इस चतुर्दिक पराजय के कुछ संकेत भी हैं – वीरेन्द्र जैन

7:16 pm or May 31, 2018
Bengaluru: Congress leaders Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, Karnataka CM H D Kumaraswamy, West Bengal CM Mamta Banerjee, Andhra Pradesh CM Chandrababu Naidu, Delhi Chief Minister Aravind Kejriwal, Kerala CM Pinariyi Vijayan and others during the ceremony, in Bengaluru, on Wednesday. (PTI Photo/Shailendra Bhojak)(PTI5_23_2018_000141B)

इस चतुर्दिक पराजय के कुछ संकेत भी हैं

  • वीरेन्द्र जैन

हाल ही में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव हुये थे और उसमें भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। उनकी छवि ऐसी है कि किसी मजबूरी के बिना कोई उनके साथ गठबन्धन नहीं करता। यही कारण रहा कि सबसे बड़ा दल होने और संसाधनों का भंडार होने के बाद भी जब उन्होंने जोड़तोड़ से सरकार बनाने की कोशिश की और उसमें राज्यपाल जैसी संस्था का अनैतिक सहयोग भी मिला तब भी वे सफल नहीं हो सके। समय रहते न्यायालय ने राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की रक्षा करते हुए भी प्राकृतिक न्याय किया और सच को सामने आने के खुले अवसर दिये। परिणाम यह हुआ कि आपस में विरोधी रहे दो पक्षों ने एक होकर बहुमत का निर्माण कर लिया और केन्द्र में सत्ता के लभ का झांसा भी काम नहीं आया।

कर्नाटक विधानसभा में भाजपा की सरकार बनने के लिए अनुकूल स्थितियां थीं। एंटी इनकम्बेंसी थी, त्रिकोणीय मुकाबला था, केन्द्र में सत्ता होने के अनेक लालच थे, स्थानीय बाहुबली, धनबली, खनन माफिया के प्रतिनिधि जुटाये हुये थे, जातियों और धर्मस्थलों के समीकरण साधे हुए थे। काँग्रेस से दलबदल कर चुके पूर्व मुख्यमंत्री तक भाजपा में सम्मलित किये जा चुके थे, प्रधानमंत्री के पढाव के साथ साथ केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के 40 सदस्य और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री प्रचार में झौंक दिये गये थे, हर विधानसभा क्षेत्र को एक भाजपा सांसद देख रहा था, अर्थात लोकतंत्रिक व्यवस्था की भावना को विकृत कर चुनावी जीत साधने के समस्त उपकरण उनके पास थे। प्रायोजित भविष्य वाणिया करने वाला मीडिया तो पहले से ही सधा हुआ था। किंतु इस सब के सहारे भी उन्होंने सीटों की संख्या तो बढा ली पर मतों की संख्या फिर भी घट गयी। इसके विपरीत उनके प्रमुख विरोधी की सीटें कम होने के बाद भी वोट बढ गये अर्थात जनता का अधिक समर्थन उनके साथ रहा। यह एक संकेत था जिसने कर्नाटक चुनावों के एक महीने बाद ही होने वाले विभिन्न उपचुनावों में प्रदर्शन को दुहराया।

ये परिणाम विभिन्न सदनों के सदस्यों की कुछ सीटें घटने बढने तक ही सीमित नहीं है अपितु मोदी सरकार की छवि को दर्पण भी दिखाने वाले हैं। सरकारी विज्ञापनों की दम पर चापलूसों, जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है, और सही कहा जाता है, से गुणगान कराते रहने से धोखा हो जाता है। मुझे सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट श्री आर के लक्षमण का एक कार्टून याद आ रहा है जिसमें एक गाँव में कुछ फटेहाल लोगों की भीड़ के बीच कोई नेता जी भाषण दे रहे हैं और वे फटेहाल लोग आपस में कह रहे हैं कि हमारे लिए इतना कुछ हो गया और हमें पता ही नहीं चला। स्पष्ट है कि नेताजी अपनी सरकार द्वारा उनके लिए किये गये कामों की विज्ञापनी सूची बता रहे होंगे जो काम जमीन तक नहीं पहुँचे। मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर विभिन्न मीडिया चैनलों को विज्ञापन और साक्षात्कार साथ साथ दिये गये थे व उत्तर प्रदेश, मेघालय, बंगाल, केरल, बिहार, झारखण्ड, महाराष्ट्र, आदि में होने वाले लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों के लिए भाजपा के अध्यक्ष सह चुनाव प्रबन्धक अमित शाह ने जीत की वैसी ही शेखियां बघारी थीं जैसी कि कभी दिल्ली, बिहार, पंजाब, कर्नाटक आदि के विधानसभा चुनावों के लिए बघारी थीं। जिस तरह चौराहे पर मजमा दिखाने वाले थोड़ी सी जुमले बाजी से अपना माल बेच कर रफू चक्कर हो जाता है, उसी तरह ये भी दुबारा उसी तरह नहीं आते जैसे चुनावों के समय प्रकट होते हैं।

