बहुजन समाज पार्टी [मायावती] और राजनीति की विडम्बनाएं – वीरेन्द्र जैन

6:07 pm or October 10, 2018
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बहुजन समाज पार्टी [मायावती] और राजनीति की विडम्बनाएं

  • वीरेन्द्र जैन

बहुजन समाज पार्टी के साथ कोष्ठक में मायावती लिखा होने के कारण यह सोचा जा सकता है जैसे यह एक अलग पार्टी है। ऐसा होते हुये भी नहीं है। यह पहेली नहीं एक सच्चाई है। एक बहुजन समाज पार्टी थी जिसे कांसीराम जी ने स्थापित किया था। उसकी विकास यात्रा बामसेफ, डीएसफोर से होती हुयी बहुजन समाज पार्टी नामक आन्दोलन तक गयी थी जिसने बाद में उस राजनीतिक दल का स्वरूप ग्रहण किया जिसे सत्ता में आने की कोई जल्दी नहीं थी और जो अपने सिद्धांतों से किसी तरह का समझौता नहीं करता था। अब ऐसा नहीं है, कांसीराम जी के निधन के बाद अब सुश्री मायावती के नेतृत्व में चल रही इस पार्टी के लक्ष्य और तौर तरीके बिल्कुल बदल गये हैं, इसलिए कहा जा सकता है यह एक नई बहुजन समाज पार्टी [मायावती] है।

बहुजन समाज पार्टी उर्फ बीएसपी के गठन से पहले बामसेफ का गठन हुआ था। संविधान ने जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों को आरक्षण दिया तो प्रारम्भ में तो समुचित संख्या में सरकारी नौकरी के लिए सुपात्र लोग ही नहीं मिले क्योंकि समुदाय में वांछित संख्या में शिक्षित लोग थे ही नहीं। आरक्षण के बाद भी कुछ वर्षों तक ये स्थान गैर आरक्षित लोगों से भरे जाते रहे, और कुछ मामलों में तो सुपात्रों को भी अपात्र बना दिया गया तब यह नियम बनाना पड़ा कि आरक्षित पदों में भरती गैर आरक्षित वर्ग से नहीं होगी, भले ही स्थान रिक्त रखे जायें। जो लोग आरक्षण के आधार पर सरकारी सेवाओं में आये थे उन्हें भी जात-पांत से ग्रस्त सहयोगी और अधिकारी वर्ग का एक हिस्सा स्वीकार नहीं कर रहा था। न उनके साथ समान रूप से उठना बैठना होता था और न ही सामाजिक व्यवहार होता था। कार्यस्थलों में उनकी सामान्य भूलों के प्रति भी उनकी जाति से जोड़ कर अपमान किया जाता था। ट्रेड यूनियनों तक के अनेक पदाधिकारी भी जाति की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाये थे या जातिवाद मानने वाले अपने बहुसंख्यक सदस्यों के साथ थे। यही कारण रहा कि अम्बेडकर के जीवन और विचारों से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी में आये लोगों ने अपना अलग घेरा बनाना शुरू कर दिया। कांसीराम भी ऐसे ही लोगों में से थे जिन्होंने बाद में घेरे को संगठन का रूप देकर इस वर्ग का नेतृत्व किया और इसी अलगाव की भावना को अपने संगठन की ताकत बनाया। यही सफर बामसेफ से डीएसफोर और बाद में बहुजन समाज पार्टी तक ले गया। बामसेफ कर्मचारी संगठन था तो डीएसफोर पिछड़ों व मुस्लिमों को मिला कर गैरसवर्ण लोगों की व्यापक एकता का मंच था जो बाद में बहुजन समाज पार्टी की ओर गया।

चुनावी पार्टी बनते ही इस भावनात्मक आन्दोलन को दूसरी जातियों के सहयोग और संसाधनों की जरूरत पड़ी जो नौकरीपेशा आरक्षित वर्ग द्वारा की जा रही सहायता से सम्भव नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दल को विस्तार दिया, भले ही दलितों और पिछड़ों में भी एकता सहज नहीं थी। प्रारम्भ में तो जातिवादी भावना के कारण उक्त वर्ग साथ में नहीं आया किंतु दलित वर्ग की एकजुटता से अर्जित शक्ति को हथियाने के लिए उन्होंने कुछ राजनीतिक समझौते किये। कांसीराम जी ने अपने लोगों की सामूहिक वोटशक्ति को पहचान कर उसे ही संसाधन जुटाने का माध्यम भी बनाया। उनका फार्मूला बना कि जहाँ वे अपने वर्ग के प्रतिनिधियों को चुनाव जिता सकते हैं वहाँ तो किसी से कोई समझौता नहीं करेंगे किंतु जहाँ नहीं जिता पा रहे हैं वहाँ अपनी वोटशक्ति को ट्रांसफर करके संसाधन जुटाने के लिए स्तेमाल करेंगे। उन्होंने दलित वर्ग को जाति स्वाभिमान की लड़ाई के लिए हर तरह का बलिदान देने के लिए तैयार कर लिया था।

