चुनाव आयोग की प्रासंगिकता – शैलेन्द्र चौहान

7:01 pm or October 9, 2018
671062-election-commission-hq

चुनाव आयोग की प्रासंगिकता

– शैलेन्द्र चौहान
इधर कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की कार्यशैली में एक झोल आया है. टी एन शेषन के कार्य मुक्त होने के बाद से ही राजनीतिक दलों की लगातार यह कोशिश रही कि चुनाव आयोग को नखदंत विहीन बना दिया जाए ताकि अवैधानिक तरीके से वे चुनाव  लड़ सकें. वे कामयाब हुए. अब लगातार चुनाव आयोग सुर्खियों में रहता है. हर चुनाव में उसकी भूमिका पर सवाल उठाए जाते हैं. चुनाव जैसी संवैधानिक संस्था पर किसी भी रूप में सवाल उठे तो अच्छा नहीं माना जा सकता. यह ज़रूरी है कि चुनाव आयोग अपनी साख और प्रासंगिकता बचाने के लिए सख्त से सख्त क़दम उठाए, न कि स़िर्फ नोटिस जारी करने और एफआईआर दर्ज कराने जैसे कामों तक ही स्वयं को सीमित रखे. क्या चुनाव आयोग महज एक नख-दंत विहीन संस्था बनकर रह गया है? मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के नाम पर चुनाव आयोग ने अब तक जितने भी नोटिस जारी किए, जितनी एफआईआर दर्ज कीं, उनमें से कितने मामलों में अंतिम कार्रवाई हुई? जिन नेताओं ने भड़काऊ या ऩफरत फैलाने वाले भाषण दिए, उनमें से कितनों के खिला़फ अब तक कार्रवाई हुई? कितने राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द हुई? ये ऐसे बिंदु हैं, जो चुनाव आयोग की प्रासंगिकता, सिवाय चुनाव कराने की रस्म निभाने के, पर सवाल खड़े करते हैं.
विश्व में चुनावी भ्रष्टाचार के सबसे अधिक मामले भारत में हैं. ऐसे मामलों में सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, कई तरह की चुनावी बेईमानी भी शामिल व हैं. पर अच्छी बात ये है कि इस सबके बावजूद भारत में वोटिंग लगातार बढ़ रही है. चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं. कोई पैसे बांट कर लुभाता है, कोई शराब बांट कर लुभाता है, तो कोई उपहार बांट कर. करोड़ों रुपये पकड़े जाते हैं. हजारों बोतल शराब पकड़ी जाती है. जाहिर है, जिन पैसों से यह सब होता है, वह पैसा सही तो नहीं ही होगा. जो पैसा सही नहीं है, वह कालाधन की श्रेणी में अपने आप आ जाता है. ऐसे में चुनावों में कालाधन के बारे में बात करने से पहले हमें कुछ अहम बातों को समझ लेनी चाहिए कि आखिर इस काले धन के पीछे का सच क्या है. कालाधन और भ्रष्टाचार की जड़ कहां है.  दरअसल, सरकार का मतलब होता है राजनीतिक पार्टी, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक पार्टियां ही सरकार बनाती हैं. केंद्र में एनडीए की सरकार है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी मुख्य घटक दल है. देश के सभी राज्यों में किसी न किसी पार्टी की ही सरकार है.  यानी यह स्पष्ट है कि राजनीतिक पार्टियां ही सरकारें बनाती हैं. इस ऐतबार से जो फैसले सरकारें लेती हैं, एक हिसाब से वे फैसले राजनीतिक पार्टियां ही लेती हैं. ऐसे में यदि किसी सरकार ने कोई फैसला लिया या यूं कह लें कि राजनीतिक पार्टी ने कोई फैसला लिया कि देश में यह होना चाहिए, तो हमें यह समझना होगा कि ये फैसले देश के हित में लिये जाते हैं या उस कंपनी के हित में लिये जाते हैं, जिसे उन फैसलों के तहत प्रोजेक्ट पर काम मिलनेवाला होता है. यदि उस कंपनी के हित में फैसले लिये जाते हैं, तो क्या ये अच्छे फैसले हैं, या इसलिए लिये जाते हैं कि इससे कंपनी को फायदा होगा और फिर कंपनी से पार्टी को फायदा होगा. इस पूरी प्रक्रिया को कहते हैं- कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट यानी एक ऐसी स्थिति, जिसमें किसी सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रुचि से प्रभावित हो. अगर पार्टियां अपने फंड को लेकर पारदर्शी हो जायें, तो उससे यह पता लगाना आसान हो जायेगा कि उनकी सरकारों द्वारा लिये गये फैसलों में कहीं कोई कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की बात तो नहीं है. जब तक पार्टियों में पारदर्शिता नहीं आयेगी, तब तक जनता का विश्वास सरकारों में और राजनीतिक पार्टियों में नहीं होगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले दस-बीस सालों में देश में जो राजनीतिक वातावरण बना है, जनता को राजनीतिक पार्टियों और नेताओं पर यह विश्वास नहीं है कि वे देशहित और जनता के हित में काम कर रहे हैं.  राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से मिलता है, इसकी पारदर्शिता के अभाव के चलते विभिन्न प्रकार के राजनीतिक भ्रष्टाचार पनपते हैं. इसी के मद्देनजर, 23 मार्च, 2016 को दिल्ली हाइकोर्ट ने एक फैसला लिया था, जिसका पहला वाक्य था- ‘आज से 40 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजनीति में और चुनाव में बहुत ज्यादा पैसे का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे चुनाव प्रक्रिया खराब हो रही है.’ ऐसे में मेरा यह मानना है कि अगर 40 साल से देश की जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से किस रूप में आता है, तो यह स्वाभाविक है कि लोगों को शक होता है.  क्योंकि अगर सब कुछ ठीक है, तो पार्टियों को यह बताने में क्या दिक्कत है कि उन्हें पैसा कहां से आता है? पार्टियों के इस धन को कालाधन कहें कि न कहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन यह बेहिसाब-किताब वाला धन (अनएकाउंटेड मनी) तो जरूर है. शायद यही वजह है कि पिछले 40 साल से देश की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने चंदों के हिसाब-किताब छुपाती आ रही हैं. इस छुपाने की प्रक्रिया से ही भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है. चुनावों में पैसे, शराब, उपहार आदि बांटने का काम इसी भ्रष्टाचार का हिस्सा है.
आर्थिक सुधारों एवं चुनावों में होने वाले भ्रष्टाचार को एक-दूसरे से जोड़ना भले ही असंगत और नामुनासिब प्रतीत होता हो, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में जमीनी सच्‍चाई यही है कि इन दोनों का एक-दूसरे से गहरा नाता है. अत: ऐसे में इस लाजि‍मी, लेकिन अदृश्य आपसी नाता को जल्‍द-से-जल्‍द स्‍वीकार कर लेने और इस दिशा में पुरजोर ढंग से साहसिक कदम उठाने से ही इस बुराई का खात्‍मा किया जा सकता है। यह बुराई तमिलनाडु जैसे ‘प्रबुद्ध’ राज्य की राजनीति में पहले ही काफी गहराई तक घर कर चुकी है.
चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं. कोई पैसे बांट कर लुभाता है, कोई शराब बांट कर लुभाता है, तो कोई उपहार बांट कर. करोड़ों रुपये पकड़े जाते हैं. हजारों बोतल शराब पकड़ी जाती है. जाहिर है, जिन पैसों से यह सब होता है, वह पैसा सही तो नहीं ही होगा. जो पैसा सही नहीं है, वह कालाधन की श्रेणी में अपने आप आ जाता है. ऐसे में चुनावों में कालाधन के बारे में बात करने से पहले हमें कुछ अहम बातों को समझ लेनी चाहिए कि आखिर इस काले धन के पीछे का सच क्या है. कालाधन और भ्रष्टाचार की जड़ कहां है.  दरअसल, सरकार का मतलब होता है राजनीतिक पार्टी, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक पार्टियां ही सरकार बनाती हैं. केंद्र में एनडीए की सरकार है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी मुख्य घटक दल है. देश के सभी राज्यों में किसी न किसी पार्टी की ही सरकार है.  