स्मार्ट शहर की स्मार्ट बाइक और मेरी फजीहत – ओपी शर्मा

1:56 pm or August 25, 2018
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स्मार्ट शहर की स्मार्ट बाइक और मेरी फजीहत

  • ओपी शर्मा
मेरा भोपाल स्मार्ट सिटी बन रहा है। शुरुआत हो गई है। जर्मनी से 500 स्मार्ट सायकलें आयात कर ली गई है। एक साल से भी अधिक समय हो गया है इन्हें जनता को समर्पित किये हुए। इंडियन एक्सप्रेस अखबार में पढ़ा था कि 2 करोड़ 95 लाख रुपये में 500 सायकलें आयात की गई है।
बाइक चलाने का शौक है मुझे। मेरी बाइक (मोटरसाइकिल) 50 हजार की है। और आज मैंने 60 हजार की साइकिल चलाई। सुबह-सुबह शर्ट का एक बटन टूट गया। मेरा सीना पता नही क्यों, सायकल पर सवार होते ही फूलने लगा। गर्व से। हां भाई, इसी को तो 56 इंच का कहते है। आखिर स्मार्ट सिटी का एक स्मार्ट आदमी शहर के पॉश इलाके में 60 हजार की सायकल चलाये तो बटन तो टूटना ही था… सो टूट गया।
हालांकि इस शानदार और बटनतोड़ अनुभव के लिए मुझे बहुत समय और पैसा कुर्बान करना पड़ा। करना ही पड़ता है, जब हम औरों से अलग दिखना चाहते है।
पर्यावरण से मुझे बहुत प्यार है। कोई इसे नुकसान पंहुचाये तो बर्दाश्त नही होता। मैने भी सोचा कि जब साल भर से मेरे शहर में स्मार्ट बाइक (सायकल) उपलब्ध है तो मैं क्यों मोटरसाइकिल चलाऊं? 84 रुपये लीटर ऐतिहासिक मूल्य  का पेट्रोल फूंकना कोई समझदारी तो है नही। फिर प्रदूषण भी क्यों करूँ?
चार इमली क्षेत्र के नंदनकानन पार्क के सामने स्मार्ट सायकल स्टैंड पर आज सुबह पंहुच गया। सायकल  को उपयोग करने के कोई निर्देश, सूचना पटल या सहायता यहां उपलब्ध नही थी। सायकल पर लिखा था, Rent by App.मैने अपने फोन में सर्च करके एप्प का पता किया और उसे डाउनलोड कर लिया।
लेकिन इसे एक्टिवेट करने के लिए मुझे 500 रुपये चुकाने थे। जो सिर्फ क्रेडिट या डेबिट कार्ड से ही मान्य थे। न नकद, न पेटीएम, न नेट बैंकिंग या और कुछ। मैं तो ठहरा 56 इंच वाला बहादुर। टेक्नॉलॉजी के प्रयोग से डरता नही, बल्कि सबसे आगे रहता हूँ।  मैने क्रेडिट कार्ड के नंबर डालकर सायकल को एक्टिवेट कर लिया। लेकिन यह क्या? मेरे 56 इंच सीने की हवा तब निकल गई जब सायकल तो एक्टिवेट और हायर हो गई लेकिन उसका लॉक नही खुला।
काफी प्रयास के बाद मैंने सायकल के स्मार्ट पैनल का कैंसिल बटन दबाया और बिना उपयोग के ही सायकल रिटर्न (जमा) भी हो गई। 7-8 मिनिट की इस एक्सरसाइज में मैं सायकल के लॉक को नही खोल पाया। लेकिन मेरे 500 रुपये के बैलेंस में से कुल 11 रुपये 80 पैसे कम हो चुके थे। 10 रुपये आधे घंटे का न्यूनतम किराया और 18℅ जीएसटी।
