हे किसान, तू बादशाह है। – अब्दुल रशीद

2:54 pm or October 4, 2018
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हे किसानतू बादशाह है। 

  • अब्दुल रशीद

कर्ज व बिजली बिल की माफी,बकाए गन्ने का भुगतान और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करवाने सहित अन्य मांगों को लेकर भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले किसान क्रांति पदयात्रा 23 सितंबर को हरिद्वार से किसानों ने शुरू की, जिसकी ख़बर उत्तर प्रदेश  सरकार और केंद्र सरकार को थी। इस यात्रा में मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर परदेश उत्तराखंड,हरियाणा और पंजाब के किसान शामिल थे लेकिन किसी भी सरकार ने किसान के इस यात्रा को गंभीरता से नहीं लिया। सरकार कि नींद तब खुली जब दो अक्टूबर गांधी जयंती के दिन किसान क्रांति पदयात्रा दिल्ली-उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर पहुंच गया, तब इस यात्रा को दिल्ली प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस ने किसानों पर रबर की गोली,अंशु गैस और डंडे बरसाए। सरकार चाहती तो अहिंसा दिवस पर किसानों पर हुई ऐसी हिंसा टाल सकती थी।

बहरहाल,इस घटना के बाद केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री राजनाथ सिंह ने किसान नेताओं से चर्चा कर सहमती बनाने में कामयाब रहें साथ ही किसान क्रांति पदयात्रा के जत्थे को किसान घाट तक जाने की अनुमति दे दी। अहम सवाल यह है कि ऐसा क़दम पहले क्यों नहीं उठाया गया।

पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह के स्मारक किसान घाट पहुंचकर किसानों ने अपना आंदोलन वापस लेने की घोषणा करते हुए टीस लिए वापस घर लौटने लगे। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा, ’23 सितंबर को शुरू हुई ‘किसान क्रांति पदयात्रा’ किसान घाट पहुंचकर खत्म हो गई है। चूंकि दिल्ली पुलिस ने हमें राजधानी में घुसने की इजाजत नहीं दी थी इसलिए हमने प्रदर्शन किया था। हमारा मकसद यात्रा को पूर्ण करने का था जो अब पूरा हुआ। अब हम अपने गांव जाएंगे।’

आंदोलन समाप्त करने पर किसान बहुत खुश नहीं दिखे,क्योंकि उनकी 11 मांगो में से 04 मांगे नहीं मानी गई जो मुख्य मांग थी। अपनी मांग मनवाने में भले ही किसान सफ़ल नहीं हुए लेकिन संदेश देने में सफ़ल जरुर हुए,ये वही किसान है जो 2014 में मोदी की जयजयकार बड़ी उम्मीद से कर रहे थे आंदोलन समाप्ति के बाद घर लौटते हुए मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। चुनाव की दहलीज़ पर खड़े राजनीती में इसे बदलाव की बयार कहते हैं।

हे किसानतू बादशाह है। 

अपनी मृत्यु से ठीक एक दिन पहले यानी 29 जनवरी, 1948 की प्रार्थना सभा में गांधी का कहना था – ‘मेरी चले तो हमारा गवर्नर-जनरल किसान होगा, हमारा बड़ा वजीर किसान होगा, सब कुछ किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है। मुझे बचपन से एक कविता सिखाई गई – “हे किसान, तू बादशाह है.” किसान ज़मीन से पैदा न करे तो हम क्या खाएंगे? हिंदुस्तान का सचमुच राजा तो वही है। लेकिन आज हम उसे ग़ुलाम बनाकर बैठे हैं. आज किसान क्या करे? एमए बने? बीए बने? ऐसा किया तो किसान मिट जाएगा। पीछे वह कुदाली नहीं चलाएगा. किसान प्रधान (प्रधानमंत्री) बने, तो हिंदुस्तान की शक्ल बदल जाएगी। आज जो सड़ा पड़ा है, वह नहीं रहेगा।’

ऐसा नहीं है कि अपने जीवन के अंतिम वर्षों में ही गांधी किसानों के बारे में ऐसा विचार रखने लगे थे। बल्कि आज किसानों में जितना असंतोष है उसकी परिणति क्या हो सकती है, इसकी चेतावनी बहुत पहले गांधी ने दे दी थी। हालांकि यह बात उन्होंने जमींदारी के दौर में लिखी थी, लेकिन किसानों की स्थिति आज भी उससे बहुत अलग नहीं है। पांच दिसंबर, 1929 को ‘यंग इंडिया’ में वे लिखते हैं – ‘…असल बात यह है कि (किसानों के लिए) कितना भी किया जाए, वह किसानों को उनका वाजिब हक देर से देने के सिवाय और कुछ नहीं है। यह वर्णाश्रम-धर्म की भयंकर विकृति का परिणाम है कि तथाकथित क्षत्रिय अपने को श्रेष्ठ मानता है और गरीब किसान परंपरागत निकृष्टता का दर्जा चुपचाप यह मानकर स्वीकार कर लेता है कि उसके भाग्य में यही लिखा है। यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण तरीके से प्रगति करनी है, तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से यह स्वीकार कर लेना होगा कि किसान की भी वैसी ही आत्मा है जैसी उनकी है और अपनी दौलत के कारण वे किसानों से श्रेष्ठ नहीं हैं। जैसा जापान के उमरावों ने किया है, उसी तरह यहां के धनिकवर्ग को भी अपने आप को किसानों का संरक्षक मानना चाहिए और उनके पास जो धन है उसे यह समझकर रखना चाहिए कि उसका उपयोग उन्हें संरक्षित किसानों की भलाई के लिए करना है। उस हालत में वे अपने परिश्रम के शुल्क के रूप में वाजिब से ज्यादा नहीं लेंगे।’

किसानों के लिए जो चिंता गांधी ने जताई थी आज़ादी के सात दशक बाद भी उसका निदान न होना यही दर्शाता है की हमारे राजनेता जो गांधी के बताए रास्तों के अनुसरण करने के तमाम दावें करते हैं उनके कितने खोखले।

दुनियां को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले गांधी की 150वीं जयंती अहिंसा दिवस पर,अपने हक़ की बात सरकार को सुनाने के लिए हरिद्वार से किसान क्रांति पदयात्रा करके दिल्ली किसान घाट पहुंचना चाहते थे लेकिन उनका स्वागत रबर की गोली,अंशु गैस और पुलिस के डंडे से हुआ। अन्नदाता अन्न के आभाव में और धन के दबाव में आत्महत्या न करे इस पर राष्ट्रीय चिंतन मनन आवश्यक है।

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