स्कूल में प्रवेश दिलाने के नाम पर निजता पर हमला – सुभाष गाताडे

4:20 pm or April 18, 2018
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स्कूल में प्रवेश दिलाने के नाम पर

निजता पर हमला

  • सुभाष गाताडे

क्या किसी बच्चे को स्कूल में एडमिशन दिलाते वक्त उसके माता पिता से ऐसी जानकारी मांगी जा सकती है जो बेहद निजी हो। मसलन क्या संतान का कोई जेनेटिक डिसआर्डर तो नहीं है, बच्चे तथा उनके माता पिता का आधार नम्बर क्या है, परिजनों की सालाना आय, पैन नम्बर और खातों की संख्या कितनी है।

एक ऐसे समय में जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों की निजता की रक्षा के हक़ में अहम फैसला दिया है, उस माहौल में सूबा हरियाणा की खटटर सरकार ने स्कूल में एडमिशन फाॅर्म भरने के नाम पर छात्रों तथा उनके अभिभावकों से ऐसी जानकारी मांग रही है, जो इस अहम फैसले की बुनियादी भावना को ही प्रश्नांकित करती दिख रही है। इधर सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘‘प्रवेश उत्सव’’ के नाम पर हरियाणा के स्कूलों के शिक्षकों से गांव गांव जाकर छात्रों उनके अभिभावकों से संपर्क करने को कहा गया है और निजता के अधिकार का सरासर उल्लंघन करनेवाले इस फार्म के चलते उन्हें जगह जगह अभिभावकों के हाथों बेइज्जत होना पड़ रहा है।

गौरतलब है कि महज सरकारी स्कूल ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए ऐसे ही फार्म भरने को सरकार की तरफ से कहा गया है। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि जब इन फार्म के स्वरूप को लेकर – जो एक तरह से नागरिकों की जासूसी करते प्रतीत होते हैं – हंगामा मचा, तब सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने यह भी कहा कि उन्हें ऐसे फार्म की कोई जानकारी नहीं है तथा उन्हें नहीं मालूम कि इन फार्म को किसने जारी किया ? @https://www.ndtv.com/india-news/parents-in-unclean-occupation-haryana-students-allegedly-asked-in-form-1835720@

अधिक विवाद फार्म में पूछी गयी इस जानकारी से भी उठा है कि वह बताएं कि माता पिता किसी ‘‘मलिन पेशे’ में तो नहीं है। लाजिम है कि इसे लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार नागरिकों का धार्मिक एवं नस्लीय प्रोफाइलिंग कर रही है।

एक ऐसे समय में जबकि सूबा केरल सरकार की तरफ से बाकायदा विधानसभा में बताया गया कि केरल के स्कूलों में पढ़नेवाले – पहली से बारहवीं कक्षा तक के – एक लाख चैबीस हजार से अधिक बच्चों ने अपने प्रवेश फार्म में धर्म या जाति का उल्लेख नहीं किया है।  इनमें से एक लाख 23 हजार बच्चे पहली से दसवीं कक्षा के हैं जबकि एक हजार से अधिक बच्चे ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ते हैं। @https://www.telegraphindia.com/india/kerala-kids-keep-caste-religion-out-219238@ अर्थात केरल सरकार ने यह प्रगतिशील कदम बहुत पहले उठाया है कि वह अभिभावकों से उनकी निजी जानकारी मांगने में संकोच बरतती है, उस वक्त़ आयी यह ख़बर भारत के हर उस नागरिक को बेचैन कर सकती है, जो जानता है कि किस तरह हमारे देश में ऐसी श्रेणियों के नाम पर सरेआम भेदभाव चलता है।

सभी जानते है कि किस तरह स्कूलों में जाति के नाम पर छात्रों के साथ तरह तरह का भेदभाव चलता है।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ सूबा हिमाचल सूर्खियों में था जहां ‘‘परीक्षा पर चर्चा’’’ नाम से हुए प्रधानमंत्राी मोदी के सजीव प्रसारण के दौरान वहां के एक गांव में दलित छात्रों को बाकी छात्रों से अलग बिठाए जाने का मामला उठा था और अन्ततः सरकार को प्रधानाचार्य पर कार्रवाई करनी पड़ी थी।

मिड डे मील बनाने में अगर कोई दलित नियुक्त हुआ तो किस तरह उसे वहां से पलायन के लिए मजबूर किया जाता है। छूआछूत के नाम पर छात्रा पीटे जाते हैं। मिसाल के तौर पर एबीपी न्यूज ने दो साल पहले जोधपुर की वह ख़बर छापी थी कि किस तरह एक दलित छात्रा को बुरी तरह पीटा गया था जब मिड डे मील के दौरान दलित तबके से सम्बधित उपरोक्त छात्रा की थाली किसी गैरदलित छात्रा की थाली से छू गयी और उसी बात पर आग बबूला होकर अध्यापक ने बच्चे की बुरी तरह पीटाई कर दी, जिसके चलते उसे अस्पताल भेजना पड़ा /एबीपी न्यूज 3 अक्तूबर 2015/ वही बिकानेर के अन्य स्कूल में – नोखा तहसील के मेघवालों की धानियों का- जहां कार्यरत अध्यापक ने दलित छात्रों की इस वजह से बुरी तरह पीटाई की थी कि उन्होंने प्यास लगने पर स्कूल में ही रखे उपरोक्त अध्यापक के घड़े से पानी पिया था।

