ईशनिन्दा को अब अलविदा ! क्या एशिया के मुल्क अब आयर्लण्ड के नक्शे कदम पर चलेगे ? – सुभाष गाताडे

6:32 pm or November 9, 2018
blasphemy-web-page

ईशनिन्दा को अब अलविदा !

क्या एशिया के मुल्क अब आयर्लण्ड के नक्शे कदम पर चलेगे ?

  • सुभाष गाताडे

मैलाना, उम्र 44 साल, इंडोनेशिया की चीनी मूल की इस बौद्ध महिला को बहुत कम लोग जानते होंगे।

कुछ माह पहले ही वह इंडोनेशिया के अख़बारों में सूर्खियों में रही जब वहां के विवादास्पद ईशनिन्दा कानून के तहत उसे दो माह की सज़ा सुनायी गयी। सुमात्रा द्वीप की रहनेवाली इस महिला का ‘जुर्म’ इतना ही था कि उसने अपने स्थानीय मस्जिद से दी जा रही अज़ान के आवाज़ के बारे में शिकायत की थी। उसकी शिकायत को ‘ईशनिन्दा’ समझा गया जिसने चीनी विरोधी दंगे की शक्ल धारण की जिस दौरान कई बौद्ध विहारों को आग के हवाले किया गया। /1/

जबकि शेष दुनिया इस सज़ा के परिणामों पर सोच रही थी और इस बात पर गौर कर रही थी कि किस तरह एक मुस्लिम बहुसंख्यक मुल्क में – जो बहुलतावाद को वरीयता देता है तथा जिसके संविधान के तहत धार्मिक आज़ादी को शामिल किया गया है – कानून का इस्तेमाल ‘‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’’ के दमन के लिए किया जा रहा है ; दुनिया के अलग अलग हिस्सों से दो ऐसी ख़बरें आयीं जो एक तरह से हवा की ताज़ी बयार प्रतीत हो रही थी।

पहली ख़बर आयर्लण्ड से थी, जो बेहद रूढिवादी किस्म का मुल्क रहा है तथा जिसके समाज तथा राजनीति पर हाल हाल तक रोमन कैथोलिक चर्च का दबदबा रहा है, वहां जनमतसंग्रह में मध्ययुगीन ईशनिन्दा कानून को समाप्त करने का निर्णय लिया गया। जनमतसंग्रह में लगभग 65 फीसदी लोगों ने ईशनिन्दा कानून को समाप्त करने की हिमायत की जबकि उसे बनाए रखने के पक्ष में महज 35 फीसदी लोग थे। /2/ध्यान रहे कि इस मुल्क ने कुछ साल पहले ही गर्भपात को तथा समलैंगिक विवाद को कानूनी मान्यता दी है। बहुत कम लोगों को याद होगा कि बमुश्किल छह साल पहले यहां भारतीय मूल की एक डेन्टिस्ट सविता हलप्पानावार को गर्भपात की इजाजत नहीं दी गयी, जबकि उसकी जान को खतरा साफ दिख रहा था, और तर्क यह दिया गया था कि यह एक कैथोलिक मुल्क है, लिहाजा इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके चलते सविता अस्पताल में ही चल बसी थी।

दूसरी ख़बर पाकिस्तान से थी जिसमें पता चला कि पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश साकिब निसार के नेत्रत्व में आसियाबी को – वह ईसाई श्रमिक महिला जिस पर उसके गांववालों ने ईशनिन्दा का आरोप लगाया था /2010/ और उसे नीचली अदालतों ने मौत की सज़ा सुना दी थी – दोषमुक्त साबित किया और रिहा करने का निर्णय लिया। यह मामला राष्टीय अंतरराष्टीय मीडिया में सूर्खियां बटोरा था क्योंकि वह पहली महिला थी जिस पर इस विवादास्पद कानून के तहत आरोप लगाए गए थे। उस पर लगाए गए इन आरोपों का विरोध करने के चलते तथा ईशनिन्दा के मानवद्रोही कानून की समाप्ति की मांग करने के लिए पाकिस्तान के दो अग्रणी राजनेताओं की – पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और उसके केन्द्रीय मंत्राी शाहबाज बटटी – इस्लामिस्टों द्वारा हत्या भी की गयी थी।

