एक विस्मृत गुजराती प्रधानमंत्री

4:21 pm or June 16, 2014
The Prime Minister Mr. Morarji Desai at a press conference at Raj Bhavan, Calcutta, Photo : Tara Pada Banerji, Date : 30.5.77

रामचन्द्र गुहा-

चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने अनेक बार यह कहा कि वे वल्लभ भाई पटेल को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। और उन्होने पटेल की स्मृति में एक ”स्टेच्यू ऑफ यूनिटी” बनाने का वादा भी किया जो ”स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी” से भी विशाल एवं शानदार होगी। श्री मोदी ने यह कभी नही बताया कि वे सरदार पटेल की इतनी अधिक तारीफ क्यों करते है। मैं समझता हूँ कि वे ऐसा शायद इसलिये करते होंगे क्योंकि सरदार एक उत्कृष्ट प्रशासक थे, व्यापार के प्रति उनका झुकाव था, उन्होने चीन के प्रति कठोर रूख अपनाया और यदि पटेल प्रधानमंत्री होते तो देश में नेहरू-गाँधी वंश कभी नही होता।

अपने भाषणों में श्री मोदी ने अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भी प्रशंसा की। जहाँ तक मुझे याद है, उन्होने एक नाम का कभी भी उल्लेख नही किया और वह है मोरारजी देसाई का। पटेल की तरह ही मोरारजी देसाई भी गुजरात के निवासी थे। किन्तु पटेल के विपरीत वे वास्तव में भारत के प्रधानमंत्री बन गये।

29 फरवरी 1896 को जन्मे देसाई ने औपनिवेशिक शासन में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत की। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए और उन्होने लंबा समय जेल में बिताया। स्वतंत्रता के बाद उन्होने तत्कालीन अविभाजित बंबई राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की। बाद में उन्हे केन्द्र में स्थानांतरित कर दिया गया जहां उन्होने वित्ता मंत्री सहित केबिनेट के अन्य महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।

अप्रैल 1956 में जवाहरलाल नेहरू ने सी.डी. देशमुख को पत्र लिखते हुये रेखांकित किया था कि -”मोरारजी देसाई जैसे कुछ ही लोग ऐसे है जिनका मैं उनकी ईमानदारी, क्षमता, दक्षता, और निष्पक्षता के लिए बहुत अधिक सम्मान करता हूँ। बाद में उस वर्ष हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अहमदाबाद में संघर्ष हुआ था। जब इस संघर्ष ने पूर्णतया दंगों का रूप ले लिया, तो देसाई अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठ गये थे जो उन्होने उपवास तभी तोड़ा जब हिंसा बंद हो गई।

अप्रैल 1960 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई सीमा विवाद के समाधान के लिये भारत यात्रा पर आये थे। उन्होंने देसाई सहित कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। जब चीनी प्रधानमंत्री ने दलाई लामा को भारत में शरण दिये जाने का विरोध किया तो देसाई ने उन्हें याद दिलाया कि स्वयं कार्ल मार्क्स को भी ब्रिटेन में शरण दी गई थी। इसके बाद जब चाऊ एनलाई ने उनसे पूछा कि सरकार ने चीनी दूतावास के बाहर विरोधा प्रदर्शन की अनुमति क्यों दी तब देसाई ने एक बार फिर तानाशाही और लोकतंत्र के बीच के मौलिक भेद को रेखांकित किया तथा बताया कि उनके स्वयं द्वारा संसद में प्रस्तुत हर बजट के बाद सड़कों पर उनके पुतले जलाये गये थे।

नेहरू की मृत्यु के उपरान्त लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। जब शास्त्री का 1966 मे आकस्मिक निधन हो गया तब कांग्रेस के अध्यक्ष हेतु देसाई और इंदिरा गांधी के बीच चुनाव लड़ा गया। देसाई इसमें पराजित हुये और वे श्रीमती गांधी के मंत्रिमंडल में शामिल होकर देश की सेवा करने के लिए सहमत हो गये। हालांकि, दोनों में कभी भी व्यक्तिगत रूप से या वैचारिक सामंजस्य स्थापित नही हो सका। जब श्रीमती गांधी ने 1969 में स्वयं को वामपंथ की ओर मोड़ा तो देसाई से वित्ता मंत्रालय वापस ले लिया गया इस कारण देसाई ने इंदिरा मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उसके तुरंत बाद कांग्रेस विभाजित हो गई। देसाई अब विपक्ष में चले गये थे और इसके बाद 1975 में जब आपातकाल लागू किया गया तो इन्दिरा गाँधी द्वारा उन्हे (अपने अन्य विरोधियों के साथ) जेल में बंद कर दिया गया था।

