संयुक्त राष्ट्र संघ – लक्ष्य संख्या 17 “दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन बेहतर” – सुनील अमर

4:10 pm or May 22, 2018
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संयुक्त राष्ट्र संघ – लक्ष्य संख्या 17

दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन बेहतर

  • सुनील अमर

दुनिया के सभी देशों में तीव्र विकास और मानव जीवन के कल्याण की अवधारणा को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2030 तक प्राप्त करने के लिए जो 17 लक्ष्य निर्धारित किए हैं, उनमें से सत्रहवाॅं और अन्तिम लक्ष्य सतत् विकास के लिए वैश्विक साझेदारी बनाने का है और इस कार्य हेतु सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक संगठनों के एकजुट होकर कार्य करने के लिए प्रस्तावित है। संयुक्त राष्ट्र संघ यानी यूएनओ इसे वैश्विक भागीदारी कहता है। यह सच है कि तेजी से बढ़ रही आबादी की जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ सरकार और सरकारी संसाधनों के ही भरोसे नहीं रहा जा सकता लेकिन इस सत्य का दूसरा पहलू यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनका विकास निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ देने से नागरिकों के सतत् विकास की जगह उनका सतत् शोषण शुरु हो जाता है। कम से कम भारत के सन्दर्भ में तो हम इसे देख ही रहे हैं। यूएनओ का कहना है कि सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक संगठनों की यह सहभागिता जो मूल्यों और सिद्धान्तों, साझा दृष्टिकोण और साझा उद्देश्य को लेकर हो तथा जिसके केन्द्र में मानव जीवन और यह भूमण्डल हो, आज वैश्विक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर की आवश्यकता है।

मानव जीवन की जो आधारभूत आवश्यकताऐं हैं उनमें सिर्फ रोटी (साथ में पानी भी), कपड़ा और मकान ही नहीं, आज शिक्षा, सफाई और स्वास्थ्य भी शामिल हो गया है। सफाई और स्वास्थ्य दो ऐसे मसले हैं जो कमोबेश प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करते हैं और इस प्रकार यह बहुत व्यापक विषय बन गया है। इसी प्रकार पानी सिर्फ पीने और नहाने का ही नहीं, बल्कि आज यह एक उद्योग जैसा हो गया है जिसमें कृषि, बागवानी और उद्योग-धन्धे भी समाहित हो गए हैं। इन सबके समग्र और त्वरित विकास के लिए यूएनओ ने आर्थिक सहयोग के साथ-साथ एक ढ़ाॅंचागत व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया है जिसमें वित्त, तकनीक, क्षमता निर्माण, व्यापार तथा व्यवस्थागत मुद्दे जैसे नीतियाॅं और सांस्थानिक विषय शामिल हैं। अपने नीतिगत निर्देशन में यूएनओ कहता है कि किसी भी देश में विकास कार्यों की रुपरेखा, उस देश की नीतियों के अन्तर्गत ही तैयार की जानी चाहिए। हालाॅंकि व्यवहार में ऐसा बहुत कम होता है और यूएनओ अपनी प्रमुख नीतियों को थोपता रहता है। भारत में भी इसका अपवाद नहीं है। मुक्त व्यापार और जी.एस.टी. को लेकर हम इसे महसूस कर सकते हैं।

जब भी विकास और व्यवस्था की बात की जाती है तो सबसे पहला प्रश्न वित्तीय क्षमता का आता है और दूसरा प्रश्न विकास को लेकर सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता का। दुनिया में कई देश ऐसे हैं जो आर्थिक रुप से सम्पन्न हैं लेकिन विकास के नाम पर वे काफी पीछे हैं क्योंकि वहाॅं के शासन तन्त्र की प्राथमिकता में ऐसा है ही नहीं। इनमें खासकर तेल उत्पादक देशों का नाम लिया जा सकता है। यूएनओ के स्थापनाकाल से लेकर आज तक वहाॅं अमेरिका का प्रभुत्त्व रहा है क्योंकि यूएनओ को सबसे ज्यादा चन्दा अमेरिका ही देता है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यूएनओ कोष में भारत की सहभागिता मात्र 0.73 प्रतिशत ही है जबकि अमेरिका 22 प्रतिशत मदद देता है! यही वजह है कि यूएनओ की रीति-नीति पर अमेरिकी प्रभाव प्रत्यक्ष रहता है। इसे कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि दुनिया के सभी विकासशील देशों पर अमेरिका इस बात का दबाव बनाता रहता है कि वे कार्बन उत्सर्जन पर लगाम लगाऐं और हथियारों की दौड़ से विलग रहें लेकिन इन दोनों ही कामों में वह दुनिया का सिरमौर है। सभी जानते हैं कि दुनिया के तमाम देशों और यहाॅं तक कि आपराधिक संगठनों को भी, घातक हथियार अमेरिका के सौजन्य से ही प्राप्त होते रहे हैं।

