आहत भावनाओं की दुहाई: पंजाब सरकार का विवादास्पद कानून अब पिछले दरवाजे से ईशनिन्दा कानून का प्रवेश – सुभाष गाताडे

3:37 pm or August 29, 2018
punjab

आहत भावनाओं की दुहाई: पंजाब सरकार का विवादास्पद कानून

अब पिछले दरवाजे से ईशनिन्दा कानून का प्रवेश

– सुभाष गाताडे
माईलाना उम्र 44 वर्ष, यह नाम है इंडोनेशिया की नागरिक चीनी मूल की बौद्ध महिला का – जिसे पिछले दिनों मेदान की जिला अदालत ने 18 माह की सज़ा सुना दी। वजह बतायी गयी कि चूंकि अपने घर के पास की मस्जिद में सुनायी जा रही अज़ान की अत्यधिक आवाज़ पर उसने आपत्ति जतायी थी और इस तरह धर्मविशेष के प्रति अपनी नफरत का प्रदर्शन किया था।
इंडोनेशिया के विवादास्पद ईशनिन्दा कानून के तहत उसे सुनायी गयी सज़ा की न केवल मानवाधिकार संगठनों ने बल्कि इंडोनेशिया के सबसे बड़े इस्लामिक संगठनों की तरफ से घोर भर्त्सना की गयी है। लोगों का साफ कहना है कि किस तरह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का दमन करने के लिए इस कानून का इस्तेमाल हो रहा है। याद रहे माईलाना की प्रतिक्रिया, ने चीनी विरोधी दंगे की शक्ल धारण की थी /जुलाई 2016/ जिसमें कई बौद्ध मंदिरों का आग लगायी गयी थी। https://www.theguardian.com/world/2018/aug/23/woman-jailed-in-indonesia-for-saying-call-to-prayer-too-loud/
ईशनिन्दा के नाम पर बने कानून के जरिए किस तरह अल्पसंख्यकों को, असहमति रखनेवालों को या व्यक्तिगत दुश्मनी रखनेवालों को प्रताडित किया जा सकता है, इसकी यह महज छोर्टी मिसाल है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में ऐसा ही कानून किस तरह लोगों पर कहर बरपा कर रहा है, इसकी मिसालें आए दिन सामने आती रहती हैं। वहां अब ऐसा आलम है कि ईशनिन्दा कानून पर सवाल उठाना भी ईशनिन्दा में शुमार किया जाने लगा है, जिसने वहां के दो दमदार राजनेताओं – पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्राी शाहबाज भटटी को – जान से हाथ धोना पड़ा है। //www.huffingtonpost.com/raza-habib-raja/why-was-pakistani-politic_b_13947838.html)
पंजाब कैबिनेट ने पिछले दिनों जिस नए बिल पर अपनी मुहर लगायी है, उसने एक तरह से इस कानून की याद ताजा़ की है। धार्मिक ग्रंथों की ‘‘अवमानना’’ के लिए उम्र कैद की सज़ा का प्रावधान करने का उसका प्रस्ताव इसी की ताईद करता है। मुख्यमंत्राी अमरिन्दर सिंह ने भारत के दंड विधान में सेक्शन 295 एए को जोड़ने का प्रस्ताव रखा है जिसके तहत कहा गया है कि जो कोई ‘‘जनता की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के इरादे से श्री गुरू ग्रंथ साहिब, श्रीमद भगवदगीता, पवित्रा कुराण और पवित्रा बाइबिल की आलोचना करेगा, उसे नुकसान पहुंचाएगा या उनकी अवमानना करेगा’’ उसे उम्र कैद की सज़ा सुनायी जाए।’’
याद रहे कि पंजाब के लिए वर्ष 2015 इस मामले में अक्सर सूर्खियों में रहा जब वहां धर्मग्रंथों के ‘अपवित्रा’ करने की कई घटनाएं सामने आयीं, और लोग सड़कों पर आए। इस मामले को लेकर उत्तेजना इस कदर बढ़ी कि दो प्रदर्शनकारी भी मारे गए। अपने आप को जनता की भावनाओं  के साथ दिखाने के लिए पंजाब मंत्रिमंडल ने इस सम्बन्ध में एक बिल भी पारित किया /22 मार्च 2016/ जिसके तहत ग्रंथों के ‘अपवित्रा’ करने की सज़ा तीन साल से लेकर उम्र कैद कर दी गयी, जिस बिल को 22 मार्च 2016 को पारित किया गया था। अकाली दल- भाजपा की तत्कालीन सरकार द्वारा बनाए गए उस कानून का केन्द्र सरकार ने इस आधार पर लौटा दिया था कि उसमें सिर्फ गुरूग्रंथ साहिब का जिक्र था। अब राज्य में सत्तासीन कांग्रेस सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकार के नक्शेकदम पर चलते हुए उसमें बाकी धर्मो के ग्रंथों को शामिल किया है और एक तरह से आहत भावनाओं के लिए उम्र कैद के लिए रास्ता खोल दिया है।
