क्या डाली जा सकती है साझे इतिहास पर साझी नज़र ? – सुभाष गाताडे

2:54 pm or June 4, 2018
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क्या डाली जा सकती है साझे इतिहास पर साझी नज़र ?

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में पाठयपुस्तकों से पसरती असहिष्णुता की बातों के बीच एक काबिलेगौर पहल

  • सुभाष गाताडे

पाकिस्तान के जानेमाने भौतिकीविद, मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अग्रणी बुद्धिजीवी प्रोफेसर परवेज हुदभॉय, उन गिनेचुने लोगों में से हैं जो अपने राज्य, समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करने में संकोच नहीं करते हैं। और इसके लिए वह इस बात से भी डरते नहीं हैं कि मुल्क के समाज एवं सियासत पर हावी मुल्लाशाही या सेना को उनकी बातें किस कदर नागवार गुजर रही हैं।

कुछ साल पहले लन्दन के किंग्ज कालेज में डेमोक्रेसी फोरम द्वारा ‘आतंकवाद से लड़ने में शिक्षा की भूमिका’ विषय पर आयोजित सेमिनार में उन्होंने पाकिस्तान के स्कूली पाठयक्रमों के उदाहरण पेश करते हुए बताया था कि किस तरह अतिधार्मिक एवं भारतविरोधी बातें स्कूली किताबों में भरी हुई हैं, जिसके चलते अतिवाद के कुचक्र से पाकिस्तान को मुक्ति नहीं मिल पा रही है। उन्होंने प्रारम्भिक कक्षाओं में इस्तेमाल होनेवाले प्रायमर को प्रदर्शित करते हुए कहा कि किस तरह अ से अल्लाह, ब से बन्दूक, ज से जिहाद, ख से खंजर जैसी बातें बालमन पर अंकित की जा रही हैं। उन्होंने एक पाठयपुस्तक में आग के हवाले किए गए एक कालेज की तस्वीर भी दिखायी जिसमें वैसी चीजें भरी थीं जिन्हें ‘पापमूलक’ कहा जाता है: जैसे पतंग, गिटार, सैटेलाइट टीवी, कैरम बोर्ड, शतरंज, हार्मोनियम और शराब की बोतलें आदि।

उनका कहना था कि विगत छह दशकों में पाकिस्तान में आमूल बदलाव हुआ है, जो जहर जनरल जिया उल हक ने शिक्षा में बोया था, उस पर बाद की हुकूमतों ने भी कोई छेड़छाड़ नहीं की है। पांचवी कक्षा के एक अन्य पाठयक्रम की चर्चा करते हुए उन्होंने जोड़ा कि उसमें बच्चों को ‘हिन्दु एवं मुसलमानों के बीच के फरक को समझो और पाकिस्तान की जरूरत को जानो’, ‘पाकिस्तान के खिलाफ भारत के शैतानी इरादे’ जैसे मसलों पर चर्चा या ‘शहादत एवं जिहाद’ पर बात रखने के लिए कहा जाता है।

गौरतलब है कि यह किताबें महज मदरसों तक सीमित नहीं हैं, जहां पाकिस्तान के लगभग 1 फीसदी बच्चे पढ़ते हैं, यह आम स्कूलों का ही नज़ारा है। सुश्री कामिला शम्सी, मशहूर पाकिस्तानी उपन्यासकार, ने उन्हीं दिनों ‘‘गुएर्निका’’ नामक पत्रिका में लिखे अपने आलेख ‘द बैटल ओवर पाकिस्तान्स स्कूल्स’ में ठीक ही लिखा था कि पाकिस्तान का भविष्य राज्य की उस क्षमता पर निर्भर करता है जहां वह ऐसी शिक्षा प्रदान करे जो छात्रों का प्रबोधन करे न कि उन्हें रूढिवाद के अंधेरे में ढकेल दे।’

लेकिन बच्चों के मन में संकीर्णता एवं असहिष्णुता के बीज डालने में पाकिस्तान क्या अपवाद कहा जा सकता है ? यह कहना जल्दबाजी होगी।

