मार्क्सवाद की एक अनौपचारिक क्लास “मोहल्ला अस्सी” – वीरेन्द्र जैन

3:12 pm or November 22, 2018
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मार्क्सवाद की एक अनौपचारिक क्लास – मोहल्ला अस्सी

  • वीरेन्द्र जैन

काशीनाथ सिंह हिन्दी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्होंने कभी हंस में धारावाहिक रूप से बनारस के संस्मरण लिखे थे जिनका संकलन ‘काशी के अस्सी’ नाम से प्रकाशित हुआ था। यह पुस्तक मध्य प्रदेश के पाठक मंच में भी खरीदी गयी थी और हजारों लोगों द्वारा पढी व सराही गयी थी। बनारस में सच्चे हिन्दुस्तान के दर्शन होते हैं। कबीरदास की इस नगरी में हिन्दू, मुसलमान, काँग्रेसी, संघी और कम्युनिष्ट वर्षों से एक साथ लोकतांत्रिक रूप से अपने विचारों के हथियारों से लड़ते भिड़ते हुए भी भाई भाई की तरह रहते हैं। जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ। बनारसी साड़ी को बुनने वाले लाखों मुस्लिम मजदूरों के साथ बाबा विश्वनाथ के लाखों भक्त रह कर साथ साथ गंगा स्नान करते हैं। यहाँ विस्मिल्लाह खाँ जैसे प्रसिद्ध शहनाई वादक, तो गुदईं महाराज से लेकर किशन महाराज तक जग प्रसिद्ध तबला वादक व गायक हुये हैं। यहाँ समाजवादी आन्दोलन भी चला और बीएचयू में सभी धाराओं के राजनीतिक विचारों को जगह भी मिली। जितने वामपंथी बुद्धिजीवी अलीगढ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में पैदा हुये उतने ही बनारस हिन्दू यूनीवर्सिटी में भी पैदा हुये, जिन्होंने देश भर को दिशा दी। बनारस ने सभी विचारधाराओं को अपनी चौपाल में जगह दी और वहाँ के चाय के ढाबों में वैसी बहसें हुयीं जैसी अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भी नहीं होती होंगीं। जिसे प्रभु वर्ग [इलीट क्लास] में असभ्य या अश्लील समझा जाता होगा वैसी गालियां यहाँ मुहावरों की तरह प्रयुक्त होती हैं और उनके प्रयोग में लिंग भेद भी बाधा नहीं बनता।