हम याद कर सकते हैं कि किस तरह पिछले ही साल पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा के खान अब्दुल वली खान युनिवर्सिटी में पत्राकारिता के छात्रा रहे मशाल खान की उसके सहपाठियों ने ईशनिन्दा के आरोपों के तहत पीट पीट कर हत्या की थी। उन्हीं दिनों लंदन स्थित सेन्टर फार सोशल जस्टिस ने ऐसी हत्याओं के बारे में तथ्य संग्रहित कर बताया था कि किस तरह ‘‘1987 से 2015 के दरमियान, ईशनिन्दा के आरोपों के तहत 62 स्त्राी पुरूषों को मार दिया गया है, जबकि अभी तक राज्य ने किसी को सज़ा नहीं सुनायी है।’’

ईशनिन्दा के नाम पर पाकिस्तान में जिस तरह हिंसा को अंजाम दिया जाता रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं कि आसियाबी के मामले में आया यह फैसला उन सभी लोगों के लिए उम्मीद की किरण की तरह है, जो अधिक समावेशी, मानवीय, बहुलतावादी पाकिस्तान में यकीन रखते हैं। यह भी स्पष्ट है कि इस फैसले का इस्लामिस्टों ने जबरदस्त विरोध किया है और अपनी रैलियों में ऐलान किया है कि आसियाबी को बरी करने वाले न्यायमूर्ति साकिब निसार तथा उनके सहयोगी ‘वाजिब उल कत्ल’ अर्थात ‘हत्या के लायक’ हैं। तयशुदा बात है कि इस्लामिस्ट अतिवाद की चुनौती इतनी आसानी से समाप्त नहीं होने वाली है।

विडम्बना ही है कि ईशनिन्दा कानून किस तरह दुनिया भर में कमजोर तबकों एवं अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस्तेमाल होते आए हैं, किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता के अधिकार को बाधित करता है, यह बात बार बार प्रमाणित होने के बावजूद यह भी देखने में आ रहा है कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में उसके नए हिमायती भी पैदा हो रहे हैं।

पंजाब कैबिनेट द्वारा पिछले दिनों जिस नए बिल पर अपनी मुहर लगायी गयी है, वह इसी की एक झलक है। धार्मिक ग्रंथों की ‘‘अवमानना’’ के लिए उम्र कैद की सज़ा का प्रावधान करने का उसका प्रस्ताव इसी की ताईद करता है। भारत के दंड विधान में सेक्शन 295 एए को जोड़ने के प्रस्ताव पर भी इसमें मुहर लगी है जिसके तहत कहा गया है कि जो कोई ‘‘जनता की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के इरादे से श्री गुरू ग्रंथ साहिब, श्रीमद भगवदगीता, पवित्रा कुराण और पवित्रा बाइबिल की आलोचना करेगा, उसे नुकसान पहुंचाएगा या उनकी अवमानना करेगा’’ उसे उम्र कैद की सज़ा सुनायी जाए।’’

ध्यान रहे भारत के दंड विधान की धारा 295 एक – जिसमें एक पूरा अध्याय ‘‘धर्म से सम्बधित उल्लंघनों’’ को लेकर है वह ‘‘धर्म’’ या ‘‘धार्मिकता’’ को परिभाषित नहीं करता। कहने का तात्पर्य कि पंजाब सरकार का यह कानून जो धार्मिक ‘- जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती – भावनाओं / बहुत धंुधला इलाका/ को आहत करने के नाम पर लोगों को जिन्दगी भर जेलों में डाल सकता है। आहत भावनाओं की यह दुहाई किस तरह मनोरंजन में मुब्तिला व्यक्ति को बुरी तरह प्रताडित करने का रास्ता खोलती है, इसकी मिसाल हम किकू शारदा के मसले में देख चुके हैं। याद रहे बलात्कार के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे रह रहे राम रहिम सिंह की नकल उतारने के बाद उसके अनुयायियों ने किकू के खिलाफ केस दर्ज किया था और प्रताडना का उसका सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक गिरफतारी में चल रहे किकू को बाबा ने ‘‘माफ’’ नहीं किया था @https://www.dailyo.in/variety/blasphemy-law-freedom-of-speech-amrinder-singh-punjab-government-ipc-crpc/story/1/26211.html@

Notes :

  1. https://www.theguardian.com/world/2018/aug/23/woman-jailed-in-indonesia-for-saying-call-to-prayer-too-loud
  2. https://www.theguardian.com/world/2018/oct/27/ireland-votes-to-oust-blasphemy-ban-from-constitution

 

 

 

Tagged with:     , , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in