थरूरजी विचार जरूर कीजिये

4:27 pm or June 16, 2014
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वीरेन्द्र जैन-

भारतीय राजनीति में जो थोड़े से युवा, सुदर्शन, कोमल और अभिजात्य व्यक्तित्व नजर आते हैं उनमें श्री शशि थरूर भी एक हैं जो पिछले दिनों यूपीए मंत्रिमण्डल में विभिन्न जिम्मेवारी के पद सम्हालते छोड़ते रहे हैं और अन्य व्यक्तिगत घटनाओं दुर्घटनाओं समेत आईपीएल व वायुयान के यात्रियों के वर्गीकरण में भी कैटिल क्लास जैसे जुमलों के लिए भी चर्चा में रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति का कभी कभी कुछ कुछ भावुक और काव्यात्मक हो जाना सहज सम्भव है। इसी भावभूमि में पिछले दिनों उन्होंने एनडीए सरकार के भाजपायी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक नये अवतार के दर्शन कर लिये और कांग्रेस के प्रवक्ता पद की कुर्सी से उनके समन्वित विकास के लिए राजनीतिक सहयोग के आवाहन से नई उम्मीदें बाँध लीं। ऐसा करते समय श्री थरूर यह भी भूल गये कि ये वही मोदी हैं जो कभी उनके प्रिय लोगों की कीमत भी ऑंक चुके हैं। पत्रकारिता के साथ साहित्य में भी रुचि के कारण मैं चाहता हूं कि थरूर जी से कविता की भाषा में ही बात करूँ।

हिन्दी के सुप्रसिध्द कवि श्री मुकुट बिहारी सरोज की एक कविता ‘कैसे कैसे लोग रह गये’ की पंक्तियाँ कहती हैं कि दृ पानी पर दुनिया बहती है, आप हवा के साथ बह गये, कैसे कैसे लोग रह गये।

हवा के साथ बह जाने के कारण ही शायद थरूरजी को यह समझ में नहीं आया कि भले ही पिछला चुनाव भाजपा ने मोदी के नाम को केन्द्र में रख कर लड़ा गया था और एआईडीएमके की जयललिता, डीएमके के करुणानिधि, बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, तेलगुदेशम के चन्द्रबाबू नायडू, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह, बहुजन समाज पार्टी की मायवती आदि की तरह ही उन्हें सजा धजा कर भाजपा का एकमात्र सुप्रीमो बना कर सामने रखा गया था फिर भी भाजपा और मोदी की डोर आरएसएस के हाथों में है, और संसद के पहले प्रवेश के दिन ही वे अडवाणी के कृपा शब्द के बहाने उस सुप्रीमो की भूमिका को नकार चुके हैं और प्रत्यक्ष में भाजपा पार्टी को और परोक्ष में संघ को अपनी माँ बता चुके हैं। स्मरणीय है कि संघ के एक इशारे पर अडवाणी जैसा सबसे शक्तिशाली और समर्थ नेता एक किनारे लगा दिया जाता है और उन्हें स्तीफा देते समय दस लोगों का साथ भी नहीं मिलता। इसलिए नेतृत्व भले ही नरेन्द्र मोदी का हो पर असल सूत्र संघ और उसकी विचारधारा के हाथ में ही होंगे। वे चुनाव जीतने के लिए मुखौटे चाहे जितने लगा लें पर उनके मूल चरित्र में कभी भी अंतर नहीं आ सकता। यह याद दिलाना जरूरी नहीं होना चाहिए कि इस देश का मानस जिन मिथकों के द्वारा निर्मित हुआ है उनमें रामकथा भी प्रमुख है जिसका सबसे शक्तिशाली खलनायक सीताहरण के लिए साधु का भेष धरकर आता है। हमारी राष्ट्रभाषा के मुहावरों में से ही एक ‘बगुला भगत’ भी है और दूसरा ‘ मुँह में राम बगल में छुरी’ भी है। इस देश के सबसे महत्वपूर्ण फिल्म निर्माता, अभिनेता राजकपूर की फिल्म के गीत की पंक्ति कहती है कि देखे पंडित ज्ञानी धयानी दया धार्म के बन्दे, रामनाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे’ । यही कारण है कि शशि थरूर जी की समझ पर कांग्रेस समेत सभी सुनने वाले चौंक गये और काँग्रेस पार्टी को स्पष्ट करना पड़ा कि वह शशि थरूर के उक्त व्यक्तिगत विचारों से सहमत नहीं है।

