कॉरपोरेट की जेब में मीडिया

4:17 pm or June 16, 2014
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हरेराम मिश्र-

मीडिया और उसके वर्ग चरित्र पर बात शुरू करने से पहले मैं एक वाकिए का जिक्र करना चाहूंगा। बात उन दिनों की हैं जब पर्यावरण पर कार्पोरेट कंपनियों के बढ़ रहे दखल और मानवता पर उसके खतरे को लेकर संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता नारायण के एनजीओ ने पहली बार यह बताया था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीतल पेयों में खतरनाक पेस्टीसाइड् का उपयोग होता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होता है। देश भर के अखबारों में यह खबर तो छपी लेकिन, जब हमारे कुछ साथियों ने शीतल पेयों को बनाने वाली बहुराश्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ लगातार एक सीरीज चलाने की बात एक अखबार के स्थानीय संपादक से की तो संपादक ने अपनी मजबूरी गिनाते हुए कहा कि मैनेजमेंट ने इन सबके खिलाफ आगे ज्यादा कुछ लिखने से रोक रखा हैं क्योंकि ये कंपनियां हमारे टॉप बिजनेस क्लाइंट में आती हैं।

यही नहीं, अभी हॉल के ही घटनाक्रम पर अगर गौर किया जाए तो रक्षा क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के सवाल पर हिन्दी अखबारों द्वारा जिस तरह से नरेन्द्र मोदी सरकार के पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है उससे भी मीडिया का चरित्र समझा जा सकता है। रक्षा क्षेत्र में एफडीआई लाने को मोदी सरकार का पहला क्रान्तिकारी कदम बताने वाले हिन्दी मीडिया में इसके खतरे और देश को होने वाले नुकसानों, सेना पर इसका प्रभाव और देष में चल रही कल्याणकारी योजनाओं के खर्चों में कटौती आदि पर अखबारों ने जो चुप्पी साधा रखी है उससे साफ है कि मीडिया किस तरह कार्पोरेट के लिए एक लॉबिस्ट की भमिका में आ चुका है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

अपने पत्रकारीय पेशे में मैंने यह बात गहराई से अनुभव की है कि आज वही पत्रकार एक सफल पत्रकार है जो अखबार को अधिकतम् विज्ञापन दिलवा सकता हो। एक पत्रकार जिसका काम खबरों पर नजर रखना हो, उसकी तह में जाना हो, खबरों के सामाजिक, राजनैतिक प्रभाव का विश्लेषण करना हो, को विज्ञापन लाने के टारगेटस् दिये जाएं तो वह ईमानदारी से अपने पत्रकारीय पेशे का निर्वाहन किस प्रकार कर पायेगा? इस मामले में ग्रामीण पत्रकारों की हालत तो बेहद ही खस्ता है और वह महज नाम के पत्रकार होते हैं। कर्ज की तंगी, मौसम की मार से फसलों की तबाही के बाद आत्महत्या करते किसान उनकी खबरों में कहीं नहीं होते लेकिन किसी छुटभैया नेता की ताजपोशी की खबरें बाकायदा इस रिमार्क के साथ ऑफिस में भेजी जाती हैं कि यह विज्ञापन देने के लिए कह चुका है., समाचार फोटो सहित ही प्रकाशित कीजिएगा। जब अखबारों में खबरों के चयन का आधार ही विज्ञापन हो चुके हों तो फिर मजदूर, किसान या वह तबका जो मुश्किल से दो जून की रोटी का जुगाड़ करता है, अखबारों में खबर किस तरह बन सकेगा। दरअसल बाजार के दबाव में आज हिन्दी मीडिया आम जन के सरोकारों से साल दर साल दूर खिसकता जा रहा हैं। उनकी व्यावसायिकता ही उन्हें आम जन के सरोकारों और सवालों से दूर ले जा रही है। तमाम अखबार आज टायलेट पेपर में तब्दील हो चुके हैं। हमारे एक साथी कहते है कि पहले पत्रकारों का दृष्टिकोण या तो वाम रुझान वाला या फिर दक्षिणपंथी होता था। खबर लेखन और उसकी विषयवस्तु भी इन्हीं दोनो से प्रभावित रहते थे। लेकिन, उंगली पर गिने चुने लोगों को छोड़ दें तो अब पत्रकारों में रैडिकल सोच कतई नहीं रही। वे बताते हैं कि आज के ज्यादातर पत्रकार अखबार चलाने वाली कंपनी के एक ऐसे कर्मचारी भर हैं जिनका काम सिर्फ कंपनी का हित देखना हैं। कंपनी के हित में ही वह समाज, राष्ट्र और दुनिया का हित देखता है। दरअसल वह कॉरपोटेट हितों के लिए कलम की वेश्यावृत्ति करता है। और शायद यही वजह हैं कि आज हिन्दी मीडिया विश्वसनीयता के खतरनाक संकट से जूझ रहा है। यह संकट उसे किस किनारे लगाएगा इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिंदी मीडिया पर अब बाजार का दबाव इतना ज्यादा हो चुका है कि वह खबरों की प्रकृति को ही बदल देता हेै। आज हिन्दी के कई अखबार सिर्फ विज्ञापनों से होने वाली मोटी कमाई के लिए ही प्रकाशित हो रहे हैं। उन्हें देश की आम जनता से, उसके दु:ख दर्द से, उसके सवालों से तनिक भी सरोकार नहीं हैं।