मालूम हो कि प्रोफेसर हुदभॉय का यह अध्ययन हमें बरबस प्रोफेसर कृष्णकुमार के रिसर्च की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने इन दोनों मुल्कों के इतिहास की किताबों पर निगाह डाली थी और यह समझने की कोशिश की थी कि बंटवारे के विमर्श को दोनों मुल्कों ने कैसे गढ़ा है। उनके रिसर्च के निष्कर्ष ‘प्रेजुडिस एण्ड प्राइड’ (विकिंग, 2001) और बैटल फार पीस (पेंग्विन, 2007) में प्रकाशित हुए हैं, जिसमें वह उजागर करते हैं कि शिक्षा के जरिए किस तरह दोनों देशों के बच्चे ‘पड़ोसी मुल्क के प्रति घृणा का आत्मसातीकरण’ करते हैं। मालूम हो कि दोनो देशों की पाठयपुस्तकों के अध्ययन का उनका फोकस आजादी के आन्दोलन के चित्राण पर था। ध्यान रहे कि इसमें सभी किस्म की किताबें शामिल थीं – अंग्रेजी माध्यमवाले प्राइवेट स्कूलों से लेकर अलग अलग राज्यों के सरकारी स्कूलों में इस्तेमाल की जानेवाली किताबों को इसमंे शामिल किया गया था। मकसद था कि यह जाना जाए कि किस तरह की धारणाओं को स्कूल सुचिन्तित तरीके से बढ़ावा देते हैं।

उनके मुताबिक ‘‘आधिकारिक तौर पर स्वीकृत इतिहास की किताबें अतीत के सामूहिक कल्पनाजगत को बुनती हैं। वह एक साझा अतीत होता है मगर दोनों देशों में वह जिस तरह सामने आता है वह बेहद भिन्न किस्म का होता है। इस बात से हमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों राष्ट्र-राज्य बिल्कुल विपरीत भविष्यदृष्टि पर खड़े हैं।’’ उनके मुताबिक किताबों में घटनाओं एवं नायकों का चयन उस सामूहिक मस्तिष्क के निर्माण की झलक देता है जो दोनों देश बनाना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान की किताबें भारत छोड़ो आन्दोलन का जिक्र नहीं करतीं, पाकिस्तानी पाठयपुस्तकों में गांधी का चित्राण एवं भारतीय पाठयपुस्तकों में इकबाल का चित्राण दोनों समस्यापूर्ण दिखता हैै। अतीत के सबसे विपरीत अर्थापन का सबसे महत्वपूर्ण मुकाम दोनों मुल्कों का बंटवारा है। ध्यान देनेयोग्य है कि जहां बंटवारे को भारतीय पाठयपुस्तकों में त्रासदी बताया गया था वहीं पाकिस्तानी पाठयपुस्तकों में उसे राष्ट्र के ‘जन्मदिन’ के तौर पर सेलिब्रेट किया गया था। दोनों में कहीं भी इस बात की जड़ में जाने की कोशिश नहीं देखी गयी कि आखिर विभाजन कैसे हुआ ?

दोनों पड़ोसी मुल्कों की शिक्षाओं में – जो बमुश्किल सत्तर साल पहले एक बड़े मुल्क का हिस्सा थे – इस अंतर को देखकर काफी निराशा हो सकती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दक्षिण एशिया एक ऐसा उदाहरण है जहां हम इतिहास के विकृतिकरण के जरिए छिन्नभिन्न छवियों को ही गले लगाते है। इस मामले में चार पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान, बिहार, बांगलादेश एवं भारत को देखा जा सकता है। सिंधु घाटी की सभ्यता -जिसकी हिन्दू विरासत का दावा किया जाता है – पाकिस्तान मंे नहीं पढ़ायी जाती, बांगलादेश में यह कोशिश दबी जुबान से चलती है, श्रीलंका में जहां सिंहल एवं तमिलभाषी छात्रों को इतिहास की एक तरह से परस्परविरोधी समझदारी बतायी जाती है।

