डे-ज़ीरो की आहट सुनिये, सरकार – शब्बीर कादरी

5:03 pm or June 23, 2018
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डे-ज़ीरो की आहट सुनिये, सरकार

  • शब्बीर कादरी

क्या हमारे देश की जीडीपी पर पानी फेरा जा सकता है, जी हां, यदि हम इसी तरह प्रभावशाली जल-प्रबंधन को नजरअंदाज कर धड़ल्ले से पानी के कुप्रबंधन पर उदासीन हो राजनीति के खेल में मस्त रहे तो नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार केवल वर्ष 2030 तक ही हम उस आंकड़े से अवश्य ही निराश होंगे जो तबकी सरकार द्वारा जीडीपी के रूप में हमारे समक्ष रखे जाऐंगे, हमारे नीतिकार मानते हैं कि वे 6 प्रतिशत से भी कम होंगे जो हमारी विकास या़त्रा की पोल खोलने के लिए काफी होंगे। जल उपलब्धता के हमारे वर्तमान आंकड़े अभी ही बेहद निराशाजनक और डरावने हैं। डे-जीरो का प्रारंभ भले ही अभी दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन से प्रारंभ हुआ हो उसकी आहट हमारे शहरों तक भी आ पहुंची है। केपटाउन में इसी अप्रैल में वह भयावह जल स्थिति पैदा हुई जिसमे वहां के निवासियों को दो बाल्टी अर्थात 50 लीटर पानी दिया गया, बड़ी आबादी पलायन को मजबूर हुई बाकी बची जिन्दगियां किसी तरह जीवन-यापन को मजबूर हैं। डे-जीरो की संभावना विश्व के वैसे तो अनेक देशों के ऊपर मंडरा रही है पर अभी 200 देश पानी की इस भयावह स्थिति के लिए चिंहित किए गए हैं। जिसमें हमारा सिलीकाॅन शहर बैंगलुरू भी शामिल है। याद रहे डे-जीरो वह स्थिति है जिसमें नगर के सभी नलों से पानी की बूंद भी नहीं टपक पाती, आप उस डारवनी स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें आप बार-बार बर्तन लिए हुए नल के पास आशा भरी दृष्टि से सिर्फ उसे देख ही सकते हैं कुछ प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि आपूर्ति के लिए जल ही नहीं होता।

पानी के अनुपलब्धता के ऐसे ही त्रासद समाचारों के बीच देश के सैकड़ों वर्षों से पर्यटन तथा धार्मिक महत्व के हिमाचल प्रांत के ख्यात नगर शिमला का नाम भी सुर्खियों में है यह कितना दुखद है कि पूरी तरह पर्वतीय धरोहर से संपन्न और विभिन्न जलधाराओं से धनीं इस प्रांत के अधिसंख्य जिलों में इन दिनों जल को लेकर त्राहिमाम हैं। जल की स्थिति पर हमारे नीति-निर्माता सब समझ रहे हैं देख रहे हैं उन्हें मालूम है पानी के चलते ही गन्ने की पैदावार में महाराष्ट्र राज्य में 30 प्रतिशत की कमी आंकी गई है, ओडिशा में चावल की खेती में इसी कारण 15 प्रतिशत की गिरावट आई है, आंध्रप्रदेश में भी इन्ही वजहों से किसानों की आय पर असर पड़ा है, उन्हें मालूम है कि वर्ष 2000 से 2017 के बीच देश के प्रत्येक जिले में बाढ़ या बाढ़ के हालात 11 बार बने जबकि 8 राज्यों को सूखा घोषित किया गया जिसमें वर्ष 2017 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, केरल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश शामिल है आशंका व्यक्त की जा रही है वर्ष 2018 में भी देश के 15 राज्यों में सूखे के हालात बन सकते है जबकि विद्यमान थर्मल संयंत्रों में से 40 प्रतिशत पानी कमी वाले क्षेत्रों में ही स्थापित हैं। जल के बढ़ते उपयोग के आंकड़ों को समझने के लिए दृष्टिपात करना उचित होगा कि वर्ष 2016 में देशभर में 2.1 अरब क्यूबिक मीटर साफ पानी का उपयोग किया गया जबकि वर्ष 2011 में यह आंकड़ा 1.5 अरब क्यूबिक मीटर ही था। इस प्रकार आने वाले पांच साल में ऐसे आंकड़ों में उछाल को समझा जा सकता है। हाल ही में नीति आयोग की रिपोर्ट जल की स्थिति के भयावह आंकड़ों से रूबरू कराती है, यह कि देश में प्रतिवर्ष दो लाख लोग पानी न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं, देश के 21 बड़े शहरों में भूजल स्तर 2020 तक अत्यंत गहरे स्तर तक पहंुचेगा, आयोग यह भी बताता है कि वर्ष 2030 तक ही पीने के पानी की मांग उपलब्ध पानी से अधिक हो जाएगी। दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद समेंत अनेक शहरों में जल की कमी के चलते 10 करोड़ लोगों का जीवनयापन कठिनाई से परिपूर्ण होगा।

