वोट बैंक की राजनैतिक मजबूरी – अब्दुल रशीद

3:51 pm or August 29, 2018
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वोट बैंक की राजनैतिक मजबूरी

  • अब्दुल रशीद

इसे वोट बैंक की राजनैतिक मजबूरी समझें या भारतीय जनता पार्टी सरकार का दलित सरोकार, सरकार को दलित अत्याचार कानून को फिर से बहाल करना पड़ा। इस कानून के अनुसार दलितों को गालियां देने या उन को सताने पर पुलिस को शिकायत मिलने पर तुरंत जेल भेज कर मुकदमा चलाने का हक था।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 यानि SC-ST एक्ट को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है, और इसके बाद कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी कर दिए। जारी निर्देश में कहा गया सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च को दिए अपने आदेश में कहा कि इस अधिनियम के अंतर्गत आरोपियों की गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है और प्रथमदृष्टया जांच और संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बाद ही कठोर कार्रवाई की जा सकती है। यदि प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है तो अग्रिम जमानत देने पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं है। एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी। इसके पहले आरोपों की डीएसपी स्तर का अधिकारी जांच करेगा। यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरुपयोग करता है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी। अगर किसी आम आदमी पर इस एक्ट के तहत केस दर्ज होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी। उसकी गिरफ्तारी के लिए एसपी या एसएसपी से इजाजत लेनी होगी।

यह स्वाभाविक है, की इन इजाजतों को लेने में महीनों लगेगा,और आदेश देने से पहले सभी पहलू को जांच कर ही पुलिस अधीक्षक या डिपार्टमैंट हैड इजाजत देगा। यह एक ऐसी जटिल प्रक्रिया है,जिससे कानून का मूल उद्देश्य अप्रभावी सा हो जाएगा। कारण अधिकांशतः डिपार्टमेंट हेड क्योंकर अपने कर्मचारी को ऐसे कानून के पचड़े में उल्झाएगा जिसका समर्थन वह खुद नहीं करता,और पुलिस के कार्यप्रणाली से तो सभी वाकिफ़ हैं,के ग़रीब को न्याय देने के प्रति कितना झुकाव है। इसलिए दलित इस कानून के अप्रभावी होने के शंका से न केवल भयभीत हुए बल्कि एकजुट होकर आंदोलित हो उठे।

दलितों को भाजपा से जोड़ने के लिए सामाजिक समरसता अभियान के तहत संघ ने दलित बस्तियों में जाकर न केवल उसके साथ भोजन करना शुरू किया बल्कि भारत की पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों पर दलितों के साथ नदी में स्नान और दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाना शुरू किया। संघ ने अपनी इसी सोंच को अमलीजामा पहनाते हुए भगवा दलितों और पिछड़ों की कई फौजें बनाई। इन्हीं फौजों के बल पर 2014 और बाद के चुनाव में भाजपा को जीते दिलाने में कामयाब भी रही।

2014 में चुनाव जीतने के बाद जिस तरह ऐसी घटनाएं लगातार घटी जिसमें दलितों और अल्पसंख्यकों को पीट पीट कर ह्त्या किया गया,उनका उत्पीड़न किया गया,और इन सब के आरोपियों को भाजपा सरकार के मंत्रियों द्वारा सम्मानित कर महिमामंडित किया गया। लगातार ऐसी घटनाओं के बढ़ने से संघ के दलित अभियान अप्रभावी होता चला गया। दलितों के साथ साथ अल्पसंख्यकों को भी अहसास होने लगा है कि उनकों हवाहवाई सपना दिखा कर उनके अपनों को प्रताड़ित करने वालों का बचाव उनसे ही करवाया जा रहा है। अभी जो हो रहा है वह तो महज़ बानगी है,जैसे जैसे भाजपा और संघ मजबूत होंगे ये वही करंगे जो इनकी शुरूआती सोंच रही है।

इस बात का एहसास भाजपा के साथ पिछलग्गू बने दलित व पिछड़े दल को भी समझ में आने लगा और उनके नेता भी भाजपा की भक्ति राग की जगह अपनी राग़ में बोलना शुरू किए हैं। यह एकजुटता वोट की शक्ल में विरोधियों को बतौर सौगात न मिल जाए, भाजपा को संवैधानिक ताक़त का इस्तेमाल कर न केवल दलित ऐक्ट को फिर से बहाल करना पड़ा बल्कि पिछड़ा आयोग को भी संवैधानिक दर्जा देना पड़ा है। लेकिन इस ठीक करने की प्रक्रिया से वह सोंच जो समझाता,मानता है की ऊंची जातियों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा है जो दलितों को अछूत बने रहना देना चाहती है,बदलेगा,उस सोंच में कोई बदलाव अभी असपष्ट नहीं दिखाई पड़ता।

चार साल के कार्यकाल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बयानों के बावजूद लगातार ऐसी घटनाएं होती रही,जिसे देख कर आम जनता को भी यह साफ़ दिख रहा है कि भाजपा भले ही चुनाव को देखकर,चुनावी गणित साधने के लिए समझौते के मूड में दिख रही है,लेकिन मंशा क्या है अब यह बात किसी से छुपी नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा के परम्परागत वोटरों को भी यह एहसास होने लगा है कि भाजपा स्वर्ण एजेंडे को लागू कर ही नहीं सकती।

यह सत्य है की राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता है,लेकिन मौजूदा हालात में यह तय लगता है की  वोटों कि ध्रुवीकरण के लिए किए जा रहे खोखले वायदों और दिए जा रहे जहरीले बयानों के बजाय आगामी लोकसभा चुनाव में,युवाओं में बेरोजगारी, बढती मंहगाई, सवर्णों में बढ़ता असंतोष और दलित पिछड़ो की नाराज़गी जीत-हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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