रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून – योगेन्द्र सिंह परिहार

12:57 pm or May 14, 2018
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रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून

  • योगेन्द्र सिंह परिहार

रहीम की ये पंक्ति पानी की महत्ता को दर्शा रही हैं कि यदि पानी नही रहेगा तो कुछ भी नही रहेगा। लेकिन ये सब बातें सुनता और समझता कौन है। करोड़ों लोगों की आबादी के इस देश ने उत्तरोत्तर प्रगति की है इससे कोई इनकार नही कर सकता लेकिन हमारी कुछ आदतों ने और कुछ व्यवस्था के दोषों ने पानी जैसी मूल भूत आवश्यकता से हमे वंचित करना शुरू कर दिया। न हम पानी को संचित करना सीख पाए और न ही संरक्षित करना।

मध्यप्रदेश के ही लगभग 32 हज़ार गांव और करीब 378 नगर ऐसे हैं जो बूंद बूंद  पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। बुंदेलखंड-बघेलखंड के सैकड़ों गांवों में ये स्थिति है कि प्रतिदिन महिलाओं को पीने के पानी के लिए 15 से 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। कई जगह ऐसे कुँए हैं कि उनमें जान जोखिम में डाल कर स्वयं उतरना पड़ता है तब जा कर लोगों के घरों में पीने का पानी पहुंच पाता है। ज़मीन से पानी खत्म हो रहा है, नदियां, तालाब और कुंए सूखने की कगार पर हैं। जहां एक ओर लोग बूंद बूंद पानी को तरस रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में लाखों लीटर पानी यूँ ही बह जा रहा है कभी पाईप लाइनों में लीकेज की वजह से तो कभी नागरिकों के लापरवाही पूर्ण पानी इस्तेमाल करने के तरीकों से। लेकिन परवाह किसी को भी नही है कि समूचा देश सूखे की और बढ़ रहा है और भयावह संकट उत्पन्न होने वाला है।

आखिर पीने के पानी के लिए इतना संघर्ष क्यों है? मध्यप्रदेश कई नदियों का उद्गम स्थल है जिसमें नर्मदा नदी सबसे बड़ी और प्राचीन नदी है और कालांतर में मध्यप्रदेश वासियों के लिए पानी का एक मात्र विकल्प बचेगी। मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य हैं जहां सर्वाधिक 207 नदियां प्रवाहित होती हैं इसीलिए मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है। यहां क्षिप्रा, बेतवा, तवा, चंबल व ताप्ती जैसी बड़ी नदियां अपने उद्गम स्थल पर थोड़ी बहुत दिखाई देती है आगे जाकर लगभग मृतप्रायः होती जा रही हैं। छोटी छोटी सहायक नदियां विलुप्त हो चुकी हैं। जिसका मुख्य कारण है नदियों, तालाबों में अवैध अतिक्रमण और विकास की अंधी दौड़ व निजी स्वार्थ के लिए अंधाधुंध पेड़ों की कटाई। नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक में मेकल पर्वत में लाखों शाल के वृक्ष हैं और इन वृक्षों की खासियत है कि ये वर्षा के पानी को अपनी जड़ों में समाहित कर लेते हैं फिर यही पानी बूंद बूंद कर रिसता हुआ नर्मदा जी के उद्गम कुंड तक पहुंचता है फिर वहीं से ये नदी प्रवाहित होती हुई महाराष्ट्र होते हुए गुजरात में अरब सागर में मिल जाती है। मध्यप्रदेश की जीवनदायनी नर्मदा नदी जिन्हें लोग माँ कहकर पुकारते हैं वो भी शाल के वृक्षों की रोज होती कटाई से संकट से घिरी हुई हैं।

हम रोज सुनते हैं कि पेड़ हमारे जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी हैं चाहे वो प्राण वायु के लिए, चाहे छाया के लिए, चाहे फलों के लिए और चाहे पानी के लिए। पेड़-पौधें ही हमारा भविष्य सुरक्षित रख सकते हैं। ज़मीन में पानी पहुंचने के माध्यमों पर सभी को विचार करना चाहिए, कॉन्क्रीट का जंगल वर्तमान की ज़रूरत हो सकता है लेकिन लोगों के भविष्य को खत्म कर देगा ये भी तय है। मैं ये नही कहता कि सड़कें नही बने लेकिन सड़कों के लिए काटे जा रहे पेड़ों के लिए तय अनुबंध के अनुसार एक पेड़ काटने पर 5 से 10 पौधे नए रोपित किये जाने चाहिए, क्या कोई ये मॉनिटर कर रहा है कि ठेकेदार इन अनुबंधों को पूरा कर रहे है?

जनता जनप्रतिनिधियों को चुनती है, पंचायतों, निकायों, राज्यों और केंद्र में सरकार बनाती हैं, सरकारें अपने दायित्वों का निर्वहन ठीक से नही करती ये बात जन-जन को समझना होगा। क्या जन प्रतिनिधियों का काम उद्घाटन करना, भाषण देना और सिर्फ नए चुनाव जीतना है? लाखों लीटर पानी रोज लीकेज की वजह से बर्बाद होता हो तो जिम्मेदारी किसकी है, नगर निगमों में बैठे अधिकारी फिर क्या कर रहे हैं? वृक्षारोपण की मुहिम सिर्फ राजनीति के लिए करना, करोड़ों पौधे लगाने के झूठे कीर्तिमान बनाना, कहां तक उचित है? ये सवालिया निशान इसलिए कि जनता ने जिन्हें चुना है देश-प्रदेश के विकास के लिए वे लोक सेवकों, कर्मचारियों से काम करवाने में अक्षम हैं। पानी की समस्या को हल करने के लिए सभी दलों को राजनीति किनारे रख के संयुक्त अभियान चलाना चाहिए। पानी रहेगा तो ही जीवन रहेगा। पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून, यही बात सत्य है।

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