मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति – डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

4:23 pm or April 24, 2018
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मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

  • डॉ.अर्पण जैन अविचल

भारत के भाल से पढ़े जा रहें कसीदे, कमलनी के तेज पर प्रहार हो रहा है, समाजवाद से गायब समाज है, वामपंथी भी संस्कृति और धर्म के बीच का अन्तर भूल चुके हैं, न देश की चिन्ता है,न ही परिवेश की | धर्म और जातियों के जहर में मासूम चित्कारों के गर्म तवे पर राजनैतिक खिचड़ी पकाई जा रही है, शर्म करों सत्ता के धृतराष्ट्र, शर्म करों जनता के कंधों और भावनाओं का इस्तेमाल करने वालों, शर्म करों….

देश में विगत एक पखवाड़े में लगातार ३ मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म हुआ, कठुआ, उन्नाव और इंदौर |  सत्तामद में डूबे नेताओं ने उस पर भी राजनीति करना शुरू कर दी | एक और मोमबत्ती गेंग सक्रिय हो गई दूसरी और राजनेताओं का जुलूस और शक्ति प्रदर्शन |

कोई तंत्र को दोषी ठहरा रहा हैं तो कोई जागरूकता की कमी | असल मानों तो यह बलात्कार की घटनाएँ केवल और केवल मानवता की हार से ज़्यादा नहीं | मानवीय धर्म कमजोर पड़ चुका हैं, क्योंकि व्याभिचारी कितना भी गिर क्यों न जाए पर जब बात मासूम की आती है तो शायद वो भी थोड़ा तो मानवीय हो सकता है | परंतु ऐसा नहीं होना मतलब साफ तौर पर मानवीय पहलू में छिपी सांस्कृतिक अक्षुण्णता नस्ते-नाबूत हो चुकी हैं |

किस मानसिक अवसाद के चलते यह कुकृत्य हो रहे है, यह तो जानना कठिन है किंतु इतना तो हम समझ ही सकते है क़ि कहीं न कहीं मानव धर्म ख़तरे में हैं | कोई हिंदू का तो कोई मुस्लिम का बलात्कार बता रहा हैं, परंतु बलात्कार धर्म का नहीं बल्कि लड़की का होता है, जिसका धर्म मायने नहीं रखता, अस्मिता मायने रखती हैं |

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारतभर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी इज़्ज़त गंवा देती हैं, लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं हो पाती।

प्रत्येक वर्ष बलात्कार के मामलों में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे। आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

बलात्कार के मामलों में मध्यप्रदेश सबसे अव्वल रहा, जहां 1,262 मामले दर्ज हुए, जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (1,088) और महाराष्ट्र (818) रहे। इन तीनों प्रदेशों के आंकड़े मिला दिए जाएं तो देश में दर्ज बलात्कार के कुल मामलों का 44.5 प्रतिशत इन्हीं तीनों राज्यों में दर्ज किया गया। यह आंकड़ा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीबी के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। पिछले कुछ दिनों में ही दिल्ली में कार में बलात्कार के कई सनसनीखेज मामले दर्ज हुए। दूसरी ओर राजस्थान की राजधानी जयपुर भी बलात्कार के मामलों में देशभर में पांचवें नंबर पर है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल और पुणे के बाद जयपुर का नंबर इस मामले में आता है।

2007 से 2011 की अवधि के दौरान अर्थात चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मामले में दिल्ली नंबर वन रही। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी लगातार चौथे साल बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2011 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए, जबकि मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए। रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2008 के बीच 18 से 30 की उम्र के करीब 57,257 लोगों को गिरफ्तार किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा यह आंकड़े सिर्फ महिला अत्याचार के आधार पर जारी किए गए हैं।

बलात्कार के मामले में भारत विश्व की ‘डर्टी कंट्री’ की श्रेणी में शामिल हो रहा हैं, तब हमारी सरकारों और जनता की चिंता और बड़ जानी चाहिए, क्योंकि भारत का नाम विश्व पटल पर संस्कार सिंचन में अव्वल रहा हैं किंतु वर्तमान के हालात तो हमें दैहिक शोषण और यौन शोषण में ‘विश्वगुरु’ का दर्जा दिलाने से बाज नहीं आ रहे हैं |

‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, ‘भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद्र (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) के अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’

बलात्कार के मामलों की जांच में जुटे पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अधिकतर मामलों में आरोपी को पीड़िता के बारे में जानकारी होती है। यह एक सामाजिक समस्या है और ऐसे अपराधों पर नकेल कसने के लिए रणनीति बनाना असंभव है।

अधिकारियों की मानें तो इनमें से अधिकांश मामले बेहद तकनीकी होते हैं। अक्सर ऐसे अपराध दोस्तों या रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं, जो पीड़िता को झूठे वादे कर बहलाते हैं, फिर गलत काम करते हैं। कई बार ऐसे अपराध अज्ञात लोग करते हैं और पुलिस की पहुंच से आसानी से बच निकलते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इसमें पीड़िता की रजामंदी होती है। उसे इस बात के लिए रजामंद कर लिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया।

वर्तमान में बाल अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया ( पॉक्सो क़ानून) में बदलाव किया जिसमें १२ वर्ष के कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म करने पर फाँसी की सज़ा दी जाएगी| यह निर्णायक परिवर्तन आवश्यक है साथ ही समाज को भी इस तरह के आरोपी के परिवार का सामाजिक बहिष्कार भी करना चाहिए, ताकि दुष्कर्म करने जैसे घृणित कार्य करने के पहले व्यक्ति उसके परिवार की दुर्दशा से भी बाख़बर रहें |

हमारे राष्ट्र में यदि दुष्कर्म के मामलों में वृद्धि हो रही है तो देश के तमाम राजनैतिक दलों को मिलकर एक रूपरेखा बनानी चाहिए जिससे इस तरह की समस्या से देश को बचाए जा सके, और किस क़ानून और प्रावधान के तहत दुष्कर्मी को दंड दे सके ताकि भविष्य में कोई पुनरावृत्ति न कर सके, साथ ही देश के सभी धर्म गुरुओं को भी मानवीयता के गिरते स्तर पर चिंता जाहिर करते हुए उसे बचाने के प्रयास करना चाहिए, न की सड़कों पर निकल कर राजनीति |

हमारे राष्ट्र में चुनावी आक्षेप लगाना बहुत आसान हैं, जबकि यदि राष्ट्र की असमर ख़तरे में है तो हम सब की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है की सरकार के साथ मिल कर देश बचाएँ, मीडिया, राजनेता, समाजसेवी, आंदोलनकारी आदि सभीजन मिल कर इस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं, पर हमारे यहाँ सभी ज़िम्मेदारों को राजनीति करने से फुरसत मिले तब तो देश के बारे में सोचेंगे |

कठुआ, उन्नाव और इंदौर कांड पर भी सरे आम राजनीतिक प्रपंच किए गए, बयानबाजी, नारे-प्रदर्शन आदि आदि | किंतु समाधान की दिशा में किसी ने नहीं सोचा, न समाज ने, न ही समाज के ठेकेदारों ने| लिहाजा कुकृत्य होने से कोई रोक नहीं सकता, रोकना केवल मानवीयता के गिरते स्तर को है |

 

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