हिन्दी भाषियों के लिए बन्द होते आईएएस के दरवाजे

5:50 pm or June 23, 2014
2306201411

सुनील तिवारी-

बीते गुरूवार को संघ लोक सेवा आयोग ने भारतीय प्रशासनिक सेवा 2013 के परिणाम घोषित कर दिये। इस बार राजस्थान के गौरव अग्रवाल ने देश भर में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लगातार 3 वर्ष से टाप कर रही लडकियों के सिलसिले पर विराम लगाया। हांलाकि लडकियां टाप 10 की सूची में 4 सीटों पर और टाप 25 की सूची में 10 सीटों पर अपना कब्जा जमाए हुए हैं। यदि हिन्दी भाषा के अभ्यर्थियों की बात की जाए तो उन्हें इस बार भी निराशा ही हाथ लगी है। टाप 25 की सूची में हिन्दी के एक भी छात्र का नाम न होना और टाप 100 की सूची में एक उंगली पर गिनने लायक छात्रों की संख्या का होना हिन्दी भाषी छात्रों के दर्द को बयां कर रहा है। पिछले 3-4 वर्षों के परिणामों पर नजर डालें तो पता चलता है कि देश की सबसे बडी परीक्षा में हिन्दी पृष्ठभूमि के छात्र साल-दर-साल पिछडते जा रहे है। उल्लेखनीय है कि 2011 में आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा के प्रारूप में व्यापक बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषयों के चुनाव की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया। नई परीक्षा योजना के तहत पहले से चले आ रहे ऐच्छिक विषय वाले प्रश्नपत्र के स्थान पर 200 अंकों का एक नया प्रश्नपत्र सीसैट शामिल किया, जिसमें से 30 अंक अंग्रेजी समझने की कुशलता के हैं। अंग्रेज़ी की अनिवार्यता वाला यह प्रश्न पत्र महज़ क्वॉलिफाइंग नहीं है, बल्कि इसके अंक मेरिट में जोड़े जाते हैं।, जहां एक-एक अंक निर्णायक सिध्द होता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस योजना के ज़रिए न सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपा जा रहा है बल्कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे अनंत काल के लिए बंद किए जा रहे हैं। यह हिन्दी माध्यम के उन लाखों अभ्यर्थियों के लिए सिविल सेवा के दरवाज़े पूरी तरह से बंद करने की भी साज़िश है जो यदि इस परीक्षा में नहीं चयनित हो सकते तो सिर्फ़ एक कमज़ोरी या फिर ये कहें कि सिर्फ़ एक अपराध की वजह से और वो ये कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती। दुनिया के किसी भी स्वतंत्र देश की प्रशासनिक सेवा परीक्षा में विदेशी भाषा ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है, लेकिन समझ में नहीं आता कि हमारे देश में बिना अंग्रेज़ी ज्ञान के किसी को जानकार ही नहीं समझा जाता। सीसैट के पेपर में पूछे जाने वाले गद्यांश आधारित प्रश्नों की संख्या लगभग 40 होती है। इनमें से 8 सवाल अंग्रेजी कंप्रिहेंशन और लगभग 32 सवाल हिन्दी में कॉम्प्रिहेंशन से आते हैं। हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों को अगर अंग्रेजी के प्रश्नों में दिक्कत हो, तो समझ में आता है, लेकिन अगर उन्हें हिंदी कॉम्प्रिहेंशन के प्रश्नों में परेशानी हो, तो इसे आप क्या कहेंगे?लेकिन यह सच है। दरअसल, इन सवालों में जो हिंदी गद्यांश दिए जाते हैं, वे अनुवादित होते हैं। यह सरकारी अनुवाद इतना जटिल होता है कि हिंदी के दिग्गजों के भी छक्के छूट जाएं। हिंदी के इन दुरूह शब्दों को अंग्रेजी का सहारा लिए बिना नहीं समझा जा सकता है। यही कारण है कि 2011 से सिविल सेवा परीक्षा (आईएएस) की पहली सीढ़ी यानी प्रारंभिक परीक्षा में हिंदी माध्यम से उत्तीर्ण होने वाले परीक्षार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की 62 वीं वार्शिक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है, कि 2009 की आईएएस प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिंदी माध्यम के थे। इसी तरह 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,859 में से 4,194 हिंदी के थे। उल्लेखनीय है कि 2011 में सीसैट लागू किए जाने के बाद हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वालों की मुश्किलें बढ़ने लगीं। मसलन, 2011 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,230 परीक्षार्थियों में से अंग्रेजी के 9,316 परीक्षार्थी थे और उसके मुकाबले हिंदी के सिर्फ 1,700 ही रह गए। हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को इस परीक्षा में चयनित होने से रोकने के लिए सीसैट ही बैरियर नहीं है। अपितु मौजूदा प्रारूप में प्रारंभिक परीक्षा के बाद होने वाली मुख्य परीक्षा में अंग्रेज़ी का एक अनिवार्य प्रश्न पत्र होता है जिसे हर अभ्यर्थी को क्वालीफाई करना होता है। अन्यथा दूसरे विषय का मूल्यांकन नहीं होता। दूसरे इस बैरियर को पार करने के बाद मुख्य परीक्षा का दूसरा हिस्सा साक्षात्कार का आता है और इस चरण में हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को किस तरह से दोयम दर्जे का समझा जाता है, वह किसी से छिपा नहीं है। न सिर्फ़ जानबूझकर साक्षात्कार में बेहद कम अंक दिए जाते हैं ताकि अभ्यर्थी का चयन ही न हो सके बल्कि कई बार साक्षात्कार के दौरान ही यह अहसास भी करा दिया जाता है कि वे इस सेवा में आने के योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे हिन्दी माध्यम से हैं। 1977 में डॉ. दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ था, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के विचारों को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मति से यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाशषओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने इन सिफारिशों को क्रियान्वित किया और भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माधयम बनाने की छूट दी गई। इस परिवर्तन का लाभ उन उम्मीदवारों को मिला जो महानगरों से बाहर रहते थे और अंग्रेजी के महंगे विद्यालयों में नहीं पढ़ सकते थे। उनके पास प्रतिभा, गुण, योग्यता थी किंतु अंग्रेजी माध्यम ने उन्हें बाहर कर रखा था। इन सिफारिशों को लागू हुए तीन दशक हो चुके हैं। इस अवधि में यह कभी नहीं सुनाई पड़ा कि हिन्दी भाषा के माध्यम से जो प्रशासक आ रहे हैं, वे किसी भी तरह से अंग्रेजी माध्यम वालों से कमतर साबित हुए। प्रारम्भिक परीक्षा में बदलाव से पहले चुने जाने वाले अधिकांश परीक्षार्थी ग्रामीण एवं निर्धन पृष्ठभूमि के होते थे। वे अपनी पृष्ठभूमि की वजह से मेडिकल और इंजिनियरिंग के क्षेत्र में जा नहीं सकते थे, क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों में जाने के लिए धन और अंग्रेजी दोनों की आवश्यकता होती है। इस लिए उनके लिए आईएएस ही एकमात्र विकल्प होता था। जिसमें वे अपनी कडी मेहनत और प्रतिभा के दम पर अपना मुकाम हासिल का लेते थे। लेकिन अब उनका यह इकलौता विकल्प भी लगभग बन्द हो चुका है। अगर इस ओर जल्द से जल्द ध्यान नहीं दिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी माध्यम और गरीब तबके विद्यार्थी आईएएस बनने का सपना ही छोड देंगे।

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