नेहरु जेल में भगत सिंह से मिले थे या नहीं, क्या लेना-देना है इसका वर्तमान से – राम पुनियानी

4:18 pm or May 22, 2018
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नेहरु जेल में भगत सिंह से मिले थे या नहीं, क्या लेना-देना है इसका वर्तमान से

  • राम पुनियानी

हाल में संपन्न कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई ऐसे वक्तव्य दिए, जो न केवल असत्य थे, बल्कि जिनका एकमात्र उद्देश्य उनके विरोधियों के विरुद्ध जनभावनाएं भड़काना था. कर्नाटक के बीदर में एक आमसभा को संबोधित करते हुए श्री मोदी ने एक सफ़ेद झूठ बोला. उन्होंने कहा, “जब शहीद भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और वीर सावरकर जैसे महान व्यक्तित्व स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के कारण जेलों में बंद थे, तब क्या कोई कांग्रेस नेता उनसे मिलने गया?” यह समझना मुश्किल है कि यह प्रश्न आज एक चुनावी मुद्दा कैसे हो सकता है.

भाजपा और अन्य सांप्रदायिक संगठनों की यह रणनीति है कि वे लोगों से जुड़े मूलभूत मुद्दों को परे खिसका कर, केवल भावनात्मक मसलों पर लोगों का ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं. मोदी लगातार अपने राजनैतिक विरोधियों पर कीचड़ उछालते आ रहे है और इसके लिए वे अत्यंत आत्मविश्वास से सफ़ेद झूठ बोलने से भी नहीं कतराते. उनके उपर्वर्णित वक्तव्य में, वे न केवल झूठ बोल रहे हैं बल्कि अपने नायक सावरकर का महिमामंडन करने का प्रयास भी कर रहे हैं.

सच यह है कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ अपने वैचारिक मतभेदों के बावजूद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इन नौजवानों के जज्बे और उनकी प्रतिबद्धता की कायल थी. ट्रिब्यून समाचारपत्र में नेहरु के भगत सिंह और उनके साथियों के साथ जेल में मुलाकात का समाचार प्रकशित हुआ था. ट्रिब्यून के  अगस्त 9 और 10, 1929  के अंकों में, जवाहरलाल नेहरु द्वारा लाहौर जेल में क्रांतिकारियों के साथ मुलाकात कर उनके हालचाल जानने का ज़िक्र है. मोतीलाल नेहरु ने आमरण अनशन कर रहे क्रांतिकारियों के साथ मानवीय व्यवहार की मांग करने के लिए एक समिति का गठन भी किया था. अपनी आत्मकथा में जवाहरलाल नेहरु ने भगत सिंह, जतिन दास और अन्य युवा क्रांतिकारियों से उनकी मुलाकात का मर्मस्पर्शी विवरण किया है. वे लिखते हैं, “जब में लाहौर पहुंचा तब तक उनकी भूख हड़ताल शुरू हुए एक महीना हो चला था. मुझे जेल में उनसे मिलने की अनुमति दी गयी और मैंने इस अनुमति का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया. मैंने भगत सिंह को पहली बार देखा और जतीन्द्रनाथ दास और कुछ अन्यों को भी. वे सभी बहुत कमज़ोर लग रहे थे और बिस्तर पर थे. उनसे ज्यादा बात करना संभव नहीं था. भगत सिंह का चेहरा अत्यंत आकर्षक था. वे एक बुद्धिजीवी नज़र आते थे और वे काफी शांत और गंभीर थे. वे अत्यंत सौम्यता से मेरी ओर देख रहे थे और मुझसे बातें कर रहे थे. परन्तु शायद जो भी व्यक्ति एक महीने से उपवास कर रहा होगा वह सौम्य और आध्यात्मिक दिखेगा. जतिन दास तो और भी नाज़ुक लग रहे थे – किसी युवा लड़की की तरह. जब में उनसे मिला तब वे बहुत कष्ट में थे. बाद में वे, उपवास के कारण, अपने आमरण अनशन के 61वें दिन, वे मृत्यु को प्राप्त हो गए”.

