कश्मीर समस्या : समाधान क्या है ? – शैलेन्द्र चौहान

3:06 pm or June 28, 2018
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कश्मीर समस्या : समाधान क्या है ?

  • शैलेन्द्र चौहान

गत दिनों “राइज़िंग कश्मीर” के संपादक शुजात बुखारी की हत्या की निंदा सरकार, राजनीतिक दलों, लश्कर-ए-तैयबा और हिज्ब-उल-मुजाहिदीन आदि सभी पक्षों ने की है. सवाल उठता है कि फिर हत्या की किसने है. इसी के साथ अब यह सवाल भी उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले चार सालों में कश्मीर को सामान्य बनाने के लिए किया क्या है. भारतीय जनता पार्टी ने जब जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ हाथ मिलाया, तो यह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के मिल जाने जैसी घटना थी क्योंकि भाजपा संविधान से धारा 370 को निकालकर और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे भारतीय संघ में पूरी तरह से मिलाने की पक्षधर रही है, वहीं महबूबा मुफ्ती का रवैया उग्रवाद के प्रति काफी नरम रहा. सरकार बनने के बाद भाजपा नेताओं ने जम्मू को भावनात्मक रूप से कश्मीर घाटी से अलग करने का हर संभव प्रयास किया और मुफ्ती चुपचाप सब कुछ देखती रहीं. उनकी सरकार के कामकाज और उनकी पूर्ववर्ती उमर अब्दुल्लाह की सरकार के कामकाज में कोई विशेष अंतर नजर नहीं आता और वे भी अकसर किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई देती हैं. आतंकवादी घटनाओं में बढ़ोतरी उनकी सरकार के कामकाज पर एक टिप्पणी भी है. आश्चर्यजनक यह है कि मुफ्ती सरकार और मोदी सरकार दोनों ने ही इस समस्या को कानून-व्यवस्था की समस्या समझ कर सुलझाने की कोशिश की, राजनीतिक समस्या मान कर नहीं. अचानक जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ दिया और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने तुरंत ही इस्तीफा दे दिया. सेना और उग्रवादियों के बढ़ते संघर्ष के बीच हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी ने गठबंधन सरकार से अलग होने का फैसला कर लिया. 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. पार्टी प्रभारी राम माधव ने कहा कि बीजेपी के लिए गठबंधन को जारी रखना मुश्किल हो गया था. उन्होंने कहा, “आतंकवाद और हिंसा की चपेट में आई घाटी में आम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या इसका उदाहरण है.” बीजेपी नेता ने कहा कि पार्टी के सभी मंत्री इस्तीफा देंगे और शांति-व्यवस्था बरकरार रखने के लिए पार्टी चाहती है कि राज्य में राज्यपाल का शासन लागू हो. गठबंधन तोड़ने का फैसला पार्टी के मंत्रियों के साथ एक बैठक के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने लिया और राज्यपाल एनएन वोहरा को इस संबंध में एक पत्र सौंप दिया. दोनों पक्ष खुश थे। स्पष्ट है अगला लोकसभा चुनाव इसी मुद्दे पर लड़कर दोनों अपनी पहचान कायम रख पाएंगे।

आतंकवाद की तीन चारित्रिक विशेषताएं हैं और इनमें से किसी एक पर बहुत अधिक जोर देना और अन्य को नजरअंदाज कर देना घातक सिद्ध होता है. ये विशेषताएं हैं: राजनीतिक चरित्र, नागरिकों पर नाटकीय ढंग से किए जाने वाली हिंसा और अतिशय भय और आतंक के माहौल का सृजन. इसके अलावा आतंकवाद की समाप्ति की राह में एक और बहुत बड़ी बाधा है और वह यह कि उसके साथ बहुत बड़े आर्थिक हित जुड़ जाते हैं. पंद्रह वर्ष पहले प्रकाशित अपनी पुस्तक “मॉडर्न जिहाद” में इतालवी अध्येता लोरेट्टा नेपोलियोनी ने बताया था कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का अर्थतंत्र डेढ़ ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था. अनुमान लगाया जा सकता है कि आज यह संख्या कहां तक पहुंच गई होगी. उनका यह भी कहना था कि विचारधारा को ताक पर रख कर सभी आतंकवादी संगठन एक-दूसरे के साथ आर्थिक स्तर पर सहयोग करते हैं. जम्मू-कश्मीर में दशकों से चल रहे आतंकवाद के इस पक्ष की भी अनदेखी नहीं की जा सकती, खासकर उसे पाकिस्तान की ओर से मिल रहे समर्थन को देखते हुए.  आजादी के बाद से ही कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में एक फांस बना हुआ है. भारत ने कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाया. संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 47 पास किया जिसमें पूरे इलाके में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई. लेकिन प्रस्ताव के मुताबिक पाकिस्तान ने कश्मीर से सैनिक हटाने से इनकार कर दिया. और फिर कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया गया. भारतीय कश्मीर में चुनाव हुए और भारत में विलय का समर्थन किया गया. भारत ने कहा, अब जनमत संग्रह का जरूरत नहीं बची. पर संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तान ने कहा, जनमत संग्रह तो होना चाहिए. जनमत संग्रह समर्थक और भारत में विलय को लटका रहे कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया. जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने भारत में कश्मीर के विलय पर मुहर लगाई. 1987 में जम्मू कश्मीर में विवादित चुनावों के बाद राज्य में आजादी समर्थक अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ. भारत ने पाकिस्तान पर उग्रवाद भड़काने का आरोप लगाया, जिसे पाकिस्तान ने खारिज किया. घाटी में 1990 के दशक में हिंसा जारी रही. लेकिन 1999 आते आते भारत और पाकिस्तान फिर लड़ाई को मोर्चे पर डटे थे. कारगिल की लड़ाई. 2001-2008 के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की कोशिशें पहले संसद पर हमले और और फिर मुबई हमले समेत ऐसी कई हिंसक घटनाओं से नाकाम होती रहीं. 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ गए. लेकिन उसके बाद नई दिल्ली में अलगाववादियों से पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात पर भारत ने बातचीत टाल दी. 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में आजादी के समर्थक फिर सड़कों पर आ गए. पत्थरबाज पुनः सक्रिय हो गए. मिलिटरी ऑपरेशन चलते रहे. सर्जिकल स्ट्राइक को धुंआधार तरीके से प्रचारित किया गया. नोटबंदी के बाद यह दावा कि आतंकवादियों की कमर टूट गई, हवाई साबित हुआ. आतंकवाद कम होने की बजाय बढ़ने लगा. फिर एक बार जोरशोर से दावा किया गया है. अब देखते हैं क्या होता है!

ध्यान देने की बात है कि आतंकवादी अपनी कार्रवाइयों को इस्लाम के नाम पर अंजाम देते हैं लेकिन वे कभी ईद या मुहर्रम का कोई ख्याल नहीं करते. इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि बुखारी की सरे-आम हत्या करने के लिए उन्होंने रमजान के अंतिम दिनों को चुना. उनकी हत्या ने एक बार फिर इस सवाल को पुरजोर ढंग से उठा दिया है: कश्मीर समस्या का हल कैसे हो सकता है?

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