आचार संहिता लागू होने के बाद के दलबदल को भ्रष्ट आचरण माना जाए – एल एस हरदेनिया

5:41 pm or November 9, 2018
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आचार संहिता लागू होने के बाद के दलबदल को भ्रष्ट
आचरण माना जाए

एल एस हरदेनिया

चुनाव के ठीक पूर्व के दलबदल ने प्रजातंत्र के लिए गंभीर कलंक का रूप ले लिया है। इस तरह का दलबदल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। दुःख और चिंता की बात यह है कि लगभग सभी पार्टियों को इस तरह के दलबदल से परहेज नहीं है। इस तरह का दलबदल अवसरवादिता का वीभत्स रूप है। जो भी पार्टी इस तरह के दलबदलुओं को प्रश्रय दे रही है उसे यह सोचना चाहिए कि जो व्यक्ति उस पार्टी को धोखा दे रहा है जिसने उसे सब कुछ दिया वह उस पार्टी के प्रति कैसे वफादार हो सकता है जिसमें वह अपनी मूल पार्टी को छोड़कर जा रहा है?

अभी हाल में हुए कुछ दलबदलों का उल्लेख करना चाहूंगा। इनमें सबसे चौकाने वाला दलबदल संजय शर्मा का है। भारतीय जनता पार्टी के टिकिट पर चुनाव जीतने के बाद ऐसे अवसर पर जब भाजपा अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार कर रही थी, संजय शर्मा भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए और उन्हें कांग्रेस ने टिकिट भी दे दिया। अब उनके क्षेत्र के सभी काग्रेसियों को ‘संजय शर्मा जिन्दाबाद‘ बोलना पड़ेगा। उन्हें एक शक्तिशाली नेता बताना होगा। ये वही कांग्रेसी होंगे जिन्होंने लगातार उनका विरोध किया होगा, उन्हें भ्रष्ट बताया होगा। अब उन्हीं संजय शर्मा में उन्हें ऐसे गुण बताने होंगे जो उनमें हैं ही नहीं। इसी तरह की परिस्थितियां उन सभी क्षेत्रों में उत्पन्न होंगी जहां उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया के दौरान दलबदल हुआ होगा।

दलबदलुओं की सूची में दो और प्रमुख नाम शामिल हैं। ये हैं कांग्रेस के प्रेमचन्द गुडडू और भाजपा के संजय मसानी। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि गुडडू को भाजपा टिकिट दे रही है या नहीं। परंतु इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि गुड्डू कांग्रेस के एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें सांसद बनने का सौभाग्य मिला है। मसानी भाजपा के सदस्य होने के साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले भी हैं। चौहान की पत्नी साधना सिंह के सगे भाई होने के नाते उन्होंने कौनसी सुख-सुविधाएं नहीं भोगी होंगी। प्रसिद्ध कहावत है ‘‘सारी दुनिया एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ‘‘। उनपर अवैध रेत उत्खनन और व्यापंम घोटाले में शामिल होने सहित अनेक आरोप लग चुके हैं। इन्हें भी कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बना लिया है। आज उन्हें अपने जीजाजी का विकास माडल अच्छा नहीं लगा रहा है। उन्हें अब कमलनाथ माडल अच्छा लग रहा है।

पिछले चुनाव के दौरान भी इसी तरह के दलबदल हुए थे। इनमें सबसे सनसनीखेज दलबदल भागीरथ प्रसाद का था। लोकसभा के कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा भी हो चुकी थी। ठीक इसके बाद उनका नाम भाजपा उम्मीदवारों की सूची में शामिल कर लिया गया। भाजपा के चुनाव चिन्ह पर उन्होंने चुनाव लड़ा और जीता भी। भागीरथ प्रसाद एक आईएएस अधिकारी रहे थे। उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में शिक्षा पाई थी। यह विश्वविद्यालय देश का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है। यहां के विद्यार्थियों की अद्भुत वैचारिक प्रतिबद्धता होती है। ऐसे विश्वविद्यालय से निकला विद्यार्थी इस हद तक अवसरवादी हो सकता है इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। चुनाव पूर्व इस तरह के दलबदल पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे। परंतु ऐसी हरकतों के चलते यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या प्रजातंत्र का अर्थ सिर्फ चुनाव लड़ना और लड़वाना है।

अब समय आ गया है कि इस तरह की प्रवृत्तियों पर रोक लगे और इस तरह के दलबदल को आदर्श आचार संहिता में शामिल कर उसे भ्रष्ट आचरण घोषित कर प्रतिबंधित किया जाए।

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