नोट बंदी – कालेधन को सफेद करने का यह राजनैतिक खेल था! – अब्दुल रशीद

2:59 pm or June 28, 2018
500-crore-transferred-into-amit-shah-s-co-operative-bank-charu_730x419

नोट बंदी – कालेधन को सफेद करने का यह राजनैतिक खेल था!

  • अब्दुल रशीद 

मुंबई के आरटीआई कार्यकर्त्ता मनोरंजन एस.रॉय द्वरा आर टी आई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार 8 नवंबर 2016को नोटबंदी लागू होने से लेकर 14 नवंबर2016 तक अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक में 745.9 करोड़ और राजकोट के ज़िला सहकारिता बैंक में 693 करोड़ जमा हुए। यह ख़बर 22जून 2018 को समाचार एजेंसी आईएएनएस ने प्रकाशित किया था।

साधारण सी यह ख़बर चर्चा में इसलिए आया क्योंकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक लिमिटेड (एडीसीबी) के निदेशक हैं।

यह बेहद अजीब बात है की कई समाचार पोर्टलों ने पहले तो इस ख़बर को प्रकाशित किया फिर बिना कोई कारण बताए पोर्टल से हटा दिया।क्या इसतरह से खबरों को गायब करने वाले मिडिया संस्थान अपने को निष्पक्ष और विश्वसनीय होने का दावा करने का हक़ भी रखते हैं?

इस आरटीआई खुलासे पर औपचारिक बयान जारी करते हुए नाबार्ड एक सरकारी संस्था जो सहकारी बैंकों की निगरानी करती है, ने नोटबंदी के दौरान अहमदाबाद बैंक की प्रतिबंधित नोटों को बदलने की प्रक्रियाओं को सही ठहराया।

8 नवंबर 2016 की रात को सभी 500 रुपये और 1,000 रूपए के नोटों को वापस लेने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। नोटबंदी का उद्देश्य बताया गया की इससे देश के अंदर छुपे कालेधन का पता चलेगा लेकिन 99 प्रतिशत पुराने नोट वापस बैंक में जमा हो गया.कालेधन का तो पता नहीं लगा लेकिन राजनैतिक नौटंकी जमकर हुआ।

नोटबंदी के घोषणा के बाद पूरे देश में पुराने नोट बदलने के लिए हलचल सा मच गया था,और लोगों को पुराने नोट को नए नोटों से बदलने के लिए, बैंकों की लंबी लाइनों में घंटों खड़े रहकर संघर्ष करना पड़ा।

जहां आम जनता और बैंक कर्मचारी नोट बदलने के काम से परेशान दिखे वहीँ एक छोटे सहकारी बैंक में 745.9 करोड़ की बड़ी राशि का जमा होना क्या संदिग्ध नहीं लगता? वो भी महज़ पांच दिन में।

नाबार्ड ने अपने औपचारिक बयान में बताया की “उसने अहमदाबाद जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक में 100% सत्यापन किया जिससे यह तथ्य सामने आया कि बैंक ने विमुद्रीकृत नोटों को स्वीकार करते समय भारतीय रिज़र्व बैंक के सभी केवाईसी दिशानिर्देशों का अनुपालन किया था। विद्यमान दिशानिर्देशों के अंतर्गत अपेक्षा के अनुरूप नाबार्ड द्वारा किए गए सत्यापन की रिपोर्ट के अनुसार बैंक ने जहां भी अपेक्षित था एफ़आईयू-इंडिया को अपेक्षित नकदी लेनदेन रिपोर्ट (सीटीआर) और एसटीआर भी प्रस्तुत की थी।”

सवाल यह है के,जब एडीसीबी द्वारा  नकदी लेनदेन की रिपोर्ट एफ़आईयू-इंडिया को भेजी थी जिसमें बड़ी जमा राशि को हाईलाईट कर प्रस्तुत किया गया था तो क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी ने पूछताछ किया और क्या कार्यवाही हुई?

नाबार्ड ने कहा है कि, एडीसीबी को कुल 16 लाख जमा खातों में से केवल 1.60 लाख यानी 9.37% ग्राहकों ने ही नोट बदलने/ जमा करने का काम किया. इनमें से भी जिन खातों में नोट जमा किए/ बदले गए उनमें से 98.66% में रु. 2.5 लाख से कम रकम जमा की गई. बैंक के कुल खातों में से 0.09 % खाते ही ऐसे थे जिनमें रु. 2.5 लाख से अधिक रकम जमा की गई।

क्या उन सभी को चिहिन्त कर उनकी जांच की गई,क्या पांच दिनों में सभी 16 लाख खाताधारकों ने अपने पुराने नोट जमा कर दिए? यदि ऐसा नहीं तो किस आधार पर नाबार्ड ने 750 करोड़ रुपए जमा होने के बाद भी जामा राशि को औसत कहा?

जिला सहकारी बैंकों में जमा की घोषणा के 5 दिनों के भीतर प्रतिबंध लगा दिया गया था।जब सभी नियम का पालन हो रहा था,तो प्रतिबंध क्यों लगाया गया? एडीसीबी ने इन पांच दिनों में लगभग 745.9 करोड़ रुपये का कारोबार किया, जो 31 मार्च 2017 को 5050 करोड़ रुपये की कुल जमा राशि का लगभग सातवां हिस्सा है। क्या एडीसीबी के खाताधारक को यह जानकारी पहले से थी के सहकारी बैंक में पुराने नोट का लेनदेन सिर्फ पांच दिनों तक होगा?

सरकार ने अभी हाल ही में नोटबंदी के बाद 20 लाख रुपये से ज्यादा जमा करके चुप्पी साधनेवाले 2 लाख लोगों को नोटिस थमाया है.गड़बड़ी करने वालों पर कार्यवाही करना इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (सीबीडीटी)का इस वर्ष की एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है। इसके अतिरिक्त, सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज देशभर में छापे मार रहा है ताकि नोटबंदी में खेल करने वाले बेफिक्र होकर घूमते नहीं रहें। क्या इन 2 लाख लोगों में एडीसीबी के भी खाताधारक हैं?

कुल मिला कर नाबार्ड के स्पष्टीकरण के बाद आर टी आई से उठे सवाल और उलझ गया ऐसा लगता है। नाबार्ड यदि इस बात का स्पष्टीकरण देती के अमित शाह जो देश के प्रभावशाली व्यक्ति हैं,बतौर निदेशक एडीसीबी को प्रभावित किया था या नहीं?

नोटबंदी करने के जो मकसद सरकार ने गिनाए वो सब जुमला साबित हुआ,न तो कोई काला धन मिला, न नकली नोट मिला,न आतंकवादी गतिविधि कम हुआ और न नक्सलियों की कमर टूटी। कैसलेस की बात भी हवाहवाई ही निकला।

नोटबंदी के दौरान कष्ट भोगी देश की आमजनता अब जानना चाहती है के आखिर नोटबंदी से हासिल हुआ क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कालेधन को सफेद करने का यह राजनैतिक खेल था जिसमें सैंकड़ो गरीब की बलि दे दी गई?

 

Tagged with:     , , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in