दरअसल हिन्दी मीडिया में यह गिरावट अचानक ही उत्पन्न नहीं हुई। सोवियत संघ के पतन के बाद जब से इस देश में वैश्वीकरण की नीतियां लागू हुईं, तब से लगातार व्यक्ति आत्म केन्द्रित होता चला गया। जब बाजार पर पूंजी हावी हुई तो अखबारों की सोच भी बाजार के मुताबिक हो चली। तब से साल दर साल अखबारों पर, उनके संपादकों पर खबरों की प्रकृति को लेकर मैनेजमेंट के दबाव बढ़ने लगे। कभी संपादकीय के लोग केवल छह घंटे काम करते थे। आज बारह से चौदह घंटे काम कर रहे हैं। वैश्वीकरण ने देश में गरीब और अमीर की खाई को खतरनाक स्तर तक चौड़ा कर दिया है और लगातार यह खाईं बढ़ती जा रही है। इन्हीं सबकी वजह से देश में अलगाववाद, नक्सलवाद, आतंकवाद तथा समाज में अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर अखबार इन संवेदनशील मुददो पर सरकार की सोच के मुताबिक ही लिखते हैं। क्योंकि अगर उन्हें करोड़ो के सरकारी विज्ञापन लेने हैं तो जरूरी है कि उनकी हां में हां मिलाओ। इन्हीं वजहों से हिन्दी मीडिया से रैडिकल पत्रकार लगभग लुप्त हो चुके हैं, उनकी जगह अब दलालों ने ले ली है। जिनका काम ही यह प्रकाशित करना है कि वैश्वीकरण से ही देश में तरक्की आयी है। उदारीकरण के इस दौर में हिन्दी मीडिया के मार्फत पूंजीपति वर्ग अपने विचार आम जनता पर थोपता है। पैसे के बल पर ही अखबारों द्वारा भूखी, नंगी और बेरोजगार जनता को फील गुड करा देता है। कुल मिलाकर आज के पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर सरकार और कार्पोरेट हितों की दलाली कर रहे हैं। अब विदेशी हथियार कंपनियां ही देश की सरक्षा कर सकती हैं और रक्षा क्षेत्र में एफडीआई देश हित में है, ऐसा प्रचार इस मुल्क का मीडिया तेजी से कर रहा है। बाजार ने संपादकों की भूमिका को काफी संकुचित कर दिया है। यह देश के लोकतंत्र के लिए शुभ-लक्षण तो कतई नहीं है। लेकिन, अखबारों की इस दलाली से भी व्यवस्था पर संकट आना तय है। देश की वह बहुसंख्यक जनता जो आज खबर ही नही बन रही, का मूड सरकार कभी नहीं भांप पाएगी क्योंकि जिनका काम ही समाज को दिषा देना है वह ही बहुसंख्यक जनता के बीच काम नही कर रहे हैं, फिर वे आम जनता का मूड कैसे भांप पाएगें? आज नही ंतो कल व्यवस्था पर संकट आना तो तय ही है। आम जनता अपनी उपेक्षा के इस जाल को कब तक देखेगी? एक न एक दिन पूंजी के बल पर कायम यह लुटेरा तंत्र बदलेगा। तब कार्पोरेट हितों के लिए दिन रात काम करने वाले, पूंजी के पालतू और दलाल पत्रकारों का क्या होगा? यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन यह अंधेरा अनन्त नहीं है। पूंजी के बल पर कायम मीडिया और सत्ता का गठजोड़ एक दिन जरूर टूटेगा।

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