आखिर किसान क्यों परेशान हैं? – योगेन्द्र सिंह परिहार

2:56 pm or June 12, 2018
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आखिर किसान क्यों परेशान हैं?

  • योगेन्द्र सिंह परिहार

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती मेरे देश की धरती। इन शब्दों का मतलब तो यही हुआ कि धरती पर उगने वाला अनाज हीरे-मोती से कम नही। लेकिन धरती से सोना उगाने वाले काश्तकार इतने परेशान क्यूं हैं? क्या ये अनाज किसान के खलिहान से निकलने के बाद सोना होता है, आखिर किसान इन हीरे-मोती की चमक से महरूम क्यूं है? ये ऐसे ज्वलंत सवाल हैं जो सिर्फ किसान के नही बल्कि हर किसी के जहन में आते हैं। तो फिर किसानों की समस्या का हल क्या है।

बहुत दिनों से मेरे मन मे सवाल उठ रहे हैं और वो भी राजनीति से परे कि आखिर कौन सी ऐसी परिस्थिति बन रही है जब किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहा है। बहुत बारीकी से अध्ययन किया जाए तो ये देखने मे आता है कि किसान जब सबसे पहले खेत तैयार करता है तो पहले तो हल से खेत जोत लेता था फिर साधन संपन्न हुआ तो ट्रैक्टर से खेत जोतता है और उसके पास ट्रैक्टर नही है तो किराए से लाकर खेत जुतवाता है यानि समस्याएं जुताई से शुरू हो जाती हैं। किसान की समस्या का पहला और सीधा सीधा मतलब है उधारी। खेत जुतवाने से उधारी शुरू होती है, फिर खाद-बीज भी उधार में लाना पड़ता है फिर बोवनी के लिए ट्रैक्टर चलाना मतलब या तो डीज़ल उधार पर लेना या ट्रैक्टर किराए से लेना। फिर उधार में दवाई लाकर छिड़काव करना, पानी चलाना और दिन रात भगवान से मिन्नत करना कि पैदावार अच्छी हो जाए। फसल जब पक के तैयार हो जाती है तो उसे कटवाने के लिए मज़दूर नही मिलते फिर मजबूरी में हार्वेस्टर किराए से लेना पड़ता है जो सामान्यतः उधार में नही मिलता, हार्वेस्टर का किराया नगद ही देना पड़ता है।

समस्याएं तो अब शुरू होती हैं जब अनाज को तुलवाने के लिए मंडी या सोसायटी ले जाया जाता है फिर शुरू होता है किसान के धैर्य का परीक्षण, वो रोज़ कहता है भगवान आज अनाज तुल गया तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा। 10-15 दिन में किसान का नम्बर लग जाने के बाद एक पर्ची मिल जाती है और कहा जाता है पैसा आपके खाते में पहुंच जाएगा अब जाओ यहां से।

थका हारा किसान घर पहुंचता है तो पत्नि उससे पूछती है पैसे कब मिलेंगे, और वो असहाय और निरीह प्राणी झल्ला कर जवाब देता है मिल जाएंगे न! पत्नि कहती है कि बेटी की शादी करना है, बच्चों की पढ़ाई की फीस के लिए जो उधारी ली थी वो भी चुकानी है। गुस्से से चिल्लाता हुआ किसान कहता है हां मालूम है, मुझे भी तो ट्रैक्टर की किश्त चुकानी है, खाद-बीज की उधारी चुकानी है और जो तुम्हारे साहबजादे ने गाड़ी खरीद ली थी उसकी भी तो किश्त चुकानी है, कहां से लाऊं, क्या करूं?

