आयुष्मान भारत – आयुष्मान भवः कब होगा – अब्दुल रशीद

3:25 pm or July 5, 2018
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आयुष्मान भारत – आयुष्मान भवः कब होगा

  • अब्दुल रशीद

दुनियां की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ गरीबों को कितना मिल पाता है या नहीं, यह कहना अभी जल्द बाजी होगा,लेकिन पहले के स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ गरीबों तक दाल में छौंक के बराबर तक ही पहुंचा है. हाँ प्राइवेट अस्पताल और बीमा कम्पनियों ने खूब पैसा जरुर बनाया है.

आयुष्मान भारत योजना या मोदीकेयर  राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा की नई योजना है, जिसे 01 अप्रैल,2018 को पूरे भारत मे लागू किया गया था। 2018 के बजट सत्र में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इस योजना की घोषणा की। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लोगों (बीपीएल धारक) को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराना है। इसके अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक परिवार को 5 लाख तक का कैशरहित स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराया जायेगा।

इस योजना में पहले से चली आ रही दो स्वास्थ्य योजनाओं- राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और वरिष्ठ नागरिक स्वास्थ्य बीमा योजना- का आयुष्मान भारत में विलय हो जाएगा। योजना के मुताबिक देश की 40 फीसदी आबादी बीमा लाभ के दायरे में आ जाएगी।

देश के 20 राज्यों ने केंद्रीय योजना को अपने यहां लागू करने की सहमति दे दी है। हालांकि ओडीशा जैसे राज्य ने इस योजना को ये कहते हुए लागू करने से मना कर दिया है कि इससे बेहतर बीमा के साथ वो अपने राज्य में अपनी योजना ला चुका है जिसका नाम है बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना। उसका दावा है कि केंद्र की योजना से राज्य के 61 लाख परिवार ही लाभान्वित हो पाएंगे जबकि उसकी अपनी योजना राज्य के 70 लाख परिवारों को कवर कर रही है। ओडीशा का ये आरोप भी है कि केंद्र की स्वास्थ्य बीमा स्कीम, गरीब और बीमार लोगों को, भले ही लाभार्थियों के रूप में ही सही, बीमा कंपनियों के शोषण का संभावित शिकार बना सकती है। ओडीशा के अलावा दिल्ली, पंजाब और पश्चिम बंगाल ने भी अभी आयुष्मान भारत पर मुहर नहीं लगाई है।

दुनियां की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान का लाभ क्या गरीबों को मिलेगा या कहीं इसका फायदा बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों को तो नहीं होगा?

लाख दावो के बावजूद एक कडवी सच्चाई यह भी है की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबों को वित्तीय संरक्षण देने में सफल नहीं रही। देखा जाए तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नीजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों को ही मिला।

2008 में लागू राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत करीब छह करोड़ परिवारों में से करीब साढ़े तीन करोड़ परिवार ही कवर हो पाए थे. करीब 30 फीसदी क्लेम ही निकल पाए थे।जबकी प्रीमियम राशि के रूप में कम्पनीयों की बेहतर कमाई हो जाती है।

गरीब आदमी निजी अस्पताल जाने से डरता क्यों है? क्योंकि वहां के महंगे इलाजों का खर्च गरीब असपताल को अदा नहीं कर सकता। गरीब को गंभीर और असाध्य रोग हो और इलाज के लिए किसी महंगे या सुविधासंपन्न अस्पताल में जाने के लिए विवश होना पड़े उससे बेहतर है की सरकारी अस्पतालों की दयनीय हालत को सुधारा जाए,लालफीताशाही से मुक्त किया जाए।

दिल्ली के एम्स जैसी चुनिंदा सरकारी संस्थाओं  का नाम उनके गुणवत्ता और बेहतर कार्यप्रणाली के कारण है।

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं को इतना बेहतर और व्यापक बना दिया जाय कि गरीब आदमी सरकारी औषधालयों और केंद्रों में ही अपना इलाज़ कराए। बीमा आधारित स्वास्थ्य सुविधा देना ही है तो इनडोर और आउटडोर दोनों तरह की सुविधा का प्रावधान हो, साथ ही प्रीमियम भरने से गरीब जनता को मुक्त किया जाना चाहिए।

जबतक सरकारी चिकित्सालयों में बेहतर सुविधा का इंतजाम नहीं होता है तब तक आयुष्मान योजना से गरीब जनता को राहत नहीं मिलेगी। यह तभी संभव है,जब योजना में कुछ महत्वपूर्ण और व्यवाहारिक बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाएगा। योजना के अंतर्गत दिए जाने वाले इलाज का पैमाना तय होना चाहिए।गुणवत्ता पर कड़ी नज़र होनी चाहिए। जिन अस्पतालों को योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध किया जाय उन अस्पतालों के गुणवत्ता और दवा वितरण सरकार की निगरानी होना चाहिए। यदि महंगी ब्रांडेड दवाएं और उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा हो तो इस बात पर भी ध्यान देना होगा के कहीं यह सब अनावश्यक तो नहीं है। मरीज को भर्ती करने से इनकार करने वाले अस्पतालों पर सख्त कार्यवाही होना चाहिए। आयुष्मान भारत योजना के तहत मिलने वाली स्वस्थ्य सुविधा सस्ती और व्यवहारिक हो ताकि आम जनता को ईलाज कराने में आसानी हो।

योजनाओं के दायरे में अस्पताल और बीमा कंपनियां हैं,जिन्हें गरीबों के इलाज के लिए अनुबंधित किया गया है। नियमों और प्रावधानो के मुताबिक तो इन्हें हर हाल में बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए जवाबदेही तय की गई है। लेकिन हकीक़त में होता क्या है,गरीब महंगे इलाज और महंगी दवाओं के दुष्चक्र में फंसते जाता है, जिसका फायदा अंततः निजी अस्पताल और बीमा कंपनियों को ही मिलता है।मान लीजिए किसी गरीब को गुर्दा प्रत्यारोपण कराना है,तो क्या उसका प्रत्यारोपण मात्र पांच लाख में हो जाएगा? यदि प्रत्यारोपण हो भी गया तो प्रत्यारोपण के बाद का खर्च? बात घूमफिर कर वहीँ आ गया।बीमा के बजाय सरकारी चिकित्सालय में इलाज़ की सुविधा उपलब्ध कराने का सरकार प्रयास करती तो यकीनन लाभ आम जनता को मिलता। बीमा स्कीम प्रलोभन मात्र है जिसमें गरीब फंस कर चूसाता रहेगा।

आयुष्मान योजना यकीनन गरीबो के हित के लिए हो लेकिन बाजारवाद के दौर में पूर्णतया व्यवसायिक हो चुका चिकित्साजगत और बीमा कंपनिया अपना हित देख कर फायदा नहीं उठाएगी  ऐसा कहना पानी को लाठी से मारकर बाँटने जैसा ही लगता है।

हां,इस योजना का लाभ लेने वाले उपभोगता और सुविधा देने वाले तंत्र का हर स्तंभ अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएगा तो यकीन “आयुष्मान भारत” आयुष्मान भवः साबित होगा।हर चीज के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं।

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