बुन्देली में एक विशेषण का प्रयोग होता है ‘ मुँह का जबर’ अर्थात वह व्यक्ति जो गलत बात को भी ठेलते रहने में कुशल होते हैं। भाजपा ने ऐसे अनेक ‘सम्बित पात्रा’ प्रशिक्षित कर रखे हैं जो सदैव ही चुनाव प्रचार की स्थिति में बने रहते हैं व बहसों के दौरान सच को न तो सामने आने देते हैं, न ही दूसरे को बोलने देते हैं। प्रायोजित मीडिया में एंकर भी उनका पक्ष प्रस्तुत करने में मददगार होता है व एक व्यक्ति आर एस एस विचारक के नाम पर, एक भाजपा प्रवक्ता के नाम पर और एक वरिष्ठ पत्रकार के नाम पर जुट जाते हैं व सामने वाले को बोलने नहीं देते, या उलझा देते हैं। अध्ययन और चिंतन के लिए मशहूर तार्किक वामपंथियों को ये बुलाते ही नहीं हैं जो बहस को एक प्रायोजित शो बनने का विरोध करते हैं। धन आधारित चुनाव प्रणाली की विकृतियों के कारण जो बुद्धिजीवी संसद में नहीं पहुँच पाते उनक सर्वोत्तम उपयोग टीवी बहसों में सम्भव है किंतु इन बहसों को हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण को प्रोत्साहित करने का मंच बना दिया गया है।

चारों दिशाओं में भाजपा की पराजय के लिए विभिन्न विरोधी दलों का एक मंच पर आ जाना और यह तय कर लेना कि इस समय उनके अपने लक्ष्य से भी अधिक महत्वपूर्ण देश को भाजपा की विभाजनकारी विचारधारा से बचाना है, भाजपा के लिए एक साफ संकेत है। वैसे भी 2014 के आम चुनाव में भाजपा को जो कुल 31% वोट मिले थे वे फिल्म व टीवी कलाकारों, खिलाड़ियों, अवसरवादी दलबदलुओं, भगवाभेषधारियों, पूर्व राजपरिवारियों, पूंजीपतियों, कार्पोरेट घरानों, जातिवादी घटकों, आदि के सहारे ऐसे वादों के लिए मिला था जिन्हें बाद में खुद ही चुनावी जुमला स्वीकारा गया। जनता ने किसी भ्रष्टाचारी को दण्ड मिलते नहीं देखा, रोजगार की दशा में सुधार नहीं हुआ, कार्यालयों के भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं दिखी, पैट्रोल डीजल जैसी जरूरत की वस्तुओं में कम हो सकने वाले रेट भी कम नहीं किये गये। साम्प्रदायिक विभाजन करने वाले संगठनों, और व्यक्तियों को सरकारी संरक्षण मिलता दिखा, बैंकों का एनपीए बढता गया, प्रधानमंत्री को जानने वाले व्यापारी बैंकों से बड़े बड़े फ्राड करके विदेश भाग गये, हथियारों के सन्दिग्ध सौदे हुये, समझ में न आने वाली विदेश यात्राएं हुयीं, बिना विचारे नोटबन्दी की गयी जिससे देश को नुकसान हुआ, बेहूदी और अवैज्ञानिक बयानबाजी होती रही जिस पर कोई रोक नहीं लगायी गयी।

जनता के उक्त अनुभवों को सरकारी विज्ञापनों, और मीडिया के प्रायोजित साक्षात्कारों से ढका नहीं जा सकता। इस चौतरफा पराजय के ये संकेत हैं जो 2019 के आम चुनावों को सीधे प्रभावित करने जा रहे हैं जो किसी को जिताने के लिए नहीं अपितु भाजपा को हराने के लिए होने जा रहे हैं।

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