नोटबंदी-अपरिपक्व निर्णय या संगठित लूट – अब्दुल रशीद

4:45 pm or September 4, 2018
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नोटबंदी-अपरिपक्व निर्णय या संगठित लूट

  • अब्दुल रशीद

नोटबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सख्त क़दम उठाना जरुरी हो गया है। आज मध्य रात्रि यानि 8 नवम्बर 2016 की रात्रि 12 बजे से वर्त्तमान में जारी 500 रुपए और 1000 रुपए के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होगी।

नोटबंदी के घोषणा के पांच दिन के बाद वे गोआ में एक एयरपोर्ट के शिलान्यास के मौके पर दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा की मैंने सिर्फ़ देश से 50 दिन मांगे हैं। 50 दिन,30 दिसंबर तक मुझे मौक़ा दीजिए। मेरे भाइयों बहनों, अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी ग़लती निकल जाए, कोई मेरा ग़लत इरादा निकल जाए। आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर..देश जो सज़ा देगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूं।”

नोटबंदी के एक साल नौ महीने के बाद जब भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट सामने आई है,जिस रिपोर्ट में साफ़ तौर से कहा गया है कि नोटबंदी के दौरान बंद हुए लगभग सभी पुराने नोट वापस आ चुके हैं 99.3 फीसदी से भी ज्यादा पुराने नोट रिजर्व बैंक के पास लौट आए हैं,ऐसे में यह सवाल उठ रहा है की आखिर नोटबंदी के समय हवाहावाई वायदा जनता से क्यों किया गया?

काला धन और नोटबंदी 

8 नवंबर, 2016 को 15,417.93 अरब रुपये की वैल्यू के 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट सर्कुलेशन में थे। इसके बाद इनमें से जितने नोट वापस आए हैं, उनकी कुल वैल्यू 15,310.73 अरब रुपये है। अब सवाल यह उठता है की जो क्या सिर्फ 0.7 फीसदी ही काला धन था? आपको याद होगा,प्रधानमंत्री ने जापान में दावा किया था कि उनके डर के मारे लोग नोटों को नदियों मे बहा रहे हैं, भट्टी में जला रहे हैं, लुगदी बना रहे हैं । इन सबको बहुत ही कम – कोई 2 प्रतिशत – मान लेते हैं । अब इनमे पड़ोसी देशों से छपकर आने वाले नकली नोटों को भी जोड़ कर,10 से 15 प्रतिशत- ही माने जितनी विपक्ष में रहते भाजपा सांसद लोकसभा राज्य सभा मे बताते रहे हैं तो कुल होते हैं 15 से 20 प्रतिशत। अब इस यक्ष प्रश्न का जवाब कौन देगा कि 15 – 20 प्रतिशत नोट कहां गए ? जब 15-20 फीसदी पैसा वापस नहींआया,दूसरी तरफ आरबीआई के रिपोर्ट के अनुसार 0.7फीसदी छोड़कर कर 99.3फीसदी वापस आ गया,तो कहीं ऐसा तो नहीं 15-20फीसदी काला धन सफेद हो गया?

नोटबंदी लगाए जाने के दो सप्ताह बाद तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में नोटबंदी का बचाव करते हुए कहा था, “सरकार ने ये क़दम उत्तर पूर्व और कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ आतंकवाद को बढ़ावा देने में इस्तेमाल हो रहे चार लाख से पांच लाख करोड़ रुपए तक को चलन से बाहर करने के लिए उठाया है।”

रोहतगी सरकार का पक्ष ही रख रहे थे लेकिन उन चार लाख से पांच लाख करोड़ रुपए तक के नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए।

15 अगस्त, 2017 को अपने भाषण में पीएम मोदी ने कहा था कि तीन लाख करोड़ रुपए जो कभी बैंकिंग सिस्टम में नहीं आता था, वह आया है।इस बात की सच्चाई का क्या आधार था?

नक्सल,आतंकवाद और नोटबंदी 

नोटबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के अंदर नक्सलियों और देश के बाहर से फंडिंग पाने वाली आतंकी हरकतों पर नोटबंदी से अंकुश लगने की बात कही थी।

गृह मंत्रालय की 2017 की सालाना रिपोर्ट मुताबिक जम्मू कश्मीर में 342 आतंकवादी हमले हुए, जो 2016 में हुए 322 हमले से ज्यादा थे। इतना ही नहीं, 2016 में जहां केवल 15 लोगों की मौत हुई थी, 2017 में 40 आम लोगों इन हमलों में मारे गए थे। कश्मीर में आतंकवादी हमले 2018 की शुरुआत से भी जारी हैं।

जाली नोट और नोटबंदी 

रिजर्व बैंक के मुताबिक 2017-18 के दौरान जाली नोटों को पकड़े जाने का सिलसिला जारी है। इस दौरान 500 के 9,892 नोट और 2000 के 17,929 नोट पकड़े गए हैं। यानी जाली नोटों का सिस्टम में आने का चलन बना हुआ है।

कैशलेस इकॉनमी और नोटबंदी 

रिजर्व बैंक के अनुसार 9 दिसंबर, 2016 को आम लोगों के पास 7.8 लाख करोड़ रुपए थे, जो जून, 2018 तक बढ़कर 18.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गए हैं।इसका मतलब नोटबंदी के बाद लोगों के पास कैश बढ़कर दोगुना हो गया है।

दावों को औंधे मुंह गिरने के बाद जिम्मेदारी लेने के बजाय बहाने और चुप्पी से दो बातें स्पष्ट होती है,पहली अपरिपक्वता,दूसरा विपक्ष की बात नोटबंदी एक संगठित लूट,चाहे जो हो लेकिन नोटबंदी का कहर तो जनता पर ही पड़ा, एटीएम दर एटीएम भटकती रही,दिहाड़ी नौकरी दम तोड़ती रही,लघु और कुटीर उद्योग की लौ बुझती रही,खुशियां कागजों पर सिसकती रहीं,और गरीब जनता की जीवन दीप सरकारी फरमान को मानते मानते बुझ गई और कैशलेस के ढोंग के नाम पर विदेशी कम्पनियां कमीशन रूपी मलाई खा गई।

दरअसल मौजूदा वक्त की राजनीति में नेताओं में नैतिक साहस ही नहीं दिखाई देता है,जो अपनी गलती स्वीकार सके। इसलिए पार्टियों के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर बैठ कर सवालों के जवाब के बदले सवाल या फिर आयें बायें,अब्बा डब्बा जैसे शब्दों का सहारा लिया जाता है। भले ही यह सर्वमान्य न हो लेकिन ऐसे ही शब्दों के माया जाल के सहारे चुनाव जीता भी जाता है और पानी में बत्तखों को तैरा कर ऑक्सीजन पैदा कर विकास भी किया जाता है।

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