेकिन अंततः वे राजनेताओं के हाथों जूस पीकर लौट जाने को मजबूर हुए और सरकार को हिलाकर रख देने जैसी उनकी बातें खुद ही हवा में लटक गईं।
इसके बाद बारी आई बार-बार पेपर लीक और नियुक्तियों में भ्रष्टाचार झेल रहे छात्रों, परीक्षार्थियों और नौजवानों की। वे इस कदर पीड़ित हैं कि समझ नहीं पा रहे कि आंदोलन करें या पढ़ाई। 2 अप्रैल तो अभी ताजा ताजा है, जब देश भर में दलित सड़कों पर उतरे-एससी एसटी अत्याचार निवारण ऐक्ट में बदलाव का विरोध करने के लिए ‘भारत बंद’ करवाने। फिर तो कई राज्यों में ऐसी हिंसा भड़की कि दर्जन भर से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। करोड़ों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ, सो अलग। सत्ताधीश और उनके संचार व समाचार माध्यम इसके फौरन बाद यह ‘सिद्ध’ करने में लग गये कि इस सारे फसाद की जड़ में दलित ही हैं।

जो नरेन्द्र मोदी सरकार कहती है कि संसद में एससी-एसटी के कुल 131 सांसदों में 67 सांसद उसी के हैं, उसे यह बताना तक गवारा नहीं हुआ कि फिर वह दलितों की पीड़ा समझने में नाकाम क्यों रही? क्यों वह उनका भरोसा नहीं जीत पा रही? जैसे वह भरोसा  नहीं जीत पा रही, रामनवमी जुलूसों के बाद सांप्रदायिक हिंसा रोकने में विफल उसकी कई राज्य सरकारें ‘भारत बंद’ के दौरान उफनाया हिंसा का सैलाब भी नहीं रोक पाईं और अब इससे जुड़े सारे ठीकरे दलित आंदोलन पर फोड़ रही हैं-जानबूझकर, ध्यान भटकाने के लिए, जबकि हिंसा का कहर भी सर्वाधिक दलितों पर ही टूटा है।

अब जब सांप चला गया तो ये सरकारें लकीर पीटने की तर्ज पर कानून-व्यवस्था संभालने में लगने का दावा कर रही हैं, पर यह नहीं बता रहीं कि ‘भारत बंद’ की स्थिति का सही अंदाजा लगाकर उन्होंने पहले ही उपयुक्त कदम क्यों नहीं उठाये गये? क्यों राजस्थान में करणी सेना को दलितों के बंद के हिंसक विरोध के लिए ‘निर्भय’ किये रखा गया? इस हद तक कि वह कभी पुलिस की तो कभी गुंडों की भूमिका निभाने लगे। अब वहां बात दलित विधायक के घर में आग लगाने तक जा पहुंची है।

हिंसा किसी भी तरह की हो और किसी भी पक्ष से हो, वह किसी भी सूरत में सही नहीं कही जा सकती। लेकिन राजस्थान में करणी सेना की हिंसा को लेकर राज्य सरकार का बरताव ऐसा है कि जैसे वह उसे हिंसा ही न मानती हो। कहा भले जाता है कि देश में कानून सबके लिए बराबर है, पर आजादी के इतने सालों बाद भी सत्ताएं न समाज में सबको बराबर होने दे रही हैं और न कानून के सामने। उलटे देश भर में गैरबराबरी व शोषण बढ़ा रही हैं। ताजा मामले में वे लगातार भ्रम फैला रही हैं कि एक तो दलितों का पक्ष गलत है और दूसरे हिंसक होने के कारण वे किसी सहानुभूति के पात्र नहीं हैं।

योगी भी देर-सवेर कोई न कोई ऐसा तर्क, और नहीं तो कुतर्क तो अवश्य ही, ढूढ़ लेंगे, जिससे साबित कर सकें कि उनके हाथों जनता दरबार में अपमानित होने वाला फरियादी आयुष उसी सलूक का पात्र था। लेकिन वर्तमान हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा ‘महान’ लोकतंत्र ऐसी ही असंवेदनशील व गैरजिम्मेदार सत्ता-संस्कृति का पात्र है? हां, इस सवाल का जवाब सत्ताधीशों को नहीं, उस जनता को देना है, जिसने उन्हें सत्ता सौंप रखी है।

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