प्रतिमा की ऊंचाई से भी ज्यादा उंचे हैं सरदार पटेल – अब्दुल रशीद

3:09 pm or November 1, 2018
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प्रतिमा की ऊंचाई से भी ज्यादा उंचे हैं सरदार पटेल

  • अब्दुल रशीद

सरदार पटेल कांग्रेसी नेता थे। सरदार पटेल ने गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाए थे। पटेल ने ये भी कहा था कि गांधी की हत्या के बाद आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने मिठाई बाँटी थी। इन सब के बावजूद भाजपा सरदार पटेल के प्रति इतना प्रेम क्यों दिखाती है? कुछ इतिहासकारों का मानना है के यह प्रेम सिर्फ नेहरु बनाम पटेल की राजनीती है। खुद पीएम मोदी को जब भी नेहरू पर हमला बोलना होता है तो पटेल की तारीफ़ करते हुए बोलते हैं।

वर्ष 1928 में,वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में गुजरात में किसानों ने बार डोली सत्याग्रह आंदोलन किया था। उस समय प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में तीस प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी थी। पटेल ने इस लगान वृद्धि का जमकर विरोध किया। सरकार ने इस सत्याग्रह आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए, पर अंतत: विवश होकर उसे किसानों की मांगों को मानना पड़ा। इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की।

एक सच ये भी है की आज किसान कितना खुश हैं, यह सरदार पटेल की स्टैचू ऑफ यूनिटी से महज़ 12 किलोमीटर दूर नाना पिपड़िया गांव के किसानों की बात सुनकर लगा सकते हैं।

सिंचाई के लिए पानी को तरसने वाले इन किसानों की सरकार से कुछ नाराज़गी है।इन किसानों का मानना है कि पटेल की प्रतिमा पर खर्च किए जाने वाले तीन हज़ार करोड़ रुपये सूबे के ज़रूरतमंदों की मदद के लिए खर्च किए जाने चाहिए थे।

आज भले ही नेहरू और पटेल के बीच तनाव के किस्से गढ़े जा रहे हों,लेकिन नेहरु और पटेल के संवादों में एक दुसरे के लिए सम्मान ही झलकता है। इसकी झलक उन ख़तों में मिलती है, जिसे इन दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को भेजा था।

एक अगस्त 1947,नेहरू ने पटेल को ख़त लिखा, “कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना ज़रूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।”

3 अगस्त 1947,सरदार पटेल ने नेहरू को जवाब दिया, ”आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 साल की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”

इतिहासकार बिपिन चंद्र की किताब “आजादी के बाद का भारत” के मुताबिक, 1950 में पटेल ने एक भाषण में कहा था-

“हम एक सेकुलर राज्य हैं। यहां हर मुसलमान को यह महसूस करना चाहिए कि वो भारत का नागरिक है और भारतीय होने के नाते उसके हक बराबर के हैं। अगर हम उसे ऐसा महसूस नहीं करा सकते, तो हम अपनी विरासत और देश के लायक नहीं हैं।”

आज भले ही सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर कई तरह के किस्से गढ़े जा रहे हों लेकिन इन किस्सों का उनके विचारों से मेल दिखाई नहीं देता।

सरदार पटेल की विशालकाय मूर्ति को Statue of Unity खासतौर पर इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने आजादी के वक्त देशभर की रियासतों को एक करने का काम किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने भाषण में यह बात कही लेकिन जिस मंच से वह भाषण दे रहे थे क्या उस मंच पर कम से कम राजनैतिक एकता दिखी, महापुरुष किसी एक पार्टी के नहीं होते वह देश के नेता होते हैं तो पूरा समारोह में एक पार्टी की झलक और सरदार के राष्ट्रहित कार्यों का उल्लेख एक पार्टी के सरकार द्वारा किए गए कार्यों के संदर्भ में करना क्या दर्शाता है?

सरदार का पूरा जीवन देश के लिए समर्पित रहा। जीवन भर गांधी विचार के साथ देशहित कार्यों में योगदान देने वाले सरदार नेहरू को अपना नेता मानते थे,और खुद को वफ़ादार सिपाही,ऐसे में पटेल नेहरू से बेहतर प्रधानमंत्री होते कहने वाले लोग आख़िर सत्य पर असत्य की स्याही उड़ेल कर सरदार को कौन सी विरासत का नायक बनाना चाहते हैं?

Statue of Unity की वेबसाइट पर सरदार कि प्रतिमा दुनिया की सभी प्रतिमाओं से ऊंचा तो दिखाई देता है लेकिन उनके बग़ैर जिनके साथ,जिनके लिए उन्होंने संघर्ष किया। उनका भी जिक्र नहीं जिन्होंने सरदार को सरदार की उपाधि दी। तो क्या यही है प्रतीकों की ऊंचाई और महानता की गहराई के बीच की सच्चाई।

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