मोदी का दूसरा प्रयास है भगत सिंह जैसे समर्पित क्रांतिकारियों से सावरकर की बराबरी करना. यह सावरकर को वह सम्मान देने का एक कुटिल प्रयास है, जिसके वे हक़दार नहीं हैं. जब भगत सिंह उन्हें मौत की सजा सुनाये जाने की बाद जेल में थे, तब उनके परिवारजनों ने उनसे कहा कि वे ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांग लें. भगत सिंह ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. इसके विपरीत, उन्होंने ब्रिटिश सरकार को लिखा कि चूँकि उन्हें व उनके साथियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध करने के लिए मौत की सजा दी गयी है इसलिए उन्हें फांसी देने की बजाय, गोलियों से भून दिया जाना चाहिए. सावरकर, जिन्हें एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या के सिलसिले में सजा दी गयी थे, जेल में पहुँचते ही एकदम बदल गए. उन्होंने सरकार से क्षमा की भीख मांगते हुए कई चिट्ठियां लिखीं, सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया और यह वायदा किया कि वे भविष्य में उसकी मदद करेंगे. और जेल से रिहा होने की बाद वे अंग्रेजों के प्रति पूरी तरह से वफादार बने रहे.

तथ्य यह है कि सावरकर की स्वाधीन संग्राम में शुरूआती भूमिका को देखते हुए, कांग्रेस उन्हें रिहा करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही थी. सन 1920 की बाद से, जहाँ कांग्रेस उनकी निशर्त रिहाई के लिए प्रयास कर रही थे वहीं सावरकर सरकार को याचिकाएं भेज-भेज कर इस तरह के वायदे कर रहे थे जो एक तरह से संपूर्ण समर्पण था. “मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरे विरुद्ध प्रकरण पर निष्पक्ष विचारण किया गया और मुझे न्यायपूर्ण सजा दी गयी. मैं अपने सच्चे मन से उन हिंसक तरीकों को घृणास्पद मानता हूँ जिनका मैंने पहले प्रयोग किया. मैं यह मानता हूँ कि कानून और संविधान (ब्रिटिश) का पालन करना मेरा कर्त्तव्य है और मैं यथाशक्ति  “सुधारों” को सफल बनाने में उतना योगदान दूंगा जितना देने की मुझे अनुमति दी जाएगी” (सावरकर के ब्रिटिश सरकार को लिखे गए पत्र से). सावरकर ने कई ऐसे पत्र लिखे और अंततः अंग्रेजों ने उनकी क्षमा याचना को स्वीकार कर लिया.

उनके द्वारा की गयी यह क्षमायाचना, स्वाधीनता संग्राम से विश्वासघात था. उनके समर्पित अनुयायी यह कहते हैं कि सावरकर ने क्षमायाचना  एक रणनीति के तहत की ताकि वे रिहा होकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष कर सकें. सच यह कि सावरकर ने अपनी  रिहाई के बाद, हिन्दू राष्ट्रवाद की अवधारणा का प्रतिपादन किया, हिंदुत्व की बात कही और यह भी कहा कि भारत में दो राष्ट्र है – हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र. यह मुस्लिम लीग द्वारा प्रतिपादित मुस्लिम राष्ट्रवाद के समानांतर था. और इसने भारत के विभाजन में भूमिका अदा की.

तो एक तरफ मोदी उन कांग्रेस नेताओं के बारे में झूठ बोल रहे हैं जो आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे तो दूसरी और वे सावरकर और भगत सिंह को एक ही श्रेणी में रखना चाहते हैं. भगत सिंह कभी सरकार के आगे झुके नहीं और उन्होंने जेल में आमरण अनशन किया. सावरकर जेल की परिस्थितियों से घबड़ा गए और उन्होंने सरकार के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. मोदी गोएबेल्स की भाषा बोल रहे हैं.

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