समन्वय से एकजुट हो रही काँग्रेस… – योगेन्द्र सिंह परिहार

1:04 pm or September 25, 2018
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समन्वय से एकजुट हो रही काँग्रेस…

योगेन्द्र सिंह परिहार
मध्यप्रदेश में साल 2018 के नवम्बर माह के अंत मे विधानसभा चुनाव होना है। पिछले 15 वर्ष से लगातार भाजपा प्रदेश में शासन कर रही है। लोग कहते 2003 में चुनाव हारने के बाद 2008 में कांग्रेस सरकार आने की प्रबल संभावना थी लेकिन जिस लीडर की दरकार थी वो 10 वर्ष के लिए राजनीतिक सन्यास में थे। और आज भी यही बात चलती है कि मध्यप्रदेश में काँग्रेस की सरकार तब ही बनेगी जब ऐसा नेता सक्रीय हो जाए जो पूरे प्रदेश को भली-भांति जानता हो और हर जिले के राजनीतिक समीकरण को समझता हो। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्य सभा सांसद दिग्विजय सिंह की। प्रतिज्ञा का पालन समझिए या उन्हें ज़िद का पक्का मानिए, उन्होंने कहा 10 साल किसी भी ऐसे राजनीतिक पद पर नही रहेंगे जिससे लाभ होता हो और उन्होंने पद नही लिया तो नही लिया।
आज के परिप्रेक्ष्य में भी दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति की धुरी बने हुए हैं। कारण, उनमें अपार क्षमताएं हैं। सत्ता पक्ष भी उन्हें ही टारगेट कर रहा है क्योंकि विरोधी दल के नेताओं को मालूम है कि दिग्विजय सिंह ही एकमात्र ऐसे कांग्रेसी नेता हैं जो मध्यप्रदेश की ज़मीन को समझते हैं। वे पिछले चुनाव में ही चाहते थे कि उन्हें समन्वय की जिम्मेदारी दी जाए लेकिन तब बात नही बन पाई। अब उन्होंने ज़िद करके काँग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं में समन्वय स्थापित करने का बीड़ा उठाया है। काँग्रेस ने उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाया है।
आप यदि दिग्विजय सिंह की राजनीतिक किताब के पन्नों को पलटेंगे तो आप आसानी से समझ जाएंगे कि उन्होंने समन्वय शब्द को आत्मसात करके ही राजनीति में बुलंदियों को छुआ है। एक ज़माने में उनके धुर विरोधी रहे रामेश्वर नीखरा व सत्यव्रत चतुर्वेदी उनकी समन्वय समिति के सदस्य हैं और बेहतर ताल-मेल के साथ अपने दायित्वों को बखूबी निभा रहे हैं। उनके समन्वय बनाने की इसी ताकत से आज एकजुट हो रही है काँग्रेस। यही खूबी है दिग्विजय सिंह की कि उनमें ईगो नही है, वे सबको साध लेते हैं। हाँ वे ज़िद्दी ज़रूर हैं परंतु सबके हितों का ख्याल भी रखते हैं। उन्हें अनुशासन बहुत पसंद है। संगठन के प्रति अपने दायित्वों को वे भली भांति समझते हैं। मैंने उनपर एक आर्टिकल लिखा था जिसमें मैंने कहा था कि दिग्विजय सिंह चलती फिरती पाठशाला हैं और ये बात अक्षरशः सत्य है। मैंने अक्सर उनकी बातों को सुना है वे संगठन को सर्वोपरि मानते हैं। अरुण यादव जी पीसीसी चीफ थे तब वे कहते थे मध्यप्रदेश में मेरे नेता अरुण यादव हैं। आज वो कहते हैं कमलनाथ जी पीसीसी चीफ हैं और हम सबके नेता हैं। ये बात हर कार्यकर्ता को सीखना चाहिए।
मध्यप्रदेश के सभी जिलों में किसी न किसी को नाम से पुकारने वाले दिग्विजय सिंह करीब 39 जिलों में समन्वय समिति के बैनर तले कार्यकर्ताओं-नेताओं को एकता का पाठ पढ़ा चुके हैं। वे मंच से ये कहने में भी गुरेज नही करते कि यदि कोई कार्यकर्ता बहुत नाराज है तो मुझे उसके घर का पता बताओ मैं उससे व्यक्ति गत रूप से माँफी मांग लूंगा। “क्षमा वीरस्य भूषणम” वे वीर भी हैं और गंभीर भी। वे कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि बैनर-पोस्टरों से बाहर निकलकर ज़मीन पर मेहनत करो और जो ज़मीन पर मेहनत करेगा अब वही राजनीति में सफल होगा।
नगरपालिका अध्यक्ष, विधायक, लोकसभा सांसद, मंत्री, प्रदेश कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष, 10 वर्ष मुख्यमंत्री और अब राज्यसभा सांसद जैसे पदों पर रहने वाले दिग्विजय सिंह आज बड़े ही संतोष के भाव से कहते हैं कि अब मेरे मन मे मुख्यमंत्री बनने का कोई भी ख्बाव नही है मुझे पार्टी ने बहुत दिया है मध्यप्रदेश में काँग्रेस की सरकार बने इसके लिए मैं एक कार्यकर्ता के रूप में हर संभव प्रयास करूंगा। हैं न सीखने वाली बात। हर क्षेत्र में सभी के जीवन में इस तरह की कर्तव्यबोधता और कर्मण्यता आ जाए तो जीवन का सफल होना निश्चित है।
सूझबूझ और तालमेल से समन्वय के माध्यम से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को एक-एक कर जुटाते हुए एकता के सूत्र में बांध रहे हैं दिग्विजय सिंह। वे विश्वास से लबालब भरे हैं और ताल ठोक कर कह रहे हैं कि मध्यप्रदेश को कुपोषण, भ्रष्टाचार और कुशासन से मुक्ति दिलाएंगे। जन-जन की आकांक्षाओं के अनुरूप प्रदेश में पुनः गांधी-नेहरू की कांग्रेस की सरकार बनाएंगे।
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