अपने ‘टारगेट’ चैप्टर के अन्तर्गत वित्तीय संसाधनों के बारे में यूएनओ कहता है कि अन्तरराष्ट्रीय मदद से विकासशील देशों के घरेलू संसाधनों को और मजबूत किया जाय ताकि उनकी टैक्स और अन्य राजस्व उगाहने की घरेलू क्षमता का विकास हो सके। यूएनओ के इन्डिया पेज पर भारत बताता है कि घरेलू संसाधनों के विकास के तौर पर एक क्रान्तिकारी कदम उठाते हुए कर प्रणाली में सुधार किया गया है जिसके तहत साधारण और एकरुप अपरोक्ष टैक्स की व्यवस्था जीएसटी के नाम से की गयी है तथा स्वच्छ भारत अभियान के अन्तर्गत देश की जनता पर क्लीन इन्डिया सेस लगाया गया है। यूएनओ विकसित देशों से आग्रह करता है कि वे उसके कोष में अपने वादों के मुताबिक सहयोग देते रहें ताकि विकासशील देशों को मदद जी सके। इसकी सच्चाई को इस तरह से समझा जा सकता है कि चार साल पहले यूएनओ में इस बात पर सहमति बनी थी कि विकसित देश, अविकसित और विकासशील देशों में पर्यावरण सुधार के लिए प्रतिवर्ष साढ़े छह लाख करोड़ रुपया देंगें लेकिन इसका 10 प्रतिशत भी अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। वादा करके मुकर जाने की विकसित देशों की यह रीति यूएनओ के पर्यावरण संतुलन और प्रदूषण से बचाव मुहिम की हवा निकाल देती है।

यूएनओ के माध्यम से विकसित कहे जाने वाले देशों की दादागिरी और पक्षपातपूर्ण दबाव की रणनीति से आजिज विकासशील देशों ने विश्व बैंक और यूएनओ की स्थापना के एक दशक बाद ही अपना खुद का संगठन बनाकर अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की। वर्ष 1955 में इन्डोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो ने अपने बान्डुंग शहर में एशियन-अफ्रीकन कान्फ्रेन्स आयोजित की जिसे इतिहास में ‘बान्डुंग कान्फ्रेन्स’ के नाम से जाना जाता है। इस कान्फ्रेन्स को सुकर्णो ने ‘इतिहास की पहली अन्तरमहाद्वीपीय कलर्ड पीपल कान्फ्रेन्स’ का नाम दिया। इस नाम से ही सुकर्णो की पीड़ा का अनुमान लगाया जा सकता है। इसे भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बर्मा और इन्डोनेशिया द्वारा आयोजित किया गया था तथा इसमें कुल 29 देशों ने भाग लिया था। इन 29 देशों के ग्लोब के दक्षिणी हिस्से में पड़ने के कारण पश्चिमी देशों ने इसे ‘साउथ-साउथ कोआपरेशन’ का नाम दिया। साउथ-साउथ के सामने सबसे पहले अपना एक बैंक स्थापित करने का चैलेन्ज था ताकि वह अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्वबैंक के दबाव से बचने का एक विकल्प बना सके। यद्यपि इस कार्य में बहुत धीमी प्रगति हुई लेकिन ‘ब्रिक्स देशों’ (ब्राजील, रशियन संघ, इंडिया, चाइना, साउथ अफ्रीका) की छठवीं समिति की बैठक वर्ष 2014 में ब्रिक्स बैंक या कान्टिन्जेन्सी रिजर्व एग्रीमेन्ट की स्थापना की गई और इसके दो साल बाद यानी गतवर्ष चीन के बीजिंग शहर में ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेन्ट बैंक’ की स्थापना की गई है जिसमें ब्रिटेन, फ्रान्स, जर्मनी और उत्तर कोरिया जैसे 50 से अधिक देशों ने सदस्य बनने की इच्छा की है।