हमारे यहां वर्षभर में लगभग 4000 बिलियन मीटर बारिश होती है जिसमें 1869 बिलियन मीटर पानी ही एकत्र हो पाता है कुछ बिलियन मीटर पानी समुद्र में बह जाता है तो कुछ अन्य कारणों से बर्बाद हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह से जनसंख्या बढ़ रही है और जल का दोहन हो रहा है उससे देश में वर्ष 2050 तक पानी का खर्च औसतन 1168 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच जाएगा .जबकि भंडारण क्षमता 1122 बिलियन क्यूबिक मीटर ही हेै..सरकार द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार प्रति व्यक्ति कम से कम 500 क्यूबिक मीटर पानी प्रति व्यक्ति सालाना उपलब्ध होना चाहिये, वर्ष 2050 तक हमारे देश की आबादी लगभग एक अरब चालीस करोड़ हो जाएगी, जिसके लिए तीन करोड़ 20 लाख टन खाद्यान्न की जरूरत होगी। आर्थिक समीक्षकों का मत है कि आने वाले वर्षों में विश्व की सभी गतिविधियांे का 60 प्रतिशत बायोटेक्नोलाॅजी पर निर्भर रहेगा और इसका संचालन भी इसी क्ष्ेात्र से होगा, ऐसे में पानी की पर्याप्त उपलब्धता सवालों के घेरे में है। मंहगा बीज और खाद डालकर भी औसतरूप से हमारा किसान अधिक उत्पादन या उचित समर्थन मूल्य नहीं मिल पाने के कारण ही कृषि ऋण चुकाने में असमर्थ है और आत्महत्या का सहारा ले रहा है। कल्पना कीजिए भविष्य के उस दौर की जहां हमारे आलीशान घर में पग-पग पर आधुनिकता का रंग तो भरा होगा पर पानी नहीं होगा। प्रख्यात पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने कई दशक पूर्व वर्षा जल को सहेज कर इस संपदा में आत्मनिर्भर बनाने की बात तो बताई ही उसे प्रायोगिकरूप से चरितार्थ करके दिखाया भी। उनका अनुसरण कर मरूस्थल भी हरितक्रांति से चहक उठे, किसानों के चेहरे कृषि आत्मनिर्भता से दमक उठे और संपन्ना चहुंओर चहचहा उठी। उनके इस अभियान को आज भी क्रांतिकारी अभियान का रूप देकर तेजी से खोती जा रही हमारी जल संपदा को पुनस्र्थापित किया जा सकता है। पर जब हमारे युवाओं की सोच वर्तमान राजनीति के इशारे पर जनूनी तौर बंधक बनाई जाकर सोशल मीडिया के पास गिरवी रख दी गई हो और कार्यपालिका राजनेताओं के इशारे पर ता-थैया में मस्त हो तब पानी जैसी व्यर्थ वस्तु की चिंता क्यों की जाए। समय बहुत कम है फिर भी हम सभी को इस अमूल्य धरोहर को सहेजने की दिशा में अभी से जुटना होगा अन्यथा कल तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी। आईए अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए बिना राजनीति के अभी से इस मिशन में जुट जाऐं।

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