यानी यह स्पष्ट है कि राजनीतिक पार्टियां ही सरकारें बनाती हैं. इस ऐतबार से जो फैसले सरकारें लेती हैं, एक हिसाब से वे फैसले राजनीतिक पार्टियां ही लेती हैं. ऐसे में यदि किसी सरकार ने कोई फैसला लिया या यूं कह लें कि राजनीतिक पार्टी ने कोई फैसला लिया कि देश में यह होना चाहिए, तो हमें यह समझना होगा कि ये फैसले देश के हित में लिये जाते हैं या उस कंपनी के हित में लिये जाते हैं, जिसे उन फैसलों के तहत प्रोजेक्ट पर काम मिलनेवाला होता है. यदि उस कंपनी के हित में फैसले लिये जाते हैं, तो क्या ये अच्छे फैसले हैं, या इसलिए लिये जाते हैं कि इससे कंपनी को फायदा होगा और फिर कंपनी से पार्टी को फायदा होगा. इस पूरी प्रक्रिया को कहते हैं- कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट यानी एक ऐसी स्थिति, जिसमें किसी सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रुचि से प्रभावित हो. अगर पार्टियां अपने फंड को लेकर पारदर्शी हो जायें, तो उससे यह पता लगाना आसान हो जायेगा कि उनकी सरकारों द्वारा लिये गये फैसलों में कहीं कोई कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की बात तो नहीं है. जब तक पार्टियों में पारदर्शिता नहीं आयेगी, तब तक जनता का विश्वास सरकारों में और राजनीतिक पार्टियों में नहीं होगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले दस-बीस सालों में देश में जो राजनीतिक वातावरण बना है, जनता को राजनीतिक पार्टियों और नेताओं पर यह विश्वास नहीं है कि वे देशहित और जनता के हित में काम कर रहे हैं.  राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से मिलता है, इसकी पारदर्शिता के अभाव के चलते विभिन्न प्रकार के राजनीतिक भ्रष्टाचार पनपते हैं. इसी के मद्देनजर, 23 मार्च, 2016 को दिल्ली हाइकोर्ट ने एक फैसला लिया था, जिसका पहला वाक्य था- ‘आज से 40 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजनीति में और चुनाव में बहुत ज्यादा पैसे का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे चुनाव प्रक्रिया खराब हो रही है.’ ऐसे में मेरा यह मानना है कि अगर 40 साल से देश की जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से किस रूप में आता है, तो यह स्वाभाविक है कि लोगों को शक होता है.  क्योंकि अगर सब कुछ ठीक है, तो पार्टियों को यह बताने में क्या दिक्कत है कि उन्हें पैसा कहां से आता है? पार्टियों के इस धन को कालाधन कहें कि न कहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन यह बेहिसाब-किताब वाला धन (अनएकाउंटेड मनी) तो जरूर है. शायद यही वजह है कि पिछले 40 साल से देश की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने चंदों के हिसाब-किताब छुपाती आ रही हैं. इस छुपाने की प्रक्रिया से ही भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है. चुनावों में पैसे, शराब, उपहार आदि बांटने का काम इसी भ्रष्टाचार का हिस्सा है. शिक्षा-आधारित रोजगार योग्‍य क्षमता सुनिश्चित करने के साथ-साथ रोजगार-केंद्रित ज्‍यादा परिवारिक आय के सृजन में भी अग्रणी होने के बावजूद तमिलनाडु इस देश में ‘नोट के बदले वोट (कैश-फॉर-वोट)’ के रूप में होने वाले अपनी तरह के सबसे विकृत चुनावी भ्रष्टाचार के केंद्र में रहा है। उल्‍लेखनीय है कि देश में जिस समय आर्थिक सुधारों का आगाज हुआ था ठीक उसी समय के आसपास इस बुराई का चलन भी शुरू हुआ था। इस चुनावी भ्रष्‍टाचार की शुरुआत ‘चुनाव-91’ के तुरंत बाद हुए उप-चुनावों से उस समय हुई थी जब अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता मुख्यमंत्री थीं और जिन्‍होंने अपने घोर प्रतिद्वंद्वी मूल द्रमुक को धूल चटा दी थी। दरअसल, हमारे देश ने पहली गलती उसी समय कर दी थी क्‍योंकि वह अधिकारों एवं नियमों को लागू करने के बजाय मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी एन शेषन द्वारा और उनके अधीन लागू व्यापक चुनावी सुधारों के कारण इसे ठीक से समझ नहीं पाया था. शेषन ने डंडा तो चलाया पर एक मजबूत संवैधानिक संस्था बनाने में वह चूक गए.

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in