इतनाही नहीं स्कूलों में उन्हें ‘जातिसूचक’ काम भी करने पड़ते हैं। ख़बरें यह भी आती रहती हैं कि किस तरह उनसे जबरन टायलेट साफ करवाये जाते हैं क्योंकि स्कूल में सैनिटेशन कर्मचारी नियुक्त नहीं किए गए हैं। स्कूल की सफाई में लगे ऐसे ही एक छात्रा ने अख़बार के प्रतिनिधि को बताया था कि उन्हें मैदान, क्लासरूम तथा टायलेट सभी साफ करना पड़ता है और ‘चूंकि हम यहां पढ़ते हैं, हमें यह करना ही पड़ेगा वरना टीचर हमें टान्स्फर सर्टिफिकेट देने की अर्थात स्कूल से निकाल देने की धमकी देते हैं।’

एक तरफ 21 वीं सदी में सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के इरादे और दूसरी तरफ समाज मन में गहराई में धंसी भेदभाव की भावना, जो समाज के सबसे वंचित कहे जाने वाले तबकों के नौनिहालों पर कहर बन कर बरपा करती है ! आखिर हम किस ओर उन्मुख हैं ?

वर्ष 2014 में ‘जाति की वास्तविकता को लेकर सम्पन्न अबतक के सबसे बड़े सर्वेक्षण’ के नतीजे प्रकाशित हुए थे, जो दरअसल संविधान में दर्ज प्रतिबद्धता एवं जमीनी हकीकत के बीच व्याप्त अन्तराल को उजागर कर रहे थे। सर्वेक्षण के मुताबिक अस्पश्यता की औपचारिक समाप्ति के 64 साल बाद भी भारत के एक चैथाई लोग इस बात को स्वीकारते देखे गए कि वह किसी न किसी रूप में उस पर आज भी अमल कर रहे हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षण को नेशनल कौन्सिल आफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च और अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ मेरीलेण्ड द्वारा संयुक्त रूप से अंजाम दिया गया था।

देश के 42,000 घरों में सम्पन्न इस सर्वेक्षण में यह देखा गया कि अस्पश्यता की समस्या यहां उपस्थित सभी धर्मों में – हिन्दू, मुस्लिमर्, िसख, ईसाई, जैन तथा सभी जाति समूहों में – यहां तक की अनुसूचित जातियों-जनजातियों मे भी – नज़र आती है। जातिसमूहों के हिसाब से देखें तो इस  पर अमल सबसे अधिक ब्राहमणों द्वारा, बाद में अन्य पिछड़ी जातियों द्वारा किया जाता है। बताया जा रहा है कि ‘इंडिया हयूमन डेवलपमेण्ट सर्वे’ – जो गैरसरकारी स्तर पर सबसे बड़ा अखिल भारतीय सर्वेक्षण है – के अन्तर्गत 2011-12 में सम्पन्न प्रस्तुत सर्वेक्षण के निष्कर्ष  जल्द ही प्रकाशित होंगे। दिलचस्प था कि जिन लोगों ने यह कहा कि वह अस्पश्यता को नहीं मानते हैं, उन्हें जब यह पूछा गया कि क्या वह अनुसूचित तबके के किसी व्यक्ति को अपनी रसोई में घुसने देंगे तो सहभागियों में से 52 फीसदी ब्राहमणों ने, 24 फीसदी गैरब्राहमण फारवर्ड जाति से जुड़े लोगों ने, 33 फीसदी अन्य पिछड़ी जाति के लोगों ने 15 फीसदी अनुसूचित जाति के लोगो ंने तो 22 फीसदी अनुसूचित जनजाति से जुड़े लोगों ने साफ इन्कार किया।

छपते छपते यह ख़बर भी आयी है कि इस फार्म पर उठे विवाद के चलते सरकार ने इसे वापस लिया है, मगर 21 वीं सदी के इस अवसर में ऐसे फार्म का जारी हो पाना ही सरकार की संकीर्ण मानसिकता को रेखांकित करता है, जिसके खिलाफ आवाज़ उठाते रहने की जरूरत पड़ती रहेगी। याद रहे यह वही हरियाणा सरकार है जिसने गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों को चिन्हित करने के लिए उनके घरों पर अलग ढंग से निशान बनाने की योजना बनायी थी, जो बदस्तूर जारी है।

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