स्कूल छोड़ते बच्चों की फिक्र कौन करेगा ? – राखी रघुवंशी

2:14 pm or August 23, 2018
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स्कूल छोड़ते बच्चों की फिक्र कौन करेगा ?

  • राखी रघुवंशी

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल, जहाँ हर योजना के क्रियान्वयन हेतु सभी सिस्टम मौजूद हैं, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें की जमीनी स्तर पर योजनाओं का सही और समय पर पालन हो रहा है. लेकिन यहाँ सब कुछ आला अधिकारियों की नाक के नीचे घटित हो जाता है और उन्हें इसकी जानकारी भी नहीं रहती. भोपाल के सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण की गुणवत्ता, उपयोग और  स्वच्छता बच्चों की पढाई में मुख्य बाधक के रूप में विद्यमान है, जबकि इन्ही स्कूलों में महिला टीचर्स के लिय शौचालय नियम से साफ़ होते हैं और तालाबंद भी रहते हैं. लेकिन स्कूलों में निर्मित लड़कियों के शौचालय गन्दगी से भरपूर हैं, जिसपर स्कूल कभी कभी ध्यान देता है, जबकि नगर नगर का एक अमला स्कूलों में स्वच्छता हेतु तैनात किया गया है, लेकिन यह भी नाम भर के लिय स्कूलों में अपना काम करता है. हम केवल इस बात से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर राजधानी में यह हालात हैं तो प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में का स्थिति बनती होगी ?

देश भर में स्वच्छता अभियान के नाम पर करोड़ों रुपए फूंके जा रहे हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस मिशन को सरकारी अमला ही फेल करने में लगा हुआ है। गांव- गांव और घर-घर में पैसे देकर शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है, वहीं प्रदेश के 15 हजार प्रायमरी और मिडिल स्कूलों में आज भी बालक- बालिकाओं शौचालय उपलब्ध नहीं हैं। 22 हजार ऐसे स्कूल हैं, जहां शौचालय तो बना दिए गए हैं, न कोई सुविधा है, और न ही पानी की व्यवस्था है। यह डाटा मानव संसाधन मंत्रालय के पास पहुंचने के बाद प्रदेश सरकार को फटकार लगी है। परिणामस्वरूप राज्य शिक्षा केन्द्र ने कलेक्टरों को पत्र लिखा है, जिसमें मानीटरिंग कर सभी स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए हैं। राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपी रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के एक लाख 13 हजार 833 स्कूलों में से 8,317 प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं में लड़कों के लिए और 6,240 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है। इसी तरह 16,849 स्कूलों में सुविधा विहीन शौचालय बने हैं, वहीं 5 हजार 176 सरकारी स्कूलों में शौचालय तो हैं, पर पानी की सुविधा नहीं है। बच्चों को घर से पीने का पानी तक लेकर आना पड़ता है। पानी के अभाव में यह शौचालय बेमानी साबित हो रहे हैं. भोपाल में अध्ययनरत लड़कियों का कहना है कि स्कूल समय तक शौचालय का उपयोग न करने से कई बार लगता है कि स्कूल ना आना ही बेहतर है.

बच्चों के ड्राप आउट होने के कई कारणों में से एक मुख्य कारण स्कूल में शौचालयों की ख़राब गुणवत्ता का होना भी है. यहाँ बात केवल शौचालय भर की नहीं हैं. दुनिया भर के नेताओं ने मिलकर साल 2030 तक सभी लड़के-लड़कियों को मुफ्त प्राइमरी और सेकेंडरी शिक्षा पूरा करवाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि इस मद में धन मुहैया कराने में कमी और सरकारी उदासीनता के कारण सभी बेहद पिछड़ गए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने 2000 में महात्वाकांक्षी योजना सहस्राब्दी लक्ष्यों में गरीबों की तादाद घटाने, सबके लिए प्राथमिक शिक्षा की गारंटी देने, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर को कम करने और साफ पेयजल मुहैया कराने जैसे लक्ष्य तय किए थे. शिक्षा का हाल देखें तो, इस समय दुनिया के करीब 40 फीसदी बच्चे उन भाषाओं में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो उनकी मातृभाषा नहीं है. अगर स्थिति नहीं बदली तो सबको प्राइमरी स्तर की शिक्षा दिलाने में ही 2042 तक का और सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा में 2059 तक का समय लग जाएगा. यूएन का कहना है कि 2030 तक यह लक्ष्य पूरा करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कम से कम छह गुना वृद्धि करनी होगी.

यूनेस्को का कहना है कि स्थायी विकास के सभी पहलुओं जैसे संपन्नता बढ़ाने, कृषि और सेहत सुधारने, हिंसा घटाने और ज्यादा से ज्यादा लैंगिक बराबरी लाने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है. इस लक्ष्य में पिछड़ जाने का एक बड़ा कारण दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे संघर्ष भी हैं. इन हिंसक संघर्षों के कारण विश्व के करीब 3.6 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं. शिक्षा की कमी के कारण ही बेरोजगारी और हिंसा और बढ़ती है. यूनेस्को का मानना है कि बच्चों को भविष्य में उनके जीवन में काम आने वाले शिक्षा नहीं मिल रही है.