इसी के समानांतर जनता पार्टी से बाहर की गयी जनसंघ ने भाजपा का गठन किया। इस दल के पास देश भर में विस्तारित संघ का एक ढांचा तो था किंतु वह इतना सीमित था कि अपनी दम पर चुनाव नहीं जिता सकता था। उनको सवर्ण समाज और व्यापारी वर्ग की सहानिभूति तो प्राप्त थी किंतु जीतने के लिए कुछ अतिरिक्त सहयोग की जरूरत थी। कांसीराम ने जिन दलित वर्ग के मतों को कांग्रेस के बंधुआ होने से मुक्त करा लिया था वे उनकी पूंजी बन गये थे, और पिछड़े वर्ग की समाजवादी पार्टी से समझौता फेल हो गया था। सत्ता के लिए किसी भी स्तर पर सौदा करने को तैयार भाजपा ने अतिरिक्त मतों का सौदा बहुजन समाज पार्टी से करना तय किया और कभी गठबन्धन के नाम पर तो कभी उनके सदस्यों से दलबदल करा के सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करती गयी। कांसीराम के अस्वस्थ होते ही पूरी ताकत मायावती के हाथों में आ गयी जिन्होंने उनका संघर्ष नहीं देखा था पर राजनीतिक सौदेबाजी जरूर देखी थी, इसलिए उन्होंने दो काम किये, एक तो जाति स्वाभिमान के नाम पर अपने वोटों के बड़े हिस्से को सुरक्षित रखा, दूसरे इसी नाम पर उन वोटों को उचित सौदे के साथ स्थानांतरित करने की ताकत बनाये रखी।

दलितों का अन्धसमर्थन पाकर, बहुजन समाज पार्टी में पार्टी लोकतंत्र कभी नहीं रहा। कांसीराम कहते थे कि हमारी पार्टी के पास कोई आफिस नहीं है, कोई फाइल नहीं है, कोई हिसाब किताब नहीं है, कोई चुनाव नहीं होते। वे जिस कमरे में पार्टी की बैठक करते थे उसमें केवल एक कुर्सी होती थी और बाकी सब को नीचे बैठना पड़ता था। वे सूचनाएं प्राप्त करते थे किंतु किसी से सलाह नहीं करते थे। उनकी पार्टी में उनके कद का कोई नहीं था। जो उनके पास आता था उसे कद घटा कर आना पड़ता था। यही कारण रहा कि मायावती के आने के बाद लोगों ने झुका हुआ सिर उठाना शुरू कर दिया। जो लोग विभिन्न पदों पर रह कर सम्मान व सत्तासुख प्राप्त कर  चुके थे वे उनके आगे कांसीराम युग की तरह झुकने को तैयार नहीं हुये और पार्टी छोड़ते चले गये। उनमें से अनेक तो अपने साथ बिना हिसाब किताब वाली पार्टी द्वारा अर्जित संसाधनों को भी साथ लेते गये।

अब मायावती अपने शेष बचे समर्थन की दुकान चला रही हैं। वे 2009 में 6.17% वोटों के साथ 21 सीटें जीतने के बाद अब 4.19 प्रतिशत वोट और शून्य सीटों तक आ चुकी हैं। उनके अपने वर्ग का समर्थन घट कर भी बहुत बचा हुआ है और मत प्रतिशत में वे अब भी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी हैं। उनके घटते समर्थन को देखते हुए आगामी आम चुनावों में देखना होगा कि महात्वाकांक्षी और सुविधाभोगी होती जा रही दूसरी पंक्ति कब तक उनके अनुशासन में रह पाती है।

मायावती ने राजनीतिक सौदों से जो संसाधन जोड़े वे पार्टी के नाम से नहीं अपितु निजी या रिश्तेदारों के नाम पर रखे। उन पर आय से अधिक सम्पत्ति के प्रकरण सीबीआई में चल रहे हैं और केन्द्र में शासित दल उस आधार पर दबाव बनाते रहते हैं। गत लोकसभा चुनाव में जब कोई भी सीट नहीं जीत सकी थीं, तब समाचार पत्रों में कहा गया था कि हाथी [चुनाव चिन्ह] ने अंडा [शून्य] दिया है । देश के दूसरे दलित दल व नेता उनके बड़े आलोचक हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि दलित और कमजोर वर्ग के पक्ष में बिना कोई उल्लेखनीय कार्य किये, बिना कोई आन्दोलन चलाये वे केवल जाति स्वाभिमान के नाम पर कैसे अपना समर्थन बचाये हुये हैं और उसका भी सौदा करने में समर्थकों की कोई सलाह नहीं लेतीं। उनके इकलौते सबसे बड़े सलाहकार उस ब्राम्हण वर्ग से हैं जिससे नफरत को बनाये रखना उनकी पार्टी का मूलाधार रहा है। राज्यसभा के टिकिट का सौदा करने में भी वे जातिवाद नहीं देखतीं। आगामी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में फैसला लेते समय उन्होंने न अपने वर्ग का हित सोचा है न देश का हित सोचा है। देश के प्रमुख दलों ने भी उनके समर्थकों से सम्वाद करने के कभी प्रयास नहीं किये।

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