सवालों के घेरे में सीबीआई और भ्रष्टाचार के मामले – अब्दुल रशीद

4:08 pm or October 25, 2018
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सवालों के घेरे में सीबीआई और भ्रष्टाचार के मामले

  • अब्दुल रशीद

एक अप्रैल 1963 को सीबीआई बनी और इस पर कई बार आरोप भी लगे। लेकिन इस संस्था ने एक से बढ़कर एक शानदार काम भी किए हैं। हालांकि, 10 मई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहा और 55 साल बाद 2018 में सीबीआई के नंबर-एक  और नंबर-दो अफसरों की लड़ाई ने उस पर काला दाग लगा दिया। हालात यहां तक पहुंच गये कि सीबीआई को अपने ही दफ्तर में छापा मारना पड़ा।

सीबीआई के दो शीर्ष अफसरों के रिश्वतखोरी विवाद में फंसने के बाद केंद्र सरकार ने ज्वाइंट डायरेक्टर नागेश्वर राव को जांच एजेंसी का अंतरिम प्रमुख नियुक्त कर दिया। जांच जारी रहने तक सीबीआई चीफ आलोक वर्मा और नंबर दो अफसर स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया गया।

दोनों को छुट्टी पर भेजे जाने पर सरकार का पक्ष रखते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ”सीबीआई की संस्थागत ईमानदारी और विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए इसके निदेशक और विशेष निदेशक को हटाने का फैसला लिया गया।” सीवीसी ने दोनों शीर्ष अधिकारियों को हटाने की सिफारिश की थी।

वर्मा ने सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने अदालत से कहा कि केंद्र सरकार ने रातोंरात उनके अधिकार छीन लिए। यह कदम सीबीआई की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है। वर्मा ने कहा कि शायद उच्च पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ एजेंसी की जांच सरकार के मुताबिक नहीं चली।

क्या है सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की प्रक्रिया

सीबीआई निदेशक के नियुक्ति की प्रक्रिया दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 की धारा 4अ में दी गई है। धारा 4अ को लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के बनने के बाद संशोधित किया गया था।

लोकपाल कानून बनने से पहले सीबीआई निदेशक की नियुक्ति दिल्ली स्पेशल पुलिस एक्ट के तहत की जाती थी। इस एक्ट के तहत, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, गृह सचिव और कैबिनेट सचिवालय के सचिवों की समिति में संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाती थी। इस पर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के बाद लिया जाता था।

हालांकि लोकपाल कानून आने के बाद गृह मंत्रालय द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी मामलों की जांच करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की एक सूची तैयार की जाती है जिसमें से किसी एक को सीबीआई निदेशक नियुक्त करना होता है।इसके बाद इस सूची को प्रशिक्षण विभाग के पास भेजा जाता है जहां पर इसकी वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर आकलन किया जाता है। इसके बाद एक सूची लोकपाल सर्च कमेटी के पास भेजी जाती है जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता होते हैं। सर्च कमेटी नामों की जांच करती है और सरकार को सुझाव भेजती है।

आलोक वर्मा 1979 बैच के एजीएमयूटी (अरुणाचल, गोवा, मिजोरम, केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के अधिकारी हैं। सीबीआई निदेशक का पद संभालने से पहले आलोक वर्मा दिल्ली पुलिस के कमिश्नर, दिल्ली कारागार निदेशक, मिजोरम और पुदुचेरी के डीजीपी जैसे पदों पर रह चुके थे। वर्मा सीबीआई के एकमात्र ऐसे निदेशक हैं जो एजेंसी के अंदर काम किए बगैर सीधे नियुक्त किए गए थे।

वर्मा को 17 जनवरी 2017 को सीबीआई निदेशक नियुक्त किया गया था। आलोक वर्मा की नियुक्ति के लिए जो समिति बनाई गई थी उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विपक्ष के नेता मल्लिकाअर्जुन खड्गे और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर थे। ध्यान देने वाली बात ये है कि खड्गे वर्मा की नियुक्ति को लेकर सहमत नहीं थे और उन्होंने मीटिंग में विरोध पत्र (डिसेंट नोट) दिया था।

क्या है,सीबीआई निदेशक को हटाने या तबादले  नियम

दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 की धारा 4बी के तहत सीबीआई निदेशक कार्यकाल दो साल के लिए होता है। इससे पहले निदेशक को हटाया नहीं जा सकता है। अधिनियम के मुताबिक, ‘निदेशक, सेवा की शर्तों से संबंधित नियमों के विपरीत किसी भी चीज के बावजूद, उस पद से दो साल के लिए रहेगा, जिस तारीख से वह पद्भार ग्रहण करता है।’

धारा 4बी(2) के तहत सीबीआई निदेशक का तबादला भी इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता है। अगर निदेशक का तबादला करना है तो उस कमेटी से सहमति लेनी होगी जिसने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए नाम की सिफारिश की थी।

1997 से पहले सीबीआई निदेशक को सरकार जब चाहे अपनी मर्ज़ी से हटा सकती थी. लेकिन विनीत नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए कम से कम दो साल का कार्यकाल तय कर दिया। इसके पीछे मंशा ये थी कि निदेशक सरकार की पकड़ से स्वतंत्र होकर और हटाए जाने के डर से मुक्त होकर अपना काम कर सके। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि निदेशक का तबादला असाधारण स्थिति में ही किया जा सकता है और इस तबादले की प्रक्रिया में चयन समिति, सीवीसी, होम सेकेरेट्री और सेकेरेट्री (कार्मिक) का होना भी ज़रूरी है।