इस फिल्म का कथानक पुस्तक ‘काशी का अस्सी’ के एक अध्याय ‘ पांड़े कौन कुमति तोहि लागी’ से उठाया गया है। इस संस्मरण का काल पिछली सदी के आठवें, नौवें दशक का है जब भाजपा ने संसद में अपनी सदस्य संख्या दो तक सीमित हो जाने के बाद अपने राजनीतिक अभियान को राम जन्म भूमि विवाद के साथ जोड़ दिया था। यह वह काल था जब काशी के पंडों की आमदनी सिकुड़ रही थी और वे जीवन यापन के लिए अपने ही बनाये मूल्यों के साथ समझौता करने के लिए मजबूर हो रहे थे। पप्पू की चाय की दुकान बनारस की वह प्रसिद्ध जगह है जहाँ बैठ कर लोग खूब बहसते हैं और मजाक करते हैं। कथानक केवल इतना है कि गंगा किनारे बसे पंडितों के मुहल्ले में ब्राम्हण सभा का अध्यक्ष धर्मपाल शास्त्री किसी भी पंडे को अपने यहाँ विदेशी किरायेदार नहीं रखने देता क्योंकि उसके अनुसार मांसाहारी होने के कारण वे अपवित्र होते हैं और गन्दगी फैलाते हैं। दूसरी ओर विदेश से बनारस आये हुए पर्यटक अच्छा किराया देते हैं। वैकल्पिक रूप से स्थानीय मल्लाह, नाई आदि अपने घर की कोठरियां किराये से देकर अच्छी कमाई कर रहे होते हैं और अपने सुधरे रहन सहन से ब्राम्हणों के श्रेष्ठता बोध को चुनौती देने लगते हैं। मार्क्सवाद के अनुसार समाज का मूल ढांचा अर्थ व्यवस्था बनाती है व उसी के अनुसार व्यक्ति की संस्कृति अर्थात सुपर स्ट्रेक्चर तय होता है। जब कथा नायक आर्थिक तंगी से जूझता है तो वह अपने घर में स्थापित शिव जी की कोठरी को विदेशी किरायेदार को देने को मजबूर हो जाता है और रात्रि में शिवजी के सपने में आकर आदेश देने का बहाना बना कर उन्हें गंगा में विसर्जित कर देता है। उससे प्रेरणा पाकर उस मुहल्ले के सभी पंडे अपने अपने घरों में स्थापित शिव मूर्तियों को अन्यत्र स्थापित कर खाली हुयी कोठरियों को विदेशी पर्यटकों को किराये से देने लगते हैं। इकानामिक स्ट्रक्चर, सुपर स्ट्रक्चर को बदल देता है। दूसरी तरफ चाय की दुकान में बैठे बुद्धिजीवी इन्हीं विषयों पर लम्बी लम्बी चर्चायें चलाते हैं। इसे देख कर फिल्म पार्टी की याद आ जाती है। एक पात्र कहता है 1992 के बाद जितने मुसलमान नमाज पढने जाने लगे और टोपियां लगाने लगे उतने पहले कभी नहीं जाते थे। दोनों तरफ से घेटो बनने लगे। रामजन्म भूमि पर भी अच्छी बहस सामने आयी।

वहीं नाई का काम करने वाला एक युवा एक अमेरिकन युवती को घुमाते घुमाते व्यवहारिक ज्ञान अर्जित कर लेता है व थोड़ा सा योग सीख कर उसके साथ अमेरिका भाग जाता है। वह वहाँ से बारबर बाबा बन कर लौटता है। वह अपने पुराने सहयोगियों को बताता है कि दुनिया एक बाज़ार है, जिसमें वह योग बेचने लगा है। कभी बनारस को रांड़, सांड़, सीढी, सन्यासी से याद किया जाता था किंतु अब फिल्म में किरायेदारी की दलाली करने वाला एक ब्रोकर कहता है कि “अस्सी-भदैनी में ऐसा कोई भी घर नहीं जिसमें पंडे, पुरोहित, और पंचांग न हों और ऐसी कोई गली नहीं जिसमें कूड़ा, कुत्ते और किरायेदार न हों”।

फिल्म के मुख्य किरदार धर्मपाल शास्त्री [पांडे] की भूमिका सनी देवल ने निभायी है तो उनकी पत्नी की भूमिका साक्षी तंवर ने निभायी है। गाइड कम ब्रोकर की भूमिका भोजपुरी फिल्मों के नायक रवि किशन की है तो सौरभ शुक्ला आदि की भी भूमिकाएं हैं। बुद्धिजीवी गया सिंह की भूमिका उन्होंने खुद ही निभायी है। सनी देवल ने अच्छा अभिनय किया है किंतु उनकी भूमिका के अनुरूप उनका चयन ठीक नहीं था वे धुले पुछे बाहरी व्यक्ति ही लगते रहे जबकि साक्षी तंवर और सौरभ शुक्ला ने अपने को बनारसी रंग ढंग में ढाल लिया था। फिल्म में कहानी और घटनाक्रम देखने के अभ्यस्त दर्शकों को लम्बे लम्बे डायलाग वाली राजनीतिक बहस पसन्द नहीं आयेगी। पर वह ज्ञनवर्धक है।

इस फिल्म की दो अन्य उपलब्धियां सेंसर बोर्ड के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का 36 पेज का फैसला और साहित्यिक संस्मरणों पर फिल्म बनने की शुरुआत होना भी है। उम्मीद की जाना चहिए कि दूसरे निर्माता निर्देशक भी साहस करेंगे।

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