यद्यपि यह स्वाभाविक है कि देश का सबसे बड़ा पद मिलने के बाद वे खुद को पद के योग्य सिध्द करने का प्रयास करेंगे पर अगर नरेन्द्र मोदी जी का किंचित भी ह्रदय परिवर्तन हुआ होता तो उन्होंने सबसे पहले 2002 में हुयी गलतियों के लिए क्षमा माँगी होती और अपने गर्वीले गुजरात के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कदम उठाये होते।

असल में चुनाव प्रचार के दौरान मोदीजी ने अपनी छवि निर्माण के लिए जिस विदेशी कम्पनी का सहारा लिया उसी के द्वारा बताये गये डिजायनर कपड़े भी पहिने जो क्षेत्र विशेष के अनुसार बदलते रहे। यह उनके सलाहकारों की ही सलाह रही होगी जिसके अनुसार उन्होंने अपने संगठन के साम्प्रदायिक एजेंडे को सुविधानुसार निकाला और जहाँ जरूरत नहीं थी वहाँ नहीं निकाला। उल्लेखनीय है कि चुनाव प्रचार के दौरान ही पश्चिम बंगाल में उन्होंने कहा कि दुर्गा अष्टमी मनाने वाले तो भारत में रह सकते हैं बाकी सोलह मई के बाद बोरिया बिस्तर बाँध लें। उत्तारपूर्व में जाकर कहा कि गैंडों को मारकर उनके अभयारण्य को बंगलादेशियों के लिए खाली कराने की साजिश की जा रही है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में यह भी कहा कि गौपालकों की जगह बूचड़खाना चलाने वालों को अधिक महत्व दिया जा रहा है और काँग्रेस की आदत है कि वह मटर और मटन के चुनाव में मटन को प्राथमिकता देती है। वे यह कहने से भी नहीं चूके कि हरित या श्वेत क्रांति की जगह गुलाबी क्रांति की जा रही है। ये वही मोदीजी हैं जो नवाज शरीफ से गले मिलने से पहले कहा करते थे कि हमारे जवानों का सिर काटने वालों को बिरयानी खिलाई जाती है। पता नहीं कि थरूरजी मोदी के ड्रैस सैंस पर मुग्ध हो गये जो यह भी भूल गये कि मोदी से असहमत होने वालों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह के बयानों के खिलाफ मोदी ने सीधे सीधे कुछ नहीं कहा था और प्रमोद मुत्तालिक को पार्टी में सम्मलित कराने के संकेतों का लाभ लेकर फिर बाहर का रास्ता दिखा देने की योजना भी मोदी टीम की ही थी। रामदेव को गले लगा उनसे प्रचार करवाने वाले मोदी ने उनके कहने पर कई भगवा भेषधारियों को टिकिट दिये। चाँदनाथ, सुमेधानन्द, स्वामी सच्चिदानन्द, उमा भारती, निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ, आदि तो सदन की रंगत बढा ही रहे हैं। मुजफ्फरनगर दंगे के जिन संजीव बालियान पर शपथ ग्रहण समारोह वाले दिन ही दंगों के समय निषेधाज्ञा भंग करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया उन्हें टिकिट देने के ही नहीं राज्यमंत्री बनाने का काम भी उन्हीं मोदीजी ने ही किया है जिन्होंने गुजरात में अमित शाह और माया कोडनानी को सब कुछ जानते हुये भी मंत्री बनाया था। सच तो यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान जो संयम बरता गया उसका कारण यह रहा कि किसी को भी इतने स्पष्ट बहुमत की उम्मीद नहीं थी और एनडीए के बाहर वाले दलों से सहयोग जुटाने के लिए मुखौटा लगाने की जरूरत थी। अगर थरूर जैसे जिम्मेवार नेता ही बिना गहन विचार के भ्रमित होने लगेंगे तो सीधी सरल जनता का आक्रामक प्रचार से धोखा खा जाना तो स्वाभाविक ही है।

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