राजनीति और जातिवाद – एल एस हरदेनिया

3:11 pm or October 18, 2018
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राजनीति और जातिवाद

  • एल एस हरदेनिया

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। चयन में सर्वाधिक महत्व उम्मीदवार की जीत की संभावना को दिया जाता है। उसके बाद इस इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि जिस सीट के लिए उम्मीदवार का चयन किया जाना है वहां जातीय संतुलन कैसा है। इस समय विभिन्न जातियों के संगठनों के प्रतिनिधि विभिन्न पार्टियों के नेताओं से मिलकर मांग कर रहे हैं कि उनकी जाति के लोगों को ज्यादा से ज्यादा टिकटे दी जाएं।

सच पूछा जाए तो जातिगत और साम्प्रदायिक विभाजन ने हमारे देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पिछले वर्षों में जातीय विभाजन की दरारें और गहरी हो गई हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जातीय विभाजन के विरूद्ध देश में एक भी आंदोलन नहीं हुआ है। राजनीतिक पार्टियों ने जातिवाद के फेक्टर के सामने लगभग आत्मसमर्पण कर दिया है।

जातिवाद का सबसे अधिक प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ा है। हिन्दू समाज प्रमुख रूप से दो भागों में विभाजित है। ये दो भाग हैं सवर्ण और दलित। सवर्णों में ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य शामिल हैं। बाकी सब दलित हैं। इस विभाजन को मनुस्मृति का समर्थन प्राप्त है। फिर सवर्णों के तीन प्रमुख विभाजन के साथ-साथ इन तीनों में भी उप विभाजन हैं। जैसे ब्राम्हणों में सनाढ़य, कान्यकुब्ज, नार्मदीय आदि। गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत व बंगाल में इन्हें अन्य नामों से जाना जाता है। कर्नाटक, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, असम आदि में ब्राम्हणों को स्थानीय स्तर पर विभिन्न नामों से जाना जाता है। इसी तरह का विभाजन वैश्य और क्षत्रिय समुदायों में भी है। वैसे संविधान में जैन, बौद्ध और सिक्ख समुदायों को भी हिन्दू की श्रेणी में शामिल किया गया है यद्यपि बहुसंख्यक जैन, बौद्ध और सिक्ख इसे नहीं मानते। ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य समुदायों में विवाह के लिए भी अनेक उपविभाजन हैं। जैसे कान्यकुब्ज ब्राम्हणों की शादी साधारणतः सनाढ़य या गौड़ परिवारों में नहीं होती है। वैसे अब इस मामले में ढिलाई स्वीकार होने लगी है। परंतु अनेक मामलों में अंर्त-ब्राम्हण शादियों का विरोध भी होता है।

जैसा कि पहले लिखा जा चुका है आजादी के बाद जातिवाद का संगठित विरोध नहीं हुआ। राजनीतिक पार्टियों ने इस बुराई के सामने न केवल लगभग आत्मसमर्पण कर दिया बल्कि इसका भरपूर लाभ उठाने का प्रयास भी किया। स्थिति यहां तक हो गई कि राजनीतिक रूप से भले ही एक जाति के लोग परस्पर प्रतिद्वंद्वी हों  परंतु वे जाति के आधार पर एक ही मंच पर बैठ जाते हैं। जैसे यादव राजनीतिक रूप से बुरी तरह से विभाजित हैं परंतु जब जाति का सम्मेलन होता है तो मुलायम सिंह यादव, लालू यादव के साथ बैठने में कतई संकोच नहीं करते।

ब्रिटिश राज के दौरान जातिवाद का विरोध अनेक बार हुआ। अनेक मौकों पर राजनीतिक नेताओं ने स्वयं इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया है। जैसे वर्ष 1934-35 में लाहौर में एक विशाल जाति तोड़क-फोड़क सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में डॉ. अंबेडकर को भी आमंत्रित किया गया था। डॉ. अंबेडकर से कहा गया था कि वे अपना भाषण लिखित रूप में भिजवा दें।

अम्बेडकर का भाषण इतना क्रांतिकारी था कि आयोजकों ने उन्हें सम्मेलन में शामिल होने के लिए दिया गया निमंत्रण वापिस ले लिया। अंबेडकर ने इसे अपना अपमान माना और इसकी शिकायत महात्मा गांधी से की। गांधी ने उन्हें अपना भाषण छपवाकर वितरित करने का परामर्श दिया। अंबेडकर ने अपना भाषण छपवाया और उसकी पहली प्रति गांधीजी को दी। गांधीजी ने अंबेडकर को बधाई दी पर कहा कि आपने इसकी कीमत ज्यादा रखी है। एक मुद्रित प्रति का मूल्य चार आना था।

