तेल की आग से झुलसती जनता और पकती राजनीती – अब्दुल रशीद

3:12 pm or September 14, 2018
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तेल की आग से झुलसती जनता और पकती राजनीती

  • अब्दुल रशीद

पेट्रोल और डीजल की कीमतें नए रिकार्ड स्तर पर पहुंच कर झूम रही है और पक्ष (सरकार) इस झूमती रिकार्ड को देख कर झूम रही है। लेकिन जब विपक्ष मौजूदा पक्ष को उनके पुराने दुःख भरे नगमें सुनाती है,तो विचलित हो उठते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मिडिया का सशक्त माध्यम इलेक्ट्रॉनिक मिडिया(जिसकी जिम्मेदारी है जनता को सच बताना) के तथाकथित नामचीन योद्धा पक्ष को जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के बजाय उस विपक्ष पर हल्ला बोल रहें है जिसको मौजूदा समय में सही से विपक्ष का दर्जा भी हासिल नहीं है। पक्ष विपक्ष के दो पाटो के बीच पिसती जनता को यह समझ नहीं आ रहा के नसीब वाले और बिना नसीब वाले में कौन सच्चा है,कौन झूठा।

तेल की बढती और रुपए की गिरती कीमत,जिसका सीधा असर आम जनता के जीवन पर पड़ रहा है,जैसे गंभीर विषय को मौजूदा राजनीती हास्यास्पद बनाने में लगी है,लेकिन स्थिति दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। पक्ष की असंवेदनशीलता और विपक्ष की सत्ता पाने की राजनीती, ग़रीब जनता के आर्थिक चोट पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कने का काम कर रही है।

दरअसल यही वो भयावह कॉर्पोरेट समर्थित राजनीति है जिसके विषय में भूतपूर्व प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चिंता जताते हुए कहा था,सत्ता का खेल तो चलेगा,सरकारे आएंगी जाएंगी,पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए,इस देश का  लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। आज उनकी पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है, जिसका आत्मबल इतना मजबूत है,कि पेट्रोलियम मंत्रालय से पूछे जाने वाले सवाल का जवाब,कानून मंत्री देते हैं,रक्षा मंत्रालय से पूछे जाने वाले सवाल का जवाब वित्तमंत्री देते हैं,और प्रवक्ताओं से सवाल पूछने पर नेहरु से लेकर राहुल गांधी को देश की हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने की मनगढ़ंत कहानी गढ़ते और सुनाते हैं,या विशेष धर्म को खरीखोटी सुनाकर आम-अमरुद की बागवानी को कैकटस का बागीचा बनाने का चिल्ला चोट कर सवालों के ज़वाब देने से बचते हैं।

बहरहाल मौजूदा वक्त में तेल कि बढ़ती क़ीमत से आम जनता परेशान है,और इस परेशानी पर पक्ष का तर्क कुतर्क ही लगता है,विपक्ष वही कर रही है जो पक्ष, विपक्ष में रह कर किया करती थी।

यह सच है की,पेट्रो पदार्थ भारत सरकार के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।साल 2014-2015 में 99,184 करोड़ का राजस्व,2015-2016 में 1,79,591करोड़, 2016-2017 में 2,42,691 करोड़ और 2017-2018 में 2,29,019 करोड़ रुपया मौजूदा सरकार ने आम जनता से पेट्रो पदार्थ पर टेक्स के रूप में वसूला है।पिछले वित्तीय वर्ष में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 02 रुपया कम किया था जिसका प्रभाव 2017-2018 के राजस्व पर पड़ा अब राजस्व के घाटे की बात करके एक्साइज ड्यूटी नहीं घटाने का तर्क दिया जा रहा है, लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है की बीते चार साल में 9 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा कर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल कि घटे कीमत का फ़ायदा जनता को देने के बजाय राजस्व में जमा किया गया।

जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार केंद्र में आई उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल थी, तब दिल्ली में पेट्रोल की क़ीमत लगभग  71 रुपए और डीजल 56 रुपए प्रति लीटर था। उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2016 में कच्चा तेल 35 डॉलर प्रति बैरल तक के निम्न स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन जनता को महज़ 15 से 20% का फायदा दिया गया जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमत घट कर करीब एक तिहाई रह गया था।

