प्रधानमंत्री जी, उस दिन से और जनता के आक्रोश से डरिये! – कृष्ण प्रताप सिंह

3:46 pm or August 7, 2018
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प्रधानमंत्री जी, उस दिन से और जनता के आक्रोश से डरिये!

  • कृष्ण प्रताप सिंह
अवध में एक बहुत पुरानी कहावत है: जो टोपी नहीं लगाते, उन्हें इसका एलान करने की जरूरत नहीं पड़ती। गत रविवार को साठ हजार करोड़ रुपयों की परियोजनाओं का शिलान्यास करने इसी अवध की पुरानी राजधानी लखनऊ पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश के जाने-माने उद्योपतियों की मौजूदगी में सफाई देनी पड़ी कि वे उद्योगपतियों के साथ खड़े होने से नहीं डरते, क्योंकि उनकी नीयत साफ और इरादे नेक हैं, तो समझा जा सकता है कि न सिर्फ उनके इस ‘खड़े होने’ बल्कि ‘साफ नीयत’ व ‘नेक इरादांे’ं से पैदा हुए डर उनके अन्दर कितने गहरे पैठ चुके हैं। न पैठे होते तो वे उन राहुल गांधी के आरोपों की सफाई देते क्यों फिरते, जिनके कहे को अब तक उनके ‘पप्पू’ होने के या इस बहाने हवा में उड़ाते आ रहे थे कि कुछ लोगों की उम्र बढ़ जाती है, तो भी समझ नहीं बढ़ती।
एक पल को उनके इस डर को दरकिनार कर दें तो भी अगर प्रधानमंत्री समझते हैं कि जो कृत्य उनके विरोधियों द्वारा रात के अंधेरे में किये जाने के कारण पाप समझा जाता रहा है, उनके द्वारा निपट ढिठाई से दिन के उजाले में और डंके की चोट पर किसे जाने से पुण्य बन जायेगा, तो गलती पर हैं। दरअस्ल, लखनऊ में उक्त शिलान्यासों के वक्त जिस अवध को वे बता रहे थे कि उसने उनके प्रति जो प्यार दरशाया है, ब्याज सहित उसका सिला देने का अपना वचन निभाने में कुछ भी उठा नहीं रख रहे, उसका नवाबों से भी काफी पहले से ऐसे ढीठों से वास्ता पड़ता आ रहा है, जो दूसरों के घरों में नकबें काटकर उनमें आल्हा गाया करते हैं और कतई नहीं डरतेे।
अवधवासी बेहतर जानते हैं कि ढीठों की वह प्रजाति लुप्त नहीं हो गयी, अभी भी फल-फूल रही है। प्रधानमंत्री की अपनी जमात में भी ऐसे ढेर सारे ढीठ हैं। भले ही चूंकि चिराग गले अंधेरा होता ही है, वे उन्हें देख न पाते हो। कर्नाटक के उनके एक विधायक ने तो, क्या नाम है उसका-बासनगौड़ा पाटिल यतनाल, ढिठाईपूर्वक खुल्लमखुल्ला एलान कर दिया है कि वह गृहमंत्री होता तो देश के सारे बुद्धिजीवियों को गोली मारने का आदेश दे देता। उसके अनूुसार ये सारे बुद्धिजीवी देशद्रोही हैं और उनको जिन्दा रहने का हक नहीं है। वह तो जैसे खुदा ने तमाम ‘देशद्रोहियों’ को पाकिस्तान भेजने के इच्छुक सज्जनों को, वैसे ही इस गंजे को भी नाखून नहीं दिये। वरना वह पानसरे, कलबुर्गी, दाभोलकर और गौरी लंकेश की बिरादरी का वंशनाश कराते भी नहीं ही डरता। इसलिए कि उसने प्रधानमंत्री के उन भक्तों को कभी डरते नहीं देखा, जो 2002 में गुजरात में उनके मुख्यमंत्री रहते हुए नरसंहार का अभी भी बढ़चढ़कर औचित्य सिद्ध करते रहते हैं।
फिर जिन भीड़ों को ऐसे नाखून मिल गये हैं, साथ ही सरकारों और सरकारी पार्टियों ने न डरने की सहूलियत भी हासिल हो गई है, वे कहां डर रही हैं? जब भी जिसको भी उनका मन हो रहा है, कभी गोरक्षा तो कभी बच्चा चोरी और उत्तर प्रदेश में तो भैंस तस्करी तक के नाम पर, पीट-पीट कर ठिकाने लगा दे रही हैं! शायद उन्हीं से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री ने भी कह दिया कि वे नहीं डरते।
वैसे भी वे ऐसे देश के प्रधानमंत्री हैं, जिसमें किसी सौभाग्यवती के सैयां कोतवाल हो जायें तो भी लोग उससे पूछने लगते हैं-अब डर काहे का? फिर प्रधानमंत्री तो खुद कोतवाल, माफ कीजिएगा, प्रधानमंत्री हैं, सैकड़ों-हजारों गुनी शक्ति से सम्पन्न। जब भी चाहें जिसकी भी मुश्कें कसवा सकते हैं। तभी तो अनेक देशवासियों को उनकी तानाशाही के अंदेशे डराते रहते हैं। यानी प्रधानमंत्री डरते भी हैं और डराते भी हैं, जबकि आचार्य विनोबा भावे ने कहा था-ये दोनों पाप हैं।
यों, किसे नहीं मालूम कि किसी सत्ताधीश का उद्योगपतियों के साथ खड़ा होना उनके डर का कारण नहीं होता। वह आम लोगों में भले ही डर पैदा करता है, उनके लिए परस्पर संरक्षण का खेल होता है, जिसमें कभी नाव गाड़ी पर होती है और कभी गाड़ी नाव पर। यानी कभी उद्योगपति का हाथ सत्ताधीश की पीठ पर होता है और कभी सत्ताधीश का हाथ उद्योगपति की पीठ पर।
