आखिर हो क्या गया है हमारे देश को, हमारी सभ्यता और संस्कृति ऐसी तो नही है! – योगेन्द्र सिंह परिहार

4:30 pm or April 21, 2018
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आखिर हो क्या गया है हमारे देश को, हमारी सभ्यता और संस्कृति ऐसी तो नही है!

  • योगेन्द्र सिंह परिहार

कठुआ, उन्नाव में बालात्कार की घटनाओं से देश दहल उठा और इन घटना में शिकार हुई बेचारी मासूमों की अंत्येष्टि की आग अभी ठंडी भी नही हुई थी कि फिर एक दिल दहला देने वाली खबर कि मध्यप्रदेश के इंदौर में एक नन्ही मासूम बच्ची से रेप के बाद बर्बर हत्या ने पूरे देश को फिर शर्मसार कर दिया। ये चिंता का विषय है आखिर ये हो क्या गया है हमारे देश को, हमारी सभ्यता और संस्कृति ऐसी तो नही है! मैं बार-बार ये कहता हूँ कि समस्या की जड़ पर जाना होगा। कहीं न कहीं इन घटनाओं के पीछे युवाओं में बढ़ती सस्ते नशे की प्रवृत्ति और शिक्षित व अशिक्षित बेरोजगारी का बहुत बड़ा हाथ है। करोड़ों युवा बेरोजगार बैठे हैं, उनकी शादी की उम्र बढ़ती जा रही है, नौकरियां लग नही रही, दिन-रात खाली बैठे हैं और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है और उस पर नशे करने की आदत हो जाए तो फिर किसी भी दुर्घटना के होने की संभावनाओं को रोका नही जा सकता।

अपने आस-पास ही देख लें, जैसे मैं भोपाल में रहता हूँ यहां 100 से अधिक सिर्फ इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। तो पूरे मध्यप्रदेश में इनकी संख्या 500 का आंकड़े छू जाती होगी। ये इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, बाकि अन्य विषयों के मिलाकर सभी महाविद्यालयों की संख्या इससे भी कहीं अधिक है, जबकि देखा जाए तो मध्यप्रदेश में जो अशिक्षा की स्थिति है उस हिसाब से तो अभी भी हज़ारों शिक्षण संस्थाओं की ज़रूरत है। वर्तमान स्थिति में मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों से लाखों युवा हर साल उच्च शिक्षित हो रहे हैं, उनमें से कुछ की अच्छी नौकरी लग जाती है और ये मान भी लेते हैं कि उनमे से कुछ पकौड़े भी बेच रहे होंगे तब भी कुछ नही तो 70 प्रतिशत फिर भी बेरोजगार घूम रहे होंगे ये कहना अतिश्योक्ति नही होगी। इनमें से अधिकांश बच्चे नशा कर रहे हैं ये बात भी उतनी ही सही है इससे कोई इनकार नही कर सकता। मैं भोपाल के जिस क्षेत्र में निवास करता हूँ उसी ओर सबसे ज्यादा कॉलेजेस हैं, हम जैसे ही अपनी कॉलोनी से बाहर निकलकर शहर की तरफ बढ़ते हैं, हमें आसानी से पान की गुमठियों में और कलारी में देश का भविष्य खड़ा हुआ मिल जाता है। मैं अक्सर अपने भाई से पूछता हूँ ये बच्चे जो सिगरेट पी रहे हैं इनकी उम्र क्या होगी, तो वो तपाक से जवाब देता है भैया होंगे ज्यादा से ज्यादा 20 साल के और मैं मन मसोस के उन्हें देखकर लगभग रोज़ ये कहता हूँ कि क्या होगा इस देश का भविष्य जिसके नौनिहाल इस कदर जवानी में ही नशे में तर हो रहे हैं?

ये नशा प्रवृत्ति सिर्फ युवाओं में है ऐसा नही है हाँ ये कह सकते हैं यही युवा अब बड़े हो गए हैं और भांग, गांजा, चरस-अफीम, सिगरेट-बीड़ी और शराब की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे हैं। कभी नशे की वजह से सनकते हैं तो कभी शून्य हो जाते हैं। जब अपने घर शाम को पहुंचते हैं तो घर वालों से चिढ़-चिढ़ाते हैं, खूब लड़ाई करते हैं बल्कि पूरा घर सिर पर उठा लेते हैं, ये सामान्य से लक्षण हैं नशे की लत में फंसे नैजवानों के। मेरा ऐसा मानना है कि कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों को बुरे संस्कार नही देता, बच्चे बिगड़ते हैं बुरी आदतों से, बुरी संगतों से। परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर निगरानी रखें और खासतौर से संगत पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।

मैं जड़ की बात कर रहा हूँ और इस विकृत और वीभत्स समस्या की जड़ यही है, सस्ता और आसानी से उपलब्ध नशा, जो दिमाग को शून्य कर देता है और परिवार के संस्कारों को पीछे धकेलकर वो सब करवा देता है जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती। बताइए नन्ही सी बच्ची से बलात्कार की कोई कल्पना कर सकता है कितना घृणित और लज्जित कर देने वाला काम, उसके बाद उस नन्ही सी बच्ची को तड़पा तड़पा कर मार देना, ऐसे समाज की कल्पना हमने और आपने तो कभी नही की होगी। मुझे इंदौर की इस घटना की जानकारी मेरे एक मित्र ने बीती रात को दी, मैं सच बता रहा हूँ कि कुछ पल तो मैं सोच और समझ ही नही पाया, मेरे शरीर मे अजीब सी कंपन और सिहरन होने लगी फिर सोचा कि कैसे कोई इतनी छोटी बच्ची के साथ इतना घिनौना काम कर सकता है। सरकार के ये नारे “बेटी बचाओ” सब बकवास है, बेटी बचाओ का नारा भ्रूण हत्या को रोकने का है न! क्यों बचाएं बेटियों को इसीलिए कि एक नन्ही सी बच्ची एक नरभक्षी दरिंदे की शिकार हो जाए, आखिर क्या ज़रूरत है बच्चियों कि जब इसी तरह उनको तड़पा-तड़पा कर मार डालना है, इससे तो अच्छा है कि उनको आने ही न दो इस संसार में, कम से कम घृणित और लज्जित कार्य से तो बच जाएंगी बेचारी मासूम।

मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि वर्तमान केंद्र और राज्य की सरकारें दोषी हैं जिनका किसी भी बात पर नियंत्रण नही है, न युवाओं को रोजगार देने पर, न युवाओं को नशे की ओर बढ़ते कदमों को रोकने पर। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अपने आपको बच्चियों का मामा कहते हैं, फिर अपनी भांजियाँ पर हो रहे इस कदर अत्याचार पर मौन क्यों रहते हैं? इस तरह की घटनाओं के पुलिस कर्मी भी दोषी हैं जो ये जानते हैं कि कौन उनके क्षेत्र में सस्ता और घटिया नशा बेच रहा है, कमीशन खोरी की वजह से इन पुलिसकर्मियों को देश के भविष्य की चिंता नही हैं, लेकिन साहब ये लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि इन्होंने भी अपने बच्चों को बाहर पढ़ने भेजा है और उस जगह भी इसी तरह से घटिया नशा बच्चों को परोसा जा रहा है, तब कैसे अपने बच्चों को बचा पाएंगे। बच्चों के भविष्य की खातिर ही सही या यूं कहिए अपने देश के भविष्य की खातिर सक्षम अधिकारियों को नशा बेचने में अंकुश लगाना चाहिए।

दिल्ली में वर्ष 2012 में एक बेटी निर्भया के साथ वीभत्स सामूहिक बालात्कार की घटना हुई और उस वक़्त लगा कि समूचा देश जैसे बेटियों के साथ खड़ा हो गया हो, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, ये घटनाएं बढ़ती ही गई और मानवता शर्मसार होती रही। निर्भया रेप केस का कुछ राजनीतिक लोगों ने जमकर फायदा उठाया और निर्भया की घटना को अपनी चुनावी सभाओं में उल्लेख कर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर लोगों को सरकार बदलने के लिए प्रेरित किया, सच मानिए, देश गुस्से में था और सरकार बदल भी गई। लेकिन वर्तमान सरकार अब बेटियों की सुरक्षा की हिमायती क्यों नही है? क्यों विदेश में जाकर प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी कह रहे हैं, रेप, रेप होता है विपक्ष इसमें राजनीति न करे। क्या मोदी जी अपने गिरेबान में झाकेंगे कि कैसे उन्होंने लोकसभा चुनाव में निर्भया कांड को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भले ही केंद्र में कांग्रेस की सरकार चली गई हो लेकिन मै और मेरे जैसे हज़ारों-लाखों लोग सलाम करते हैं उस राहुल गांधी को जो बर्बर बालात्कार की शिकार हुई निर्भया के परिवार के साथ खड़े हो गए, उन्होंने किसी को इस बात की भनक लगने नही दी और वही राहुल गांधी ने निर्भया के एक भाई को पायलट बनने में मदद की और दूसरे की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठा रहे हैं। निर्भया की मां ने यहां तक कहा कि उस घटना के बाद हम लोग टूट गए थे, हमारी कोई सुध लेने वाला नही था तब राहुल और प्रियंका हमारे बेटों से बात करते थे, हमें ढाँढस बँधाते थे। निर्भया की माँ ने एक और ज़ोरदार बात कही कि जिस दौर में कोई व्यक्ति एक जोड़ी चप्पल बांटता है तो सार्वजनिक मंचों में बताता फिरता है और ऐसे दौर में राहुल गांधी ने हमारे परिवार की मदद की और उन्होंने किसी को कानों-कान खबर नही होने दी। मैं राजनीतिक बातों में नही जाना चाहता, लेकिन मुझे जो बात दिल को छू गई वो मैंने इस लेख में इंगित की और ये बात किसी भी सभ्य आदमी को अच्छी लगेगी यदि कोई इस तरह से किसी रेप पीड़िता के परिवार की मदद करेगा।

माननीय मोदी जी सही कह रहे हैं, रेप-रेप होता है, इसमें राजनीति नही होना चाहिए, मैं भी इसका पक्षधर हूँ कि ये विषय राजनीति करने का नहीं है लेकिन इस दिशा में कड़े कदम तो उठाने होंगे वो कौन उठाएगा। निर्भया का जब मामला आया था तब तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की सरकार ने निर्भया फण्ड बनाया था, लेकिन आंकड़े दर्शाते हैं कि इस योजना के लिए आवंटित फण्ड का करीब 70 प्रतिशत वर्तमान सरकार ने इस्तेमाल ही नही किया। तो जनाब राजनीति विदेश की धरती से आप भी मत करिए और स्वदेश में आकर बेटियों की सुरक्षा को लेकर आप कितने गंभीर हैं, ये बताने का कष्ट कीजिये। क्योंकि ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है और ये अन्याय एक सीमा तक ही सहन कर पायेगी, कब उखाड़ फेंकेगी पता भी नही चलेगा।

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