शिव की नैय्या में रोड़ा है कमल का पंजा – डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

2:25 pm or November 17, 2018
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शिव की नैय्या में रोड़ा है कमल का पंजा

  • डॉ. अर्पण जैन अविचल

राजनीती की दशा और केंद्रीय कद में निर्णायक भूमिका में रहने वाला राज्य मध्यप्रदेश में चुनाव आ चुके है। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव का आरम्भ हो चुका है, जहाँ २३० विधानसभा में कुल 65,341 पोलिंग बूथ पर 5,03,34,260 मतदाता मध्यप्रदेश के भाग्य का फैसला २८ नवम्बर को करने वाले है। और इसी दिन की राह तो ताकने वाला वर्ग मतदाताओं के अतिरिक्त सत्तासीन भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी व सपाक्स भी शामिल है।

आज़ादी के बाद भाजपा को पहली बार मध्यप्रदेश में इतना लम्बा शासनकाल मिला है। परन्तु फिर भी वर्तमान में भाजपा की राजनीती का  हाल एक चौराहे के जैसा होता जा रहा है, जहाँ हर विचारधारा के , चाहे बागी हो चाहे रिश्तेदार हो सब का स्वागत है। परन्तु मतदाता सदा से ही इन्ही १ माह में निर्णायक भूमिका में होने का दम्भ भरता है। और फिर हमेशा की तरह वही मतदाता छला जाता है।

वर्तमान में मध्यप्रदेश सरकार के काम भी इतने प्रभावी नहीं रहे जो मतदाताओं को लुभा सकें, व्यापम, वनरक्षक, डम्पर घोटाले से लेकर किसानों की आत्महत्याएँ, किसानों का आन्दोलन, मंदसौर काण्ड, सूबे के विधायको के बड़बोले बोल, अन्नदाताओं को अपमानित करना, गरीब, मजदूर, दलित और  शोषित वर्ग को दरकिनार कर प्रभुत्वसंपन्नो की सरकार कहलाना, बेटियों का राज्य में सबसे असुरक्षित रहना, आए दिन बेलगाम अफसरशाही का होना, जनमानस के बीच से विकास नाम के मिट्ठू का गायब होना, कृषि की नई तकनीकि सिखाने वाली विदेश यात्राओं में फर्जी किसानों को भेजना, माई  के लाल बनकर एट्रोसिटी एक्ट का समर्थन करना और इसके अतिरिक्त भी हुए कई घोटालों के बावजूद भी सरकार की ओर से राहत तो नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के  तेज तर्रार तेवर से राजधानी की बौखलाहट साफ तौर पर मुखिया के चेहरे पर दिखाई दे रहीं है। रसूखदारों के कामों को करवाने के लिए पूरी अफसरशाही रास्ते पर बैठी है, पर गरीब केवल दफ्तरों के चक्कर लगा-लगा कर ही नीला होता जा रहा है। शिवराज का दम्भ और टिकट वितरण से फैले असंतोष के कारण भी भाजपा के विरोध में मतदाताओं,अफसरशाही, और अपनी ही पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ताओं को खड़ा कर दिया।

वैसे तो शिव का मुकाबला करने में कांग्रेस भी कही न कही गच्चा खा ही रही है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी और टिकट वितरण के लिए किये सर्वे का आधार बने दीपक बावरिया ने भी कांग्रेस की जमीन हिला दी, क्योंकि लगभग ५० प्रतिशत विधानसभा सीटों पर टिकट वितरण के लेकर खूब असंतोष व्यक्त हुआ। कही सिंधिया की बुराई तो कही दिग्गी का विरोध।उसके बाद हुए बागियों की फेहरिस्त ने कांग्रेस को हैरत में डाल दिया था। कही जगह डेमेज कंट्रोल करने में कांग्रेस सफल भी हुई तो कही अंदरूनी कलह परिणाम को प्रभावित करेगा ही। युवा तुर्कों की अवहेलना दोनों ही पार्टियों के लिए मुसीबत बन सकती है। वर्तमान विधानसभा चुनाव में २८ प्रतिशत नए और युवा मतदाता मध्यप्रदेश के भाग्य को चुनेंगे।

चुनाव मैनेजमेंट के सर्वे और तर्कों की बात करे तो ये तय है कि मध्यप्रदेश में शिव की राह में कमलनाथ बड़ा रोड़ा बनेगे। विगत दो चुनावों में खुद की विधानसभा बुधनी में प्रचार के लिए जमीन पर नहीं उतरे ऐसे शिवराज की भी नींद उड़ा दी और अपनी ही विधानसभा में शिवराज के विरोध के स्वर उठने लगे है। मतदाता कभी शिव की पत्नी साधना सिंह को भागते है तो कभी बेटे कार्तिकेय को भला बुरा कहते है। इन्ही के बाद शिव का प्रभाव प्रदेश में कम होता जा रहा है।

मध्यप्रदेश के मतदाताओं का पलटा हुआ नाराज मन किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा कर रहा है। शिवराज का दम्भ भी कही भाजपा के लिए बड़ा रोड़ा न बन जाए। इन्ही सब संदेह और संशय के बीच मध्यप्रदेश में कांग्रेस के कद्दावर नेता और चुनाव के सर्वेसर्वा कमलनाथ के बड़े हुए कद और मतदाताओं की गुड़ लिस्ट में शामिल होने के कारण भी खतरे की तलवार भाजपा के गले पर लटकी नजर आ रही है।

२३० विधानसभाओं के अंदरूनी सर्वे की माने तो परिवर्तन की सुगबुगाहट तो तेज है ही, साथ ही बदलाव को लेकर कांग्रेस की तरफ उम्मीद करके देखने का माद्दा भी बड़ा है। आदिवासियों को हितग्राही भी बनाया पर वो मुख्यमंत्री आवास या प्रधानमंत्री आवास होने के बावजूद भी मतदाताओं को आकर्षित करने में कम सफल हो रहे है।

वैसे तो कई गैर जरुरी मुद्दे मध्यप्रदेश की राजनीती में घर करते जा रहे है। मूलत: यह चुनाव कांग्रेस विरूद्ध मोदी सरकार के कार्यों का ही हो रहा है। कही संघ का शासकीय कार्यालयों में शाखा लगाने पर प्रतिबन्ध लगाने का वचन हो , चाहे किसानों का कर्जा माफ़ करने का झूठा वादा हो, दोनों ही दल किसी तरह से मतदाताओं को लुभा नहीं पा रहे है, परन्तु फिर भी कमलनाथ का उम्मीद भरा व्यक्तित्व और नीतियां मामा शिवराज के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा है। बाकी तो मध्यप्रदेश का भाग्य २८ नवम्बर को ईवीएम मशीन में बंद हो ही जायेगा और मतदाता तो उसे ही चुनेगा जो उसके दिल पर राज कर पाया होगा।

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