प्रधानमंत्री चाहें तो यह बात उन अमर सिंह से ही पूछ लें, अपने भाषण के वक्त अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने जिनकी शहादत दिलाई थी। या फिर इस या उस किसी भी अम्बानी से। पार्टियों और नेताओं को, प्रधानमंत्री की पार्टी को भी, सबसे ज्यादा चुनावी चन्दा ये उद्योगपति ही देते हैं। हां, जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को विमान और हेलीकाॅप्टर वगैरह भी उपलब्ध ही कराते हैं।
लेेकिन प्रधानमंत्री को उद्योपतियों के साथ खड़े होने से न डरने का एलान जरूरी लगा तो उसके एक दिन पहले जब वे लखनऊ में ही कह रहे थे, उसी ‘पप्पू’ को जवाब देने के चक्कर में, कि वे गरीबों की तकलीफों के भागीदार हैं, यह कहने की जरूरत भी महसूस करनी चाहिए थी कि इस भागीदारी को लेकर वे बहुत डरे हुए हैं। इस अंदेशे को लेकर कि वे धान कूटना और कांख ढकना दोनों एक साथ क्योंकर मुमकिन कर पायेंगे? खुद को मालियों और कुम्हारों दोनों का एक साथ शुभचिंतक कैसे सिद्ध कर पायेंगे? उनके कट्टरपंथी भाइयों को भव्य राममन्दिर चाहिए और विकास के सब्जबाग के शिकारों को एक्सप्रेस हाइवे!
अपनी बात करूं तो जब प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के उद्योगपति कोई चोर-लुटेरे नहीं हैं, मुझे लगा कि हो सकता है, प्रधानमंत्री समझते हों कि उनका यह प्रमाणपत्र आगे चलकर मेहुल चैकसियों, नीरव मोदियों और विजय माल्याओं के साथ उनकी भावी संततियों के भी बहुत काम आयेगा। लेकिन जब प्रधानमंत्री ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता बताया और साथ ही यह भी कहा कि उनका अपमान नहीं किया जाना चाहिए तो समझ नहीं पाया कि वे इतने संकोच से काम क्यों ले रहे हैं? सीधे यही कह देते कि अब यह देश उद्योगपतियों का है और उनकी मार्फत देष पर वही राज कर रहे हैं, तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता? अपने और अम्बानियों के रिश्तों के पक्ष में गांधी व बिड़ला की दोस्ती की नजीर दे डाली, तो भी क्या बिगाड़ लिया? देश तो वैसे भी उसी का होता है, जो उसका निर्माण करे और प्रधानमंत्री कह रहे हंै कि उद्योगपति राष्ट्र के निर्माता हैं तो फिर कोई किस तर्क से कहेगा कि देश उनका नहीं हैं?
और है तो इसमें चकित होने जैसा क्या है? प्रधानमंत्री जिस तरह अपने पिछले चार सालों में कांग्रेस के अध्यक्षों सोनिया व राहुल गांधी पर बरसते-बरसते उन्हीं की पार्टी की सरकार के नेता डाॅ. मनमोहन सिंह द्वारा पहले वित्तमंत्री, फिर प्रधानमंत्री के रूप में 24 जुलाई, 1991 से बनानी शुरू की गई भूमंडलीकरण की सड़क पर अपने तथाकथित ‘न्यू इंडिया’ का हाइवे बनाते रहे हैं, एक न एक दिन उसकी यही परिणति होनी थी। यह कैसे हो सकता था कि ‘सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट’ की पैरोकार भूमंडलीकरण की नीतियां तो देश में भरपूर फूलें-फलें और निवेशकरूपधारी फिटेस्ट उद्योगपति दलित-वंचित यानी अनफिट नागरिकों की छाती पर मूंग दलने से परहेज बरतते रहें। क्या आश्चर्य कि कभी वे खुद हमारे सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रख देते हैं और कभी प्रधानमंत्री को यह सफाई देने को मजबूर कर देते हैं कि वे उनके साथ खड़े होने में न डरते हैं और न शरमाते हैं।
लेकिन प्रधानमंत्री को कम से कम अपना एक मुगालता अभी से दूर कर लेना चाहिए। ये उद्योगपति हमारी राजसत्ता के सम्पूर्ण अतिक्रमण में, जिसके लिए आजकल वे कोई भी कोशिश उठा नहीं रख रहे, कामयाब हो गये तो प्रधानमंत्री को अपने साथ खड़ा करने की जरूरत ही महसूस नहीं करेंगे। अभी ही हालत यह है कि प्रधानमंत्री को दुनिया भर में घूम-घूम कर निवेश के लिए उनकी मानमनौवल करनी पड़़ रही है। वे वाकई ‘राष्ट्रनिर्माता’ हो जायेंगे तो उनकी भृकुटियां कब, किसपर और कितनी और टेढ़ी हो जायेगी, सोचना अभी से शुरू करना जरूरी है।
हां, प्रधानमंत्री जी! आप उस दिन से और उससे उमड़ सकने वाले जनता के आक्रोश से जरूर डरिये और डरिये तो ईमानदारी से स्वीकार कीजिए, उसे प्रकट करने से झिझकिये नहीं। वरना आप जब भी और जिसके साथ भी खड़े होंगे और जिसके भी दुःखों के भागीदार होने का दावा करें, उसका कोई मतलब नहीं रह जायेगा।

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1 Comment

  1. manoj jwala

    श्री कृष्ण प्रताप सिंह जी , आप अपने इस लेख में क्या कह रहे हैं और क्या कहना चाह रहे हैं कुछ समझ में नहीं आया ।

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