यूएनओ के दिशा निर्देशों के अनुसार भारत सरकार ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में काफी तेजी से कार्य किया है और इसके तीव्र विकास के लिए पर्याप्त धन, संसाधन व अन्तरराष्ट्रीय सहयोग उपलब्ध कराये हैं। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2022 तक अक्षय ऊर्जा से 150 गीगावाॅट बिजली प्राप्त होनी शुरु हो जाएगी। निश्चित ही यह एक उपलब्धि होगी। यूएनओ के एक अन्य निर्देश के अनुसार सरकार का एक बड़ा कदम एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति का बदलाव करना भी है। यह भी यूएनओ के विकास कार्यक्रमों का हिस्सा है। देश के भीतर इसके समर्थन और विरोध का अजब़ नाटक रहा है। संप्रग-2 की सरकार ने जब इसे लागू करने का मन बनाया था तो उस वक्त विपक्ष में बैठी भाजपा तथा गुजरात के तत्त्कालीन मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इसका जबर्दस्त विरोध किया था और भाजपा ने धरना-प्रदर्शन कर यह ऐलान किया था कि पार्टी अपनी आखिरी साॅंस तक एफडीआई का विरोध करेगी लेकिन केन्द्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा ने एकदम से पलटी मार ली और एफडीआई को कुछ इस तरह से लागू किया है कि आज लगभग तीन चैथाई क्षेत्रों में इसे सरकार से अनुमति लिए बिना ही 100 प्रतिशत निवेश करने की अनुमति है। निश्चित ही इस तरह की अनुमति का दूरगामी और बहुआयामी असर देश पर पड़ेगा।

क्षेत्रीय सहभागिता और कौशल विकास में सहयोग भी यूएनओ का एक एजेन्डा है। इस दिशा में भी भारत सरकार ने अच्छा कार्य किया है। ‘साउथ एशिया सेटेलाइट’ लाॅच कर भारत पड़ोसी देशों- नेपाल, बाॅग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान, मालद्वीप तथा श्रीलंका के साथ अपनी अन्तरिक्ष अभियान सम्बन्धी उपलब्धियों को साझा कर रहा है। पाकिस्तान अपने भारत विरोधी स्थायी दृष्टिकोण के चलते पड़ोसियों के इस समूह से बाहर है जबकि यूएनओ के वैश्विक साझेदारी अभियान के तहत भारत ने अन्य देशों के साथ पार्टनरशिप तथा संकल्प किया है। पर्यावरण संरक्षा और सुरक्षा के लिए बने ‘साउथ एशिया को-आपरेटिव इन्वायर्नमेन्ट प्रोग्राम’ की स्थापना वर्ष 1982 में आठ दक्षिण एशियाई देशों द्वारा की गई थी। ये देश हैं- अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बाॅग्लादेश, मालद्वीप और भारत। इसके अलावा समुद्र में काम करने वाले मछुआरों और अन्य लोगों के सहायतार्थ भारत सरकार के दो विभागों – सी.एम.एफ.आर.आई. तथा आई.एन.सी.ओ.आई.एस. ने मिलकर आई.सी.टी. यानी इन्फार्मेशन एण्ड कम्यूनिकेशन टेक्नालाॅजी का विकास किया है। इसी तरह वर्ष 1921 में स्थापित एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था आई.एच.ओ. यानी इन्टरनेशनल हाइड्रोग्राफिक आर्गेनाइजेशन है जिसका भारत सदस्य है। यह संस्था 87 देशों के साथ मिलकर समुद्रों की सुरक्षा-संरक्षा तथा समुद्रतटीय देशों के लिए सर्वेक्षण तथा चार्ट आदि तैयार करता है।

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