जनवरी 1977 में श्रीमती गांधी के आलोचक रिहा कर दिये गये थे। 19 जनवरी को जनसंघ, भारतीय लोक दल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी नेताओं की मोरारजी देसाई के निवास पर बैठक हुई। उन्होने अपने आपसी विलय का निश्चय किया और एक संयुक्त जनता पार्टी बनाने का निर्णय लिया गया।

नई पार्टी ने मार्च के चुनावों में जब कांग्रेस को चारों खाने चित कर दिया तो देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ढाई साल तक प्रधानमंत्री के रूप में काम किया। उनके कार्यकाल की बातें जनता की स्मृति में बहुत अच्छी तरह से नही है क्योंकि उनकी पार्टी (और सरकार) क्षुद्र कलह के कारण आपस में बँट गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री के रूप में अपने थोड़े समय में उन्होने भारतीय लोकतंत्र की साख को पुनर्स्थापित करने में काफी सहयोग दिया था जिसको आपातकाल के दौरान गंभीर रूप से क्षति पंहुची थी।

1977 के चुनावों की पूर्व संधया पर दिये गये एक साक्षात्कार में देसाई ने कहा था कि यदि वे चुने गए तो उनकी सरकार लोगों में व्याप्त भय को दूर करने के लिए काम करेगी और संविधान को दुरूस्त करेगी जिससे कि पुन: देश पर आपातकाल न थोपा जा सके। उन्होने अपने वचन का पालन किया। देसाई के कानून मंत्री शांति भूषण द्वारा लाये गये 44 वें संविधान संशोधान ने आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री की शक्तियों को बढ़ाने या उसे न्यायिक जांच से प्रतिरक्षा प्रदान करने के प्रावधानों को समाप्त कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि अपने अतीत के मतभेदों के बावजूद देसाई ने स्वयं इंदिरा गांधी को संविधान की बहाली के पक्ष में वोट करने के लिए राजी कर लिया।

              देसाई के कार्यकाल के दौरान ही पहली बार जम्मू एवं कश्मीर में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुये। उन्होंने सरकार में पेशेवर लोगों को लाने के लिए काम किया। पहले सचिव स्तर की नियुक्तियों में आई.ए.एस. अधिकारियों का एकाधिकार था। ऐसे में देसाई ने एक अर्थशास्त्री(मनमोहन सिंह) को वित्त मंत्रालय में सचिव बनाया। कृषि सचिव के रूप में एक पौधा वैज्ञानिक (एम.एस.स्वामीनाथन) की नियुक्ति की। पेट्रोलियम सचिव के रूप में एक रसायनशास्त्री (लवराज कुमार) को लाये। एक इंजीनियर (मैनुअल मेनेजीस) को उन्होने रक्षा उत्पादन का सचिव नियुक्त किया। (अफसोस की बात है कि देसाई के हटने के बाद इन प्रयोगों को निरस्त कर दिया गया जबकि उन्हे जारी रखते हुये आगे ले जाना चाहिये था।)

          वैयक्तिक रूप से देसाई कुछ-कुछ कठोर और आकर्षणविहीन थे।

                 प्राकृतिक उपचार और निषेध के प्रति अपने जुनून के कारण मीडिया और मध्यम वर्ग की निगाह में उनका आकर्षण कम हो गया था। फिर भी वे सार्वजनिक जीवन में जैसे कठोर दिखते थे वैसे नही थे। वे क्रिकेट पसंद करते थे। उनके बाल्यावस्था के प्रमुख नायकों में से सी.के. नायडू एक थे – और यहाँ तक कि शास्त्रीय संगीत के प्रति भी उनका लगाव था। विभाजन के बाद महान गायक बड़े गुलाम अली खान पाकिस्तान जाने के लिए राजी हो गये थे किन्तु जब उन्हे लगा कि वहाँ संगीत के प्रति समुचित आदर नही है तो उस्ताद ने पुन: भारत वापसी की मांग की। देसाई तब तत्कालीन बम्बई राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन्होने उनके रहने के लिये सरकारी आवास आवंटित कर उनकी मदद की।

               देसाई में भी (अन्य भारतीयों की भांति) कुछ दोष थे। उनमें से एक यह था कि वे अपने बच्चों की गलतियों को लेकर ऑंखों पर पट्टी बाँध लेते थे। फिर भी उनकी ताकत उनकी कमजोरियों की तुलना में बहुत ज्यादा थी। हमारे पहले गुजराती प्रधानमंत्री एक देशभक्त, एक लोकतंत्रवादी, एक आधुनिक विचारधारा वाले प्रशासक, एक द्विदलीय सांसद, एक शास्त्रीय संगीत प्रेमी थे जिन्होने अपना पूरा जीवन धार्मिक सद्भाव की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।

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