आजादी के बाद ऐसा कोई आयोजन नहीं किया गया। इसके ठीक विपरीत दिन-प्रतिदिन जातीय विभाजन बढ़ता गया। इस विभाजन का सबसे अधिक खामियाजा दलितों और उन युवक-युवतियों को भुगतना पड़ रहा है जो प्रेम हो जाने के कारण विवाह सूत्र में बंधते हैं। बहुसंख्यक अभिभावक प्रेम विवाह को मान्यता नहीं देते हैं। उस हालत में तो कतई नहीं जब प्रेमी  एक जाति या यहां तक कि एक वर्ण के नहीं होते हैं। यदि लड़की उच्च जाति की है और लड़का नीची जाति का और विशेषकर यदि दलित है तो किसी हाल में ऐसे विवाह को मंजूरी नहीं मिलती है। मंजूरी तो बहुत दूर की बात है लड़की के परिवारजन दलित प्रेमी के खून के प्यासे हो जाते हैं।

एक समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अकेले तेलंगाना में ऐसी 18 हत्याएं हो चुकी हैं। ऐसी ही एक हत्या हुई प्रणय कुमार नामक एक दलित युवक की जिसने उच्च जाति की एक लड़की से प्रेम विवाह किया था। लड़की एक अरबपति परिवार की थी। लड़की के पिता ने प्रणय कुमार को एक करोड़ रूपये लेकर संबंध तोड़ देने आफर दिया। प्रणय ने यह आफर ठुकरा दिया। इसके बाद लड़की के पिता ने प्रणय कुमार की हत्या करने की योजना बनाई। प्रणय  की हत्या के लिए बिहार से हत्यारे बुलवाए गए। एक करोड़ रूपये में हत्या का सौदा किया गया। 15 लाख रूपये का एडवांस दिया गया और बाकी रकम बाद में देने का वायदा किया गया। संयोगवश जिन हत्यारों को यह काम सौंपा गया उन्होंने गुजरात की भाजपा सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री हरेन पंडया की हत्या की थी। सुबूतों के अभाव में वे बरी हो गए थे। योजना के अनुसार इन हत्यारों ने प्रणय कुमार की उस समय हत्या की जब वह एक अस्पताल से वापिस आ रहे थे। उस समय उनकी प्रेमिका भी उनके साथ थी। दोनों ने एक आर्यसमाज मंदिर में शादी की थी। बाद में पता लगा कि प्रेमिका गर्भवती थी और उसकी जांच के लिए ही वे अस्पताल गए थे। हत्या के बाद दलित संगठनों ने एक मंच पर आकर अपना रोष प्रकट किया। प्रणय कुमार की शवयात्रा में शामिल लोगों ने जातिवाद के विरूद्ध नारे लगाए और राजसत्ता से मांग की कि जातिवाद को समाप्त करने के सघन प्रयास किए जाएं। हत्या के बाद प्रणय कुमार की प्रेमिका ने सारा जीवन उसके परिवार के साथ व्यतीत करने का फैसला किया है। उसने यह निर्णय भी लिया है कि उसके प्रेमी / पति के हत्यारों और हत्या करवाने वालों को उनके जघन्य अपराध की सजा दिलवाने के लिए वह सघन प्रयास करेगी।

वहीं इस घटना के बाद वहां के उच्च जातियों के लोगों ने भी एक नया संगठन बनाया है जो इस तरह की घटनाओं में शामिल परिवारों की रक्षा करेगा। इस संगठन ने ऐसा कानून बनाए जाने की मांग की है जिसमें यह प्रावधान हो कि परिवार की संतानों के विवाह संबधी निर्णय लेने का अधिकार उनके अभिभावकों को हो। बहुत स्पष्ट है कि यदि समाज जातियों और उप जातियों में विभक्त न हो तो इस तरह की लोमहर्षक घटनाएं नहीं होंगी। इस बात को सभी मानते हैं कि प्रेम एक अत्यधिक सशक्त भावना है। हम आज भी हीर-रांझा, लैला-मंजनू आदि की अमर कहानियों को सुनकर और पढ़कर भावुक हो जाते हैं। प्रेम कितना शक्तिशाली भाव है यह गुलेरीजी की कहानी ‘उसने कहा था‘ से सिद्ध होता है। प्रेम के कोमल भाव से परिपूर्ण इस कहानी ने गुलेरीजी को अमर बना दिया है।

एक तरफ प्रेम कहानियों के प्रति हमारा इतना सम्मान है वहीं दूसरी ओर जब मामला हमारे परिवार का होता है तब हम इतने असहनशील हो जाते हैं कि अपने ही बेटे की हत्या करने तक से बाज नहीं आते। दुःख की बात है कि इस तरह की हत्याओं को आनर किलिंग कहा जाता है। यह समझ के परे है कि इस तरह के अपराध करके हम कैसे अपने आनर की रक्षा करते हैं।

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