‘सरकारें ’’ देशहित में ‘‘जुमलों’’ से कब बाहर आयेगीं? – राजीव खण्डेलवाल

2:48 pm or September 20, 2018
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‘सरकारें ’’ देशहित में ‘‘जुमलों’’ से कब बाहर आयेगीं?

राजीव खण्डेलवाल
यद्यपि हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते हैं, और हैं भी, तथापि जनता लोकतांत्रिक तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यो के आधार पर देश चलाने की अपेक्षा लोकशाही से करती है। लेकिन पिछले कई दशकांे से हमारे देश में लोकतंत्र के नाम पर ‘‘जुमले बाजी’’ ही चल रही है। एक ‘जुमले’ मात्र से कई बार सरकार बनने या बिगड़ने लगती है।
वर्ष 1965 में ‘‘जय जवान जय किसान’’ के चुनावी नारे की बोट पर चढ़कर कांग्रेस ने चुनाव तो जीता, लेकिन आज तक न तो जवानों की वन रेंक वन पेंशन को अंतिम रूप से संतोषप्रद निदान हुआ (जबकि सेना के मामलो में असंतोष जरा सा भी नहीं रहना चाहिये) और न ही किसानो की जय-जय कार लगने के बावजूद उनकी फसल के लागत मूल्य का दुगना मूल्य मिला हैं। अर्थात यह भी अभी तक जुमला ही रह गया है।
निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं देशी रियासतों के राजाओं के प्रिविपर्स व विशेषाधिकार की समाप्ति के बाद इंदिरा गंाधी ने वर्ष 1971 में ‘‘गरीबी हटाओं’’ का नारा दिया था जिस नारेे के द्वारा उन्होने गैर कांग्रेस-वाद के नारे के विरूद्ध भारी भरकम जीत दर्ज की थी। लेकिन वह बाद में एक जुमला सिद्ध हो गया। ‘‘गरीब’’ की गरीबी कितने प्रतिशत कम हुई, यह तो भगवान ही जाने (क्योकि आम जनता ने आज तक ऐसा महसूस नहीं किया)। वास्तव में, यदि गरीबी कम हुई होती तो कांग्रेस को (60 साल की सत्ता के बाद भी) आज भाजपा पर देश की आर्थिक स्थिति को खराब कर गरीब विरोधी सरकार होने का आरोप नहीं लगाना पड़ता। अर्थात् आर्थिक स्थिति के कारण गरीबी बढ़ती गई ‘‘यह स्वयं कांग्रेस भी मान रही है। परन्तु तत्समय तो यह जुमला बहुत उछला कि’’ भले ही गरीबी कम न हो पाई हो अपितु गरीब जरूर खत्म होते जा रहे है; और यही आज  भी देश का सबसे बड़ा जुमला सिद्ध हो रहा है।
वर्ष 1977 को ही ले; जब आपातकाल के कारण ‘‘जे.पी’’ (जय प्रकाश नारायण) ने ‘‘इंदिरा हटाओं देश बचाओं’’ का नारा (जो शायद देवकांत बरूआ, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ‘‘इंदिरा ही भारत हैं, भारत ही इंदिरा है’’ के कथन के संबंध में दिया था) के साथ-साथ जनता पार्टी द्वारा मानवाधिकार, व स्वतंत्र मीडिया के साथ-साथ ‘‘लोकतंत्र बचाने’’ का नारा दिया गया था। इस जुमले पर घमंडी कांग्रेस सरकार बुरी तरह से घराशाही हो गई थी। लेकिन जनता पार्टी ने ‘‘शासक’’ हो जाने मात्र को ही लोकतंत्र बहाली मानकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। ढ़ाई वर्ष के अल्प काल में ही लोकतंत्र स्वच्छंदता व अराजकता में बदल गया और जनता पार्टी को आरएसएस की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अपनी सत्ता बीच में ही खोना पड़ी। इस तरह लोकतंत्र बचाओं का नारा भी अंततः एक जुमला ही सिद्ध होकर रह गया और वास्तविक लोकतंत्र अर्थात ‘‘जनता’’ का ‘‘जनता के लिए’’ एवं ‘‘जनता द्वारा’’ प्रतिक्षा रत आज भी जन नागरिक है।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 में ‘‘जब तक सूरज चंाद रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा’’ के नारे के साथ सहानुभूति लहर पर चढ़कर तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत (314सीट) प्राप्त करने के बावजूद उक्त बहुमत कांग्रेस ने मात्र 5 साल में खो ही दिया और इस प्रकार इंदिराजी का नाम चांद के अस्तित्व तक रहने की बात मात्र एक कल्पना ही रह गई।