किसान रोज बैंक जाता है पासबुक में एंट्री करवाता है इस आस में कि शायद आज खाते में पैसे आ गए होंगे, लेकिन पैसे नही आते हैं। साहूकार घर के चक्कर काटने लगते हैं, बैंक के वसूली एजेंट रोज घर आने लगते हैं। रोज रोज की समस्याओं को जो सह जाते हैं वे जी जाते हैं और जो सह नही पाते वे फांसी के फंदे को गले लगा लेते हैं।

मैं अभी तक बात कर रहा था छोटे और मध्यमवर्गीय किसानों की, बड़े किसानों को कभी कोई असर नही पड़ता है बल्कि बड़े किसान हर मामले में फायदे में रहते हैं उन्हें मुआवजा भी तगड़ा मिलता है और अनाज भी इन्ही के पहले तुलते हैं क्योंकि स्थानीय नेता और सरकारी तंत्र इन्ही के हिसाब से चलते हैं। बड़े किसान तो छोटे किसानों को अपने साधन किराए में देकर भी मुनाफा कमा लेते हैं। वैसे जिनके पास ज़मीनें ज्यादा हैं उन्हें किसान न कहकर मालगुजार या ज़मींदार कहना ही ठीक है।

लेकिन प्रश्न वही है ऐसे बड़े किसान कितने प्रतिशत हैं। एक गांव में एक या दो बड़े मालगुजार रहते हैं बाकि मंझले और छोटे किसान। मुसीबत के पहाड़ छोटे किसानों पर ही टूटते हैं जो कभी सब्जियां उगाता हैं तो उसे बेचते वक़्त लागत मूल्य भी नसीब नही होता। सरकार की योजनाएं छोटे किसान तक पहुंच ही नही पाती।

बिचौलिये, दलालों और भ्रष्ठ अधिकारियों की संगठित लूट से किसान का जीना दूभर हो जाता है। किसान का समय बैंकों, मंडियों के चक्कर काटने में ही निकल जाता है। हम जिसे अन्नदाता कहते हैं वो हमारा पेट भरने के लिए दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है। रोज जीने मरने की कशमकश में दिन काटता है, रात बेचैनी में गुजार देता है। अधमरा होकर भी हमें अनाज उपलब्ध कराता है और जब असहाय हो जाता है तो मर जाता है।

कभी कभी लगता है कि विकास और भौतिकतावाद की अंधी दौड़ में किसानों का जीवन नष्ट होता चला गया। जब 2 जोड़ी बैल होते थे तो किसान खुशहाल रहता था, फसलों का दाम कम मिलता था  तब भी वो खुश रहता था। गांव, गांव जैसे लगते थे, बैलगाड़ियों की सवारी शान की सवारी होती थी। थोड़े में ज्यादा का अहसास होता था, परिवार परिवार जैसा लगता था। अब समय बदल गया है, बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ले ली हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियां फैशन की तरह हो गई हैं। बैंकों के लुभाभने ऑफर में फंसकर हर बात के लिए लोन ले लिया जाता है। किसान की कमाई उतनी ही है खर्चा चार गुना हो गया है। समय के साथ परिवर्तन बहुत ज़रूरी है लेकिन ये उतना ही होना चाहिए जितना सहन किया जा सके।

सरकारें योजनाएं बनाती हैं नागरिकों के बेहतरी के लिए, लेकिन ये योजनाएं ज़मीन तक पहुंचती हैं कि नही ये कौन मॉनिटर करता है? कोई भी नही। इस भ्रष्ठ तंत्र में इस बात की मॉनिटरिंग होती है कि कमीशन कैसे और किस तरह मिलेगा। प्राकृतिक आपदाओं को ही देख लीजिए, इनसे उत्पन्न संकट से उबरने के लिए सरकार जो मुआवजा राशि देती है उससे सीधे तौर पर बहुत बड़े किसानों और भ्रष्ठ अधिकारियों के जेब भरते हैं, जिन किसानों को वास्तविक रूप से नुकसान होता है उन्हें कुछ नही मिलता है यदि कुछ मिलता है तो गंदी गंदी गालियां अधिकारियों से, साहूकारों से और ज़मींदारों से।

किसानों और गरीबों की किस्मत में दुख तब तक है जब तक वो पढ़ लिख नही जाता, पढ़ेगा लिखेगा तो उसे पता रहेगा कि उसे किसे वोट करने से फायदा होगा। अच्छी और सच्ची सरकार बनेगी तब ही किसानों को बल्कि हर वर्गों को फायदा होगा। किसान की किस्मत जितनी भगवान के हाथ मे है उतनी खुद के हाथ मे हैं। पुरानी कहावत है कि ” बाढ़े पूत पिता के धर्मा और खेती उपजे अपने कर्मा।

 

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