किसान अपने आंसुओं में डूब रहे हैं

2:29 pm or December 5, 2018
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किसान अपने आंसुओं में डूब रहे हैं

  • अलका गंगवार

भारत के कृषक आजकल सबसे बुरे दिनों से गुजर रहें हैं। कृषक के प्याज से किसान की व्यथा दिल और दिमाग झकझोर कर देने वाली है । नासिक हो या सीकर जब किसान मंडी में अपने प्याज को लेकर जाता है तो उसकी कीमत मात्र 01 रूपये प्रति किलो मिलती है, जबकि वही प्याज दिल्ली जैसे महानगर से लेकर कस्बे तक में 18-25 रूपये प्रति किलो में खुदरा बाजार में बिक रहा है। यहॉ सवाल यह है कि फसल उगाने वाला किसान अन्नदाता जहॉ अपनी फसल की लागत से भी कम पर बेचने के लिये मजबूर है वहीं बिचौलिये केवल भण्डारण और परिवहन की सेवाओं के लिये 18-20 गुना मुनाफा कमा रहे हैं। क्या यह पूंजीगत बाजार के स्वभाव के कारण है या यह एक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था की लूट का नगन परिदृश्य है।

अर्थशास्त्र की साधारण समझ यह बताती है कि किसी भी चीज का मूल्य उसकी मांग व उपलब्धत्ता से सुनिश्चित होता है, यानि यदि किसी चीज की मांग बाजार में अधिक है और उसकी उपलब्धत्ता कम है तो उसके मूल्य और बढेगे और यदि मांग कम है और उपलब्धत्ता अधिक है तो मूल्य घटेंगे। उपभोक्ता जिस अधिकत्तम व न्यून मूल्य पर किसी चीज/उत्पादन को खरीदने को तैयार है, उसी आधार पर उत्पादक कीमत एवं बिचौलियों का मुनाफा तय होता है। उत्पादनकर्ता को जो मूल्य मिलता है वह यदि उसके उत्पादन लागत से अधिक होगा और यदि वह उत्पादन लागत से कम हो जाये तो उत्पादककर्त्‍ता उत्पादन प्रक्रिया बंद कर देगा या उसमें संशोधन व विचलन करेगा ताकि उसकी उत्पादन लागत कम हो। यदि वह ऐसा नहीं करने में सक्षम है तो उस वस्तु का उत्पादन बंद कर अन्य किसी गतिविधि में लग जायेगा जो उसके लिये लाभकारी हो। लेकिन किसानों के संदर्भ में अर्थशास्त्र के यह सिद्धान्त उसी प्रकार से प्रभावी नहीं है जैसे अन्य उत्पादक प्रक्रिया में प्रभावी है। किसान व उपभोक्ता के बीच एक सशक्त मध्यस्थ समूह है जो शासन व कुलीनतम से सांठ-गाठ इस अर्थशास्त्र की स्वाभाविक गति को अवरोधित कर देते है और बाजार की शक्तियों की जगह धर्म व राजनीति के लुटेरे इस पर कब्जा कर लेते हैं। भारत में यह समस्या अधिक गंभीर व जटिल है। इस देश में संविधान व कानून से इतर धर्म की सत्ता व सवर्ण वर्ग की हिन्दू चेतना जो सभी आर्थिक, राजनीतिक व संवैधानिक संस्थाओं पर अपना वर्चस्व बना कर रखी है, ऐसा परिदृश्य उत्पन्न करती है की न तो किसान को समझ में आता है कि कौन सी ताकतें हैं जो उसे उत्पादन कीमत से कम पर फसल बेचने के लिये मजबूर कर देती हैं और न ही उपभोक्ता को ही वह किसान को प्राप्त मूल्य से 20-25 गुना अधिक मूल्य पर चीज उपलब्ध होती है।

बाजार की ताकत यदि स्वतंत्र/आंशिक स्वतंत्रता से संचालित हो रही होती तो जो मूल्य उपभोक्ता दे रहा है उसे किसान को प्राप्त मूल्य अधिक से अधिक 100-150 प्रतिशत ही होना चाहिये न कि 2000 प्रतिशत, अगर इसे दूसरे सिरे से देखें तो किसान को प्राप्त मूल्य से 1 या 1.5 गुना अधिक ही उपभोक्ता को चुकाना चाहिये, लेकिन वर्तमान में हालात यह हैं कि जहां एक और उपभोक्ता को 24 गुना अधिक मूल्य चुकाना पड़ रहा है वहीं किसान अपनी लागत से 06 गुना कम पर फसल बेच रहा है। यह शुद्ध हिन्दू राष्ट्र के अन्दर सामन्तवादी धार्मिक लूट है जहां राज्य अपनी ताकत का इस्तमाल किसानों के खिलाफ कर रहा है ताकि बिचौलियों को 24-30 गुना अधिक का लाभ फसलों के व्यापार को हो। अनुमान लगायें तो आकड़ें चैकाने वाले होंगे। यदि व्यापारी 1000 करोड़ का प्याज 01 प्रति किलो से किसानों से खरीदे और 18-20 रूपये प्रतिकिलो के हिसाब से खुदरा बाजार में बेच दे तो वह दो या तीन माह में ही 18000 करोड़ कमा लेगा। इस प्रकार उसका मुनाफा 17000 करोड़ होगा तो उसकी पूंजी का 1020 प्रतिशत होगा। ऐसी लूट सिर्फ हिन्दू राज्य में ही हो सकती है और इसके खिलाफ बुद्धिजीवियों का मौन भी हिन्दू राज्य की स्वीकारोक्ति होगी।

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