ध्यान रहे भारत के दंड विधान की धारा 295 एक – जिसमें एक पूरा अध्याय ‘‘धर्म से सम्बधित उल्लंघनों’’ को लेकर है वह ‘‘धर्म’’ या ‘‘धार्मिकता’’ को परिभाषित नहीं करता। कहने का तात्पर्य कि पंजाब सरकार का यह प्रस्तावित कानून जो धार्मिक ‘- जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती – भावनाओं / बहुत धंुधला इलाका/ को आहत करने के नाम पर लोगों को जिन्दगी भर जेलों में डाल सकता है। आहत भावनाओं की यह दुहाई किस तरह मनोरंजन में मुब्तिला व्यक्ति को बुरी तरह प्रताडित करने का रास्ता खोलती है, इसकी मिसाल हम किकू शारदा के मसले में देख चुके हैं। याद रहे बलात्कार के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे रह रहे राम रहिम सिंह की नकल उतारने के बाद उसके अनुयायियों ने किकू के खिलाफ केस दर्ज किया था और प्रताडना का उसका सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक गिरफतारी में चल रहे किकू को बाबा ने ‘‘माफ’’ नहीं किया था। https://www.dailyo.in/variety/blasphemy-law-freedom-of-speech-amrinder-singh-punjab-government-ipc-crpc/story/1/26211.html
विडम्बना ही है कि ऐसा कानून किस तरह आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है, इस अनुभव को भी पंजाब की कांग्रेस सरकार ने ध्यान में नहीं रखा है, जिसके चलते दो साल पहले दो महिलाएं मार दी गयी हैं। इसे विचित्रा संयोग कहा जाना चाहिए कि दोनों ही मामलों में मारी गयी महिलाओं का नाम बलविन्दर कौर था।
अगर एक बलविन्दर कौर अम्रतसर के वेरोके गांव में अपने घर में ही मार दी गयी थी/रविवार, 9 सितम्बर 2016/तो दूसरी बलविन्दर कौर को एक साजिश रचकर आततायियों ने मार गिराया था।  मालूम हो कि वेरोके गांव की 55 वर्षीय बलविन्दर कौर जेल से जमानत पर रिहा होकर आयी थी। सिखों के धार्मिक ग्रंथ को अपवित्रा करने के नाम पर उसे बीते दस नवम्बर 2015 को जेल भेज दिया गया था। मामला यही था कि बलविन्दर चप्पल पहन कर वहां गुरूद्वारे के अन्दर पहुंच गयी थी और हंगामा इस कदर बढ़ा था जो उसकी गिरफतारी से ही शांत हो सका था। एक माह बाद उसे जमानत मिली थी, मगर ग्रंथ को ‘अपवित्रा’ करने को लेकर उत्तेजना इस कदर रही है कि दस माह से उसका परिवार सामाजिक बहिष्कार का भी शिकार बनाया गया था। पिछले दिनों उसके अपने पति को उसकी हत्या में गिरफतार किया गया था, जो उसने करायी घर की ‘बेइज्जती’ से क्षुब्ध था।
27 जुलाई 2016 को लुधियाना जिले में मारी गयी एक अन्य महिला – जिसका नाम भी बलविन्दर कौर /उम्र 47 साल/था – जो घवाडी गांव की रहनेवाली थी और वह भी गुरूगं्रथसाहिब की ‘बेअदबी’ के मामले में जमानत पर रिहा होकर आयी थी। लगभग दो दशकों से वह गुरूद्वारे में काम कर रही थी और उस पर यह आरोप लगा कि उसने गुरूग्रंथसाहिब के पन्ने फाड़ दिए थे, जबकि उसके परिवारवालों का कहना था कि गांव के वर्चस्वशाली लोगों ने उसे फंसाया था। पुलिस के मुताबिक उसे किसी ने फोन करके आलमगिर के गुरूद्वारा मांजी साहिब के सामने बुलाया था तथा यह आश्वासन दिया था कि वह उसे स्वर्णमंदिर ले जाएंगे ताकि उस पर लगा यह ‘दाग’ मिट जाए। और जब वह अपने बेटे के साथ ऑटो में बैठ कर वहां पहुंची तो वहां पहले से खड़े दो मोटरसाइकिल सवारों ने उसे गोलियों से भून डाला। इस मामले में पकड़े गए दो अभियुक्त किसी रैडिकल सिख संगठन से संबंधित बताए गए थे http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/punjab-desecration-murder-khalistan-supporter-prime-accused-2939611/
एक अग्रणी अख़बार /टाईम्स आफ इंडिया/ ने ठीक ही लिखा है कि ‘‘अगर बाकी राज्यों ने भी इसी किस्म की धार्मिक लोकरंजकता का सहारा लिया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत भी पाकिस्तान जैसा नज़र आने लगेगा। ऐसे कानून जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की तुलना में आहत भाावनाओं को वरीयता देते हैं उनका ऐसे लोगों के जरिए दुरूपयोग का रास्ता खुलता है, जो सभी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता को सीमित करना चाहते हैं। ऐसा रूख धर्मनिरपेक्ष जनतंत्रा के लिए प्रतिकूल है और उसे अन्दर से नष्ट कर सकता है।’ मिर्चपुर

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