प्राइमरी शिक्षा में दाखिले को लेकर भारत का आंकड़ा बेशक सुनहरा है लेकिन आगे चलकर आंकड़ें बदरंग हो जाते हैं. यूनेस्को की रिपोर्ट में बताती है कि पांचवी के बाद बच्चे तेजी से स्कूल छोड़ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनेस्को के सांख्यिकीय कार्यालय और ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट के एक ताजा संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि भारत में करीब पांच करोड़ बच्चे अपर सेकेंडरी स्कूल तक पहुंच नहीं पाते हैं. यानी छठी, सातवीं और आठवीं की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते. वैश्विक स्तर पर, स्कूल से वंचित रह जाने वाले किशोरों की सबसे अधिक संख्या भारत में ही है. जाहिर है इसके जिम्मेदार बच्चे अकेले नहीं है. और यही तस्वीर जब रोजगार में लगे युवकों तक पहुंचती है तो वहां भी आंकड़े डराने वाले ही हैं. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक तीस लाख स्नातकों में से सिर्फ पांच लाख ही नौकरी करने लायक होते हैं. यानी बाकी युवाओं में नौकरी के लायक गुणवत्ता या कौशल का अभाव पाया गया है. खतरे वाली बात ये है कि ये आत्मसम्मान और गरिमा भी छीन रही है. बुनियादी कौशल से वंचित शिक्षा एक कमजोर दयनीय नागरिक पैदा करती है.

सार्वभौम शिक्षा के लिए ड्रॉपआउट एक अहम चुनौती है. ये भी एक अनिवार्यता है कि बच्चों की शिक्षा बहाल रखी जा सके. वे दाखिले के बाद स्कूल न छोड़ दें. इस मामले में पांचवीं कक्षा और पहली कक्षा के छात्रों का अनुपात एक अहम सूचकांक है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सर्वे में बताया गया है कि प्राइमरी कक्षाओं में सालाना ड्रॉपआउट दर करीब पांच फीसदी है जबकि अपर प्राइमरी कक्षाओं में ये दर तीन फीसदी से कुछ ज्यादा है.

2014 में यूनेस्को की रिपोर्ट ने भारत को सबसे निरक्षर देश आंका था. 2015 में देश का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) महज साढ़े 23 प्रतिशत था जबकि साक्षरता दर थी 74 फीसदी से ज्यादा. देश में प्राइमरी और सेकेंडरी स्तर की शिक्षा पर अपने शोध, अध्ययन और सर्वे के लिए मशहूर संस्था प्रथम की 2014 की सालाना शिक्षा रिपोर्ट बताती है कि भले ही 96.7 फीसदी बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया हुआ है, उनमें से 71 फीसदी जाते भी हैं लेकिन बच्चो का शैक्षणिक स्तर भी सोचनीय पाया गया. यानी दाखिले और एनरोलमेंट तो भरपूर हैं लेकिन शिक्षा का स्तर कमजोर है.

ऐसा क्यों हो रहा है जबकि भारत में स्कूलों की संख्या बढ़ी हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2003 से 2014 के बीच करीब दो लाख प्राइमरी स्कूल खुले हैं जो भारत में कुल प्राइमरी स्कूलों का करीब साढ़े 24 फीसदी हैं. इनमें से 95 फीसदी स्कूलों की अपनी इमारत भी है. लेकिन ये इमारतें किस हाल में हैं, वहां की दीवारों, कक्षों, दरवाजों, खिड़कियों, शौचालयों की क्या स्थिति है- ये भी देखा जाना चाहिए. स्कूलों का बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ है. बिजली, पानी, शौचालय, बाउंड्री दीवार, लाइब्रेरी, कम्प्यूटर जैसी व्यवस्थाएं कहीं सही हैं तो कहीं सोचनीय. स्कूल छोड़ने के इस तरह कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारण हम देख सकते हैं. जैसे टीचरों की संख्या का अभाव. उनमें से आधे प्रशिक्षित भी नहीं हैं.   टीचर कम हैं तो जाहिर है उसका असर छात्र शिक्षक अनुपात पर पड़ रहा है. नतीजा यही कि छह से 14 साल के सभी बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, लेकिन करीब साढ़े तीन करोड़ अब भी बाहर हैं. पढ़ाई लिखाई बीच में ही छोड़ देने की सबसे बड़ी वजहों में एक गरीबी भी है. बड़े होते बच्चे अपनी पारिवारिक विवशताओं और सामाजिक हालात की वजह से साधारण रोजगार की ओर मुड़ जाते हैं. दुकानों, ढाबों, गैराजों, छोटे होटलों, रेहड़ी जैसे छोटे व्यवसायों में इस उम्र के बच्चों को देखा जा सकता है. दरअसल बेहतर संरचना के अलावा ऐसी नीतियों की भी जरूरत है जिसमें सीखने की पूरी अवधि के विभिन्न चरणों में आने वाली बाधाओं को दूर करते रह सकें. एक ऐसी मानवीय और पारदर्शी और कर्तव्यनिष्ठ निगरानी व्यवस्था की जरूरत है जो अपने बच्चों को न सिर्फ स्कूल लाए बल्कि ये सुनिश्चित भी करे कि वे पूरी पढ़ाई करके निकलें.

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