इस प्रष्ठभूमि में लाहौर युनिवर्सिटी आफ मेनेजमेण्ट स्टडीज और ओपी जिन्दल लॉ स्कूल में अध्यापनरत दो प्रोफसरों की अगुआई में संचालित एक प्रयोग  पिछले दिनों सूर्खियां बना। संक्षेप में कहें तो इस प्रयोग में साझे इतिहास पर साझी नज़र डाली गयी थी। प्रयोग की तारीफ इसलिए भी हो रही है कि यह दो पड़ोसी मुल्क – जो विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक कारणों से अलग अलग अस्तित्व की – अपनी यात्रा में काफी दूरी तय किए हैं , वहां के छात्रों ने अपने अतीत के साझा अस्तित्व को मिल कर देखने की कोशिश की और अपनी सांस्क्रतिक समानताओं और रूचियों की पड़ताल की और अपनी भिन्नताओं पर भी वस्तुनिष्ठ तरीके से गौर करने की कोशिश की।

इसके तहत बीस छात्रा एक साझे पाठयक्रम का हिस्सा बने, जिसे अंजाम देने में दोनों शिक्षा संस्थानों में अध्यापनरत दो अध्यापकों की केन्द्रीय भूमिका रही, जिन्हें पश्चिम के विश्वविद्यालयों में साथ अध्ययन का अवसर मिला था। फिलवक्त़ भले ही इस कोर्स में छात्रों के एक छोटे समूह की हिस्सेदारी रही हो, मगर इस अभिनव प्रयोग की चर्चा करते हुए एक लेख में ठीक ही गया है कि इसने एक तरह से साबित किया कि ‘‘वास्तविक सरहदें हमें भले ही विचारधारात्मक और भौतिक तौर पर अलग अलग बांटे रखें, और सख्त लगनेवाले पाठयक्रम भले ही पढ़नेवालों को एक खास किस्म के गुस्से की दिशा की ओर बढ़ाते हों, मगर सरहदहीन दायरे में एक आभासी कक्षा में प्रवेश करके’ सरहदहीन इतिहास की चर्चा अवश्य की जा सकती है।’

* (https://thewire.in/history/reimagining-indo-pak-history-in-a-borderless-place)

अगर हम इस नायाब प्रयोग की ओर लौटें तो मालूम चलता है कि आपसी सम्वाद की जमीन बनाने के लिए यह किया गया कि ‘‘ऐसे अहम घटनाक्रमों की चर्चा की जाए जिसके प्रति दोनों मुल्कों में रूचि हो मगर उन्हें दोनों तरफ अलग ढंग से समझा जाता हो ’’ मसलन, ऐसे हिन्दू समाजसुधारक जो उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन में सक्रिय थे उन्हें पाकिस्तानी पाठयपुस्तकों में कैसे देखा जाता है ? या क्या भारतीय छात्रा पहचानते हैं कि हमारी पाठयपुस्तकें हमें राष्टीय अभिमान का ऐसा संस्करण पढ़ाती हैं जो हिन्दू विचारधारा में संलिप्त हो’’।

हर शुक्रवार को दोनों विश्वविद्यालयों के छात्रा – जो भले ही एक दूसरे से सैकड़ों मील दूर बैठे थें – स्काईप पर मिलते थे और मिल कर चर्चा करते थे और साझा प्रोजेक्टस पर काम करते थे। इस पाठयक्रम को लेकर लाहौर यूनिवर्सिटी आफ मैनेजमेण्ट स्टडीज के छात्रा दुआ रहमान की टिप्पणी थी कि इस पूरे पाठयक्रम से हमने यही समझा कि ‘‘हम उसी कहानी का हिस्सा है, जिसे हमें अलग अलग ढंग से बताया गया है।’

* (https://thewire.in/history/reimagining-indo-pak-history-in-a-borderless-place)

एक ऐसी सच्चाई जिसे दोनों मुल्कों की अवाम को समझाना फिलवक्त़ कितना मुश्किल जान पड़ता है।

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