इसके पश्चात् वर्ष 1989 में मंडल व कमंडल का जुमला आया। इस पर भी सरकार बनती बिगडती गई। मंडल का डंक आज तक भी भुक्त भोगी भोग/भुगत ने को मजबूर है और ‘‘कमंडल’’ आज भी भगवान श्रीराम जन्म स्थल (अपनी सुरक्षित जगह पर) मंदिर बनने का रास्ता ताक रहा है। ‘‘सौगंध राम की खाते है, मंदिर वही बनायेगे’’ ‘‘विपक्ष’’ से ‘‘सत्ताधारी दल’’ होकर, देश के 23 राज्यो  में शासन करने वाला के नारे को अब न्यायालय के निर्णय का इंतजार है। इस प्रकार राम मंदिर पर निर्माण का नारा भी आज तक लगातार मात्र जुमला ही बना हुआ है। ऐसा कब तक बना रहेगा यह भी भविष्य के गर्भ में है। धारा 370 हटाने का बहुत पुराना संकल्प भी आज भी लोग मात्र एक जुमला ही मानते है। महिलाओं को बराबर का अधिकार एवं विधायिका में 33 प्रतिशत का आरक्षण देने का प्रस्ताव भी कई वर्षो से संसद में अटका हुआ होकर जुमले का पहनाव ओढ़कर निरीह होकर बाँट जोट रहा है और वास्तविकता नहीं बन पाया है।
प्याज की महगाँई के आसूँ एक सरकार को बदल देते है तो सत्तारूढ़ होने वाले दल को कुछ ही समय में रूला भी देते है और ‘‘प्याज’’ भी एक जुमला ही बनकर रह जाता है। इस तरह समस्या जस की तस बनी रहती है। वर्ष 2010 में तृणमूल कांग्रेस द्वारा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान दिया गया नारा ‘माँ’ ‘माटी’ व ‘मानुष’ के तीनो तत्वों का आज कही अता-पता न होकर वह एक जुमला मात्र रह गया है। विदेशों से कालाधन लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख जमा होगंे सर्वाधिक इस आकर्षक जुमले को कौन भूल सकता है? क्योकि सरकार ने बाद में स्वयं ही इसे जुमला मान लिया। ‘‘गर्दन जमीन पर कट रही है व टेबिल पर बिरयानी खा रहे है’’ यह भी मात्र एक आरोप होकर जुमला ही सिद्ध हुआ। क्योकि आज तक सीमा पर आंतकी गतिविधियों व शहीदो की संख्या में कितनी तुलनात्मक कमी हुई है? यह आपके सामने ही हैं। रूपया गिर रहा है, देश की साख गिर रही है, यह कथन भी रूपये के 73 डॉलर तक पहुचने के कारण बुरी तरह से एक जुमला ही सिद्ध हो रहा है। आज की सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का वह बयान है जो पेट्रोल व डीजल के मूल्यो की वृद्धि पर  आया है कि ‘‘हम इसके लिये कुछ नहीं कर सकते’’ यह स्वीकारिता आज का सबसे बड़ा जुमला बना हुआ है। कारण स्वयं रविशंकर प्रसाद सहित एनडीए के अधिकांश सदस्योे ने कुछ वर्षो पूर्व ही तत्कालीन यूपीए सरकार को पेट्रोल व डीजल की मूल्य वृद्धि पर बुरी तरह से घेरा था। उस समय उन्होंने बैलगाड़ी व साईकल के प्रदर्शन द्वारा अपना सांकेतिक विरोध भी दर्ज कराया था। आज उस जुमले पर वर्तमान सरकार स्वयं ही असहाय हैं। ‘‘विदेशी घरती पर मोदी का डंका’’ भी एक जुमला इसलिए हो गया है क्योकि सीमा से लगे समस्त पडोसी देश (भूटान को छोड़कर) में मोदी का डंका नहीं बज पा रहा हैं (इस संबंध में अटलजी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘हम लोग अपने दोस्त तो बदल सकते हैं पर पडोसी नहीं बदले सकते’’) पड़ोसियों सेे संबंध वर्तमान में किस स्तर तक गिर गये है, यह सर्वविदित ही है। वर्तमान के ‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ एवं ‘‘अच्छे दिन-आने वाले है’’ बहुप्रचलित जुमलांे के परिणाम आपके सामने है। क्या वास्तविकता को देखते हुये हम इन्हे जुमला कहने से परहेज कर सकते है?