कब और कैसे शुरू हुआ आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच खींचतान

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच खींचतान पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई जब सीबीआई डायरेक्टर ने CVC के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय पैनल की बैठक में अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर प्रमोट किए जाने पर आपत्ति जताई। अक्टूबर 2017 में राकेश अस्थाना की नियुक्ति को लेकर सीवीसी के साथ हुई बैठक में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक गोपनीय पत्र दिया था।

कथित रूप से उस पत्र में स्टर्लिंग बायोटेक मामले को लेकर अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत थी।आरोप है कि कंपनी के परिसर में पाई गई एक डायरी के मुताबिक अस्थाना को कंपनी द्वारा 3.88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। स्टर्लिंग बायोटेक पर 5,000 करोड़ रुपये से ऊपर के लोन की हेराफेरी की जांच चल रही है।

राकेश अस्थाना को भी स्पेशल डायरेक्टर बनाए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने याचिका दायर की थी। प्रशांत भूषण का कहना था कि राकेश अस्थाना का नाम स्टर्लिंग बायोटेक मामले की डायरी में दर्ज है। इस मामले की सीबीआई ने खुद एफआईआर दर्ज की है। ऐसे में सीबीआई में राकेश अस्थाना की नियुक्ति कैसे हो सकती है? बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की याचिका को खारिज कर दिया था।

इस साल जून में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक बार फिर अस्थाना पर निशाना साधा। निदेशक ने सीवीसी को लिखा कि उनकी अनुपस्थिति में राकेश अस्थाना सीवीसी मीटिंग में सीबीआई नियुक्ति के दौरान उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं।

वर्मा ने कहा कि अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को लेकर जांच चल रही है। हालांकि अस्थाना ने भी निदेशक पर पलटवार किया। अस्थाना ने कैबिनेट सचिव को अगस्त में पत्र लिखा कि आलोक वर्मा उनकी जांच में हस्तक्षेप कर रहे हैं और आईआरसीटीसी घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ छापेमारी रोकने की कोशिश की।

इस मामले के दो महीने के अंदर ही वर्मा ने अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर दर्ज कराया।

क्या है घूस कांड

1984 आईपीएस बैच के गुजरात कैडर के अफसर अस्थाना मीट कारोबारी मोइन कुरैशी से जुड़े मामले की जांच कर रहे थे। इस जांच के दौरान हैदराबाद का सतीश बाबू सना भी घेरे में आया। एजेंसी 50 लाख रुपए के ट्रांजैक्शन के मामले में उसके खिलाफ जांच कर रही थी। सना ने सीबीआई चीफ को भेजी शिकायत में कहा कि अस्थाना ने इस मामले में उसे क्लीन चिट देने के लिए 5 करोड़ रुपए मांगे थे। हालांकि, 24 अगस्त को अस्थाना ने सीवीसी को पत्र लिखकर डायरेक्टर आलोक वर्मा पर सना से दो करोड़ रुपए लेने का आरोप लगाया था।

विपक्ष हुई हमलावर कहा लालू को जेल राजनितिक साजिश

विपक्ष भी सरकार पर हमले का मौका नहीं छोड़ना चाहती।एक ओर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इसे राफेल से जोड़ कर देख रही है तो दूसरी ओर अस्थाना पर रिश्वतखोरी के आरोप लगने के बाद,आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने तो लालू प्रसाद यादव की जेल को राजनीतिक साजिश तक बता दिया है।क्योंकि अस्थाना ने ही लालू से जुड़े केस की जांच की थी।

भ्रष्टाचार के मामले होंगे प्रभावित

2014 में जिस भ्रष्टाचार के मामले को मुद्दा बना कर भाजपा प्रचंड बहुमत प्राप्त करने में कामयाब रही, सीबीआई के घूसकांड से उत्पन्न उठा पटक के कारण भ्रष्टाचार के उन मामलों  पर असर पड़ना तय है। क्योंकि राजनीतिक रूप से संवेदनशील लगभग सभी मामलों की जांच राकेश अस्थाना के नेतृत्व वाली टीम कर रही थी। जानकारों की मानें तो राकेश अस्थाना के बाद यदि नई टीम बनाई जाती है तो जांच में देर लगना स्वाभाविक है।

सीबीआई को पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिंजरे में बंद तोता बताया था। अब इसी तोते की आपसी लड़ाई सरेआम हो जाने से कई सवाल खड़े हो रहें हैं? देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारियों पर रिश्वतखोरी के आरोप लगना,और आधी रात में सीबीआई का तख्ता पलट किया जाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। आखिर ऐसी कौन सी स्थिति निर्मित हो गई थी के सरकार को आधीरात में सीबीआई का तख्ता पलट करना पड़ा,यह सच सीबीआई के प्रति देश के आवाम की विश्वसनीयता के लिए देश के सामने आना ही चाहिए, सिर्फ सीवीसी की सिफारिश पर ऐसा किया गया,ऐसा कहना कई गंभीर सवाल पैदा करता है?

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