नमामि गंगे – शब्दवीर की नहीं कर्मवीर की जरुरत है – अब्दुल रशीद

6:29 pm or July 17, 2018
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नमामि गंगे –  शब्दवीर की नहीं कर्मवीर की जरुरत है।

  • अब्दुल रशीद

“न मुझे किसी ने भेजा है,न मैं यहां आया हूँ, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है”- नरेंद्र मोदी

गंगा नदी का न सिर्फ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है बल्कि देश के सवा अरब लोगों के लिए गंगा एक जीवनदायिनी नदी है। देश की 40% आबादी गंगा नदी पर निर्भर है। एक अनुमान के अनुसार गंगा में बीस लाख लोग रोजाना धार्मिक स्नान करते हैं।प्रदूषण जीवनदायिनी गंगा को जानलेवा बनाती जा रही है। सरकारे गंगा के सफाई पर जुमलेबाजी कर अपना हित तो प्राप्त करती रही लेकिन गंगा साल दर साल और प्रदूषित होती चली गई।

विपक्ष में रह कर भाजपा ने जिन मुद्दों को खूब जोर शोर से उठाया था उनमें एक गंगा की सफाई भी था। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जब वाराणासी पहुंचे तब उन्होंने कहा था, न मुझे किसी ने भेजा है,न मैं यहां आया हूँ, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है।

प्रचंड बहुमत प्राप्त कर सत्ता प्राप्ति के उत्साह में नई सरकार ने तेजी दिखाते हुए नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय बना दिया और उमा भारती को मंत्री, मंत्री बनने के बाद उमा भारती ने दावा किया था कि तीन साल में गंगा साफ हो जाएगी। गंगा तो साफ़ नहीं हुआ अलबत्ता उनकी मंत्रालय से विदाई कर दी गई।

13-मई, 2015 को केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार की फ्लैगशिप योजना नमामि गंगे को मंजूरी दे दी गई। इस योजना के तहत गंगा नदी को समग्र तौर पर संरक्षित और स्‍वच्‍छ करने के कदम उठाए जाएंगे। इस पर अगले पांच साल में 20 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।जो की गंगा को स्‍वच्‍छ करने के लिए पिछले 30 साल में सरकार की ओर से खर्च की गई राशि का चार गुना था।

नमामि गंगे योजना की शुरुआत मोदी सरकार ने ऐसे किया,कि लोगों को यह विश्वास हो गया के कुछ हो न हो,कम से कम गंगा साफ जरूर हो जाएगी। लेकिन जिन लोगों को ऐसा विश्वास हो चला था उनको यह जानकर निराशा ही होगा कि मौजूदा मोदी सरकार ने भी गंगा सफाई के मुद्दे को लेकर सिर्फ जुमलेबाजी कर राजनैतिक हित ही साधा है। यही वजह है कि, अपने कार्यकाल के चार साल बीत जाने के बाद मिशन 2019 के तहत वाराणसी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह नहीं बताया के गंगा की सफाई के लिए उनकी सरकार ने कौन कौन से ठोस कदम उठाए और सरकार के प्रयासों से गंगा अबतक कितनी साफ़ हुई। हां विपक्ष पर हमलावर जरुर रहें।

यह बात भी बेहद दिलचस्प है कि,मां गंगा के आशीर्वाद से प्रधानमंत्री बनने वाले नरेन्द्र मोदी,राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की अब तक हुई तीन बैठकों में से केवल एक ही में उपस्थित रहें, बाकी दो बैठकों में वे गए ही नहीं। स्वयं घोषित गंगा की सेविका उमा भारती को गंगा मंत्रालय से ही हटा दिया गया और यह मंत्रालय नितिन गडकरी को सौंप दिया गया जिनके पास सड़क और जहाजरानी मंत्रालयों की बड़ी जिम्मेदारी पहले से ही है। गडकरी का कहना है कि नमामि गंगे योजना के तहत गंगा की सफाई में वे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे,2019 तक गंगा 70-80 प्रतिशत साफ हो जाएगी।जानकार ऐसे दावों को व्यवहारिक ही नहीं मानते। इतना तो तय है,यदि अच्छा काम हुआ होता तो भाजपा के प्रवक्ता, नेता और प्रधानमंत्री नमामि गंगे पर यूं चुपचाप नहीं रहते!

सूचना के अधिकार के तहत ग्रेटर नोएडा के रामवीर सिंह को भेजे गए जवाब में जल संसाधन मंत्रालय ने साल दर साल खर्च का ब्योरा दिया है। लेकिन सफाई की स्थिति पूछे जाने पर मंत्रालय ने यह बताया की उनके पास यह जानकारी नहीं है कि, अब तक गंगा सफाई पर कितना काम हुआ और गंगा कितनी साफ हुई।

आरटीआई में गंगा सफाई पर हुए खर्च के सवाल पर मंत्रालय ने सूचित किया कि केंद्र और राज्यों के कार्यक्रम के तहत 2014 से अब तक कुल 3475.46 करोड़ रुपये 2014 से खर्च किए गए हैं जबकि 5298.22 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें 2014-15 में 170.99 करोड़ रुपये, 2015-16 में 602.60 करोड़ रुपये, 2016-17 में 1062.81 करोड़ रुपये और सर्वाधिक 2017-18 में 1625.11 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वित्त वर्ष 2018-19 में अब तक 13.95 करोड़ रुपये का खर्च नदी की सफाई में किया जा चुका है।

सवाल यह है कि यदि सचमुच काम हुआ होता और योजना को अटकाया नहीं गया होता तो सरकार को इतना तो जरूर पता होता कि गंगा की कितनी सफाई हुई।

मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे गंगा की सफाई के तमाम दावों के उलट उनके कार्यकाल में गंगा और अधिक गंदी हो गई। बीते साल केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने एक सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में बताया गया, कि हरिद्वार में गंगा नदी का पानी नहाने के लिए भी ठीक नहीं है।ऐसा हाल पिछले साल तक था। तब ऐसी स्थिति थी तो अब कैसी होगी इसका अंदाजा स्वतः लगाया जा सकता है।

विडम्बना देखिए, विपक्ष में रहते हुए गंगा में बढाती गंदगी को लेकर कांग्रेसी सरकारों को घेरने वाली भाजपा, अब जब उनकी खुद की सरकार है, तब सरकार के पास गंगा की सफाई को लेकर कोई जानकारी ही नहीं है।सरकारों को समझना चाहिए गंगा के नाम पर लोकलुभावन वादों,नारों और कार्यक्रम के सहारे अपना राजनैतिक हित साधने से गंगा साफ नहीं होगी।

गंगा को मोक्षदायिनी कहकर अनुष्ठानिक या मुनाफादायिनी कहकर कॉरपोरेटी प्यास बुझा लीजिए,लेकिन एक कडवी हकीकत यह है कि गंगा को वर्षों से खुद अपनी मुक्ति की तलाश है।नमामि गंगे मिशन बना देने से गंगा साफ नहीं होगी। इसके लिए इमानदारी और जिम्मेदारी के साथ योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा या यूं कहें गंगा की सफाई के लिए शब्दवीर की नहीं कर्मवीर की जरुरत है।

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