इस प्रकार यह स्पष्ट है इस देश की राजनीति चाहे पक्ष द्वारा हो अथवा विपक्ष के द्वारा हो, जुमलो पर ही आधारित व केन्द्रित होती है; वास्तविकता पर नहीं। जनता असहाय मूक दर्शक मात्र बन कर रह गई है। समस्त नेतागण देश को सोने की चिड़िया कहते थकते नहीं अघाते। यदि वास्तव में देश को सोने की चिड़िया बनाना है तो सरकारों को जुमलों से हटकर एक कदम आगे बढ़कर वास्तविकता व हकीकत में उतरने की आवश्यकता है। तभी हमारा यह देश विकास की ओर तेजी से आगे बढ़ पायेगा। अन्यथा विश्व के अन्य देशों की तुलना में हम हमेशा पिछड़ते ही जायेगे  व पिछड़ते-पिछड़ते एक समय अंतिम निचले स्तर पर खड़े हो जायेगे। क्योकि विश्व तो ‘‘वास्तविकता’’ का अनुशरण करते हुये तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है, जहाँ शायद इस तरह के जुमलों का कोई स्थान नहीं है।
कभी-कभी सोचकर हास्यस्पद लगता है कि राजनीतिक जुमलेबाजी से ग्रस्त नेतागण घरेलू जीवन में कैसा बर्ताव करते होंगे? घर में मनपसंद सब्जी ना बनने पर; देखिये में इस प्रकार की सब्जी की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस प्रकार की सब्जी कोई जगह नहीं हैं। बच्चों द्वारा किसी चीज के लिए जिद करने पर देखिये ये आपके निजी विचार है। पार्टी आपकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं। पत्नी के साथ घरेलू झगड़े को लेकर रिश्तेदारों के बीच देखिये मेरे शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। मुझे बदनाम करने के लिए ये विपक्ष की एक चाल है और अंत में पत्नी के द्वारा सुलह न करने पर देखिये मेरे शब्दों का गलत मतलब निकाला गया है। मेरे कहने का मतलब ये नहीं था।
अंत में वर्ष 1989 के चुनाव में वी.पी. सिंह को लेकर बना एक जुमला ‘‘राजा नहीं फकीर हैं, देश की तकदीर है’’ जो शायद देश की यर्थाथ स्थिति को ही व्यक्त करता है, इसलिये वह (एक मात्र) जुमला नहीं रह गया है। लेकिन इसके विपरीत भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश के नागरिको से स्वच्छता का आव्हान निश्चित रूप से जुमला सिद्ध न होकर एक अभियान बनते जा रहा है। इसी प्रकार से समस्त जुमलों को अभियान बनाने की आवश्यकता है। लेख खत्म करते-करते एक बात ध्यान में आयी केजरीवाल की अमूतपूर्ण नायाब घोषणा ‘‘आपकी सरकार आपके द्वार‘‘ के तर्ज पर जो 70 से अधिक सेवाओं को घर पहुंच सेवा के रूप में मूर्तरूप देने का जो ऐतहासिक संकल्प लिया है, उम्मीद है वह जुमला न होकर वास्तविकता का असली जामा पहनेगा, ताकि दूसरे नेताओं के लिये भी यह प्रेरणास्त्रोत होकर सही व सार्थक दिशा को वे अपना सके।

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