कच्चे तेल का कच्चा चिठ्ठा यह की 2014 में कच्चे तेल क़ीमत 31.18रु था,और डीजल 53.35रु प्रति लीटर बिक रहा था, सितंबर 2018 में कच्चे तेल क़ीमत 39.00रु और डीजल 72.83रु बिक रहा है। ऐसा इसलिए है की पेट्रोल पर लगने वाला एक्साइज ड्यूटी जो  2014 में 9.48 रुपया था वो मोदी सरकार में 204 % बढ़कर अब 19.38रुपया हो गया है,और डीजल पर लगने वाला एक्साइज ड्यूटी जो 2014 में 3.56 रुपया था वो मोदी सरकार में 430% बढ़कर अब 15.33रुपया हो गया है।

एक लीटर पेट्रोल की कीमत जब आम जनता 77.17रुपया चुकाती है तो टेक्स के मूल कीमत के साथ 35.89रुपया टेक्स के रूप में देती है,यानी जनता जो पेट्रोल कि क़ीमत अदा करती है उसमें पेट्रोल के मूल क़ीमत के साथ 95% सरकारी टेक्स जुड़ा होता है।

नियत साफ़ हो तो तेल का क़ीमत घट सकता है,सरकार का यह कहना कि राज्य में जो विपक्ष की सरकार है वह क्यों नहीं वैट घटा रही,यह भी एक राजनितिक बयानबाजी है क्योंकि अधिकांश राज्यों में और केंद्र में भी पूर्ण बहुमत की सरकार भाजपा की है। 2014 में मंहगाई से मुक्ति के लिए जनता ने भाजपा के नारे “बहुत हुई मंहगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार” पर यकीन करके ही पूर्ण बहुमत दिया था न की मंहगाई की मार झेलने के लिए।

दरअसल,केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ही लुक्का-छुप्पी का खेल जनता से खेलते हुए ढीठ रवैया अपनाए हुए हैं। केन्द्र,राज्य सरकारों से टैक्स कम करने जैसा सार्वजनिक बयान तो देती है, लेकिन राज्यों से सीधे बात कर जनता के हित के लिए कोई ठोस क़दम उठाती नज़र नहीं आ रही।

यदि जुमले हो चुके पुराने नारों को भूल कर नया नारा “साफ़ नीयत सही विकास” पर यकीन कर भी ले तो यह बात समझ के परे है की केन्द्र सीधे-सीधे राज्यों से क्यों नहीं कह रही कि वो टैक्स कम करें, ठीक है, विपक्ष शासित राज्य इनकार करेगा लेकिन,ज्यादातर सरकारें या तो भाजपा की हैं या भाजपा के गठबंधन कि, वो कैसे इंकार करेगा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की बात भला कौन टाल सकता है? दूसरी तरफ़ विपक्ष वैट घटा कर मिसाल पेश करने के बजाय भारत बंद कर अपने लिए संजीवनी इकठ्ठा करके सत्ता पर काबिज़ होना चाहती है।यही असल राजनीति है, बयानबाज़ी करते रहिए,आम जनता के भावनाओं से खेलते रहिए यानी हर कीमत पर बस छवि बची रहे।क्योंकि साफ़ छवि के सहारे सत्ता क़ायम रहे या सत्ता मिले का खेल ही तो राजनीती है।

बयानों और सोशल मीडिया के जांबाज़ अफवाहबाज़ों के ज़रिए बहाने और झूठ गढ़ने के बजाय आम जनता के हित को प्रमुखता दे दें तो तेल क्या बहुत कुछ के दाम घट जाएंगे, लेकिन क्या कीजिएगा,हम आप अपने नेता को चाचा,मामा कहकर रिश्तेदार बना लेते हैं,या अवतार बनाकर आम से ख़ास बना देते हैं,परिणाम यह होता है की न तो हम आप अपने नेताओं से सवाल कर पाते हैं,और न ही आलोचना सुन सकते हैं। लोकतंत्र में चुना हुआ नुमाइंदा जनता का सेवक होता है,और सेवक के कार्यों की समीक्षा होना स्वाभाविक है।नेताओं को जवाबदेह बनाने के लिए उनके कार्यों की समीक्षा होनी ही चाहिए।

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