पर मैं जो सोच लेता हूँ, करता हूँ। मैं इस असफलता और आर्थिक नुकसान से मानने वाला नही था। दूसरी सायकल पर फिर ट्राय मारा। इस सायकल के एक हैंडल में रबर नही थी और घंटी भी नही थी, लेकिन लॉक खुल गया। मैं अपनी सफलता पर फक्र कर रहा था। मेरा सीना फिर 56 का हो गया था। आखिर स्मार्ट सायकल पर सवार होकर घर आ गया। रौब झाड़ते हुए बीवी को बाहर से ही आवाज लगाई और कहा –“जरा बाहर आओ।” जब मैं उन्हें बाहर से आवाज लगाता हूँ तो वह समझ जाती है कि आज फिर इनका सीना चौड़ा हुआ होगा राष्ट्रभक्ति से, और फिर बटन तोड़कर आये होंगे।
मुझे सायकल पर देखकर उन्होंने अंदर आने को कहा। मैं भला विशेष काम करूं और पत्नी को न बताऊँ यह कैसे हो सकता है? मैं पसीने में तर-बतर हुआ सायकल को आंगन में लाया और पार्क कर दी। बेटे ने सायकल को पार्क करने के ऑप्शन का प्रयोग किया। पर यह क्या? सायकल के इलेक्ट्रॉनिक पैड पर मैसेज लिखा था। Bike Returned. सायकल लॉक हो गई।
“तारक मेहता का उल्टा चश्मा” सीरियल अब मेरे घर मे शूट होने लगा। पड़ौसी सायकल देखने के लिए एकत्रित हो गए। सायकल का किराया बढ़ता जा रहा था। जब लॉक नही खुला तो बीवी ने झिड़की लगाई। “सारे प्रयोग करने की आपको ही पड़ी है। एक साल हो गया। कोई चलाता है क्या इस सायकल को?” बस, पैसे बर्बाद करने में मजा आता है।” मैं अब शर्मिंदा था। इस बार 32 मिनिट के 23 रुपये 60 पैसे कट गए थे। सायकल मेरे गले की घंटी बन चुकी थी। अब इसे स्टैंड तक छोड़ने के लिए मुझे फिर हायर करना था।
इस घंटी को मुझे गले से छुड़ानी थी, सो मैने फिर इसे आंगन में खड़े-खड़े ही हायर किया। अपने बेटे को इसे सायकल स्टैंड पर जमा करने को कहा, लेकिन बुरे समय मे भला कौन मदद करता है। बेटा भी नही। मैं खुद इस स्मार्ट सायकल को स्मार्ट स्टैंड पर छोड़कर आया। पैदल लौटते हुए मैं पसीने में लथपथ था। अब मेरे सिर पर सवार स्मार्ट होने का भूत उतर चुका था।
मैंरे 500 रुपये के बैलेंस से 47 रुपये 20 पैसे कट चुके थे। और सायकल चलाने पर 18℅ की दर से मुझे जीएसटी चुकाना पड़ा था।
स्मार्ट शहर के पर्यावरण संरक्षण वाले इस प्रोजेक्ट पर सायकल खरीदने, ट्रेक बनाने और इसका संचालन करने में करोड़ों रुपयों का व्यय भले ही मुझे व्यर्थ प्रतीत हो रहा हो, किन्तु 60 हजार रुपये की स्मार्ट सायकल चलाने के इस अनुभव से मन मे विशेष होने का अहसाह मुझसे कोई नही छीन सकता। हाँ, बचे हुए पैसे को फिर से खाते में लेने का कोई ऑप्शन एप्प में मौजूद नही है। देखता हूँ कि अब बचे हुए पैसे मुझे मिलते है या नही। एक सवाल जरूर सरकार से करता हूँ कि जब इस सायकल का उपयोग करने में मेरे ही छक्के छूट गए तो कोई तकनीक से वास्ता नही रखने वाला इस झमेले में क्यों पड़े?
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