पवित्र गाय, त्याज्य लोग ! गाय के नाम पर हिंसा को वैधता प्रदान करने का सिलसिला कब तक ? -सुभाष गाताडे

1:11 pm or December 10, 2018
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पवित्र गाय, त्याज्य लोग !

गाय के नाम पर हिंसा को वैधता प्रदान करने का सिलसिला कब तक ?

सुभाष गाताडे

कभी कभी एक अदद वक्तव्य किसी नेता की एकमात्रा निशानी बन कर रह जाती है। विश्व हिन्दू परिषद के नेता गिरिराज किशोर इसका क्लासिकीय उदाहरण कहे जा सकते हैं जिनका नाम लेने पर अक्सर उनका विवादित वक्तव्य ही लोगों की जुबां पर आ जाता है। याद है कि उन्होंने कहा था कि ‘‘पुराणों में गाय को मनुष्य से अधिक पवित्रा समझा गया है।’’

वह अवसर बेहद शोकाकुल करनेवाला था, जब उनका वह वक्तव्य आया था। दिल्ली से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर दुलीना नामक स्थान पर पांच दलितों की भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी – जब वह मरी हुई गायों को ले जा रहे थे – यह हत्या दुलीना, जिला झज्जर के पुलिस स्टेशन के सामने हुई थी, जहां जिला तथा पुलिस प्रशासन के कई आला अफसर भी मौजूद थे, जो मूकदर्शक बने थे। /अक्तूबर 2002 – ी http://pudr.org/content/dalit-lynching-dulina-cow-protection-caste-and-communalism    /

जनाब गिरिराज किशोर चन्द साल पहले गुजर गए अलबत्ता दुनिया को देखने का उनका यह नज़रिया जिसमें मानवीय जीवन के प्रति गहरी असम्वेदनशीलता और असम्प्रक्तता टपकती है और जो एक चतुष्पाद को वरणीय/पूजनीय बनाती है, आज उरूज पर है।

योगी आदित्यनाथ, जो महंथ से सियासतदां बने हैं तथा फिलवक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी हैं, उनके हालिया वक्तव्यों ने उजागर किया कि वह इसी नज़रिये के मजबूत प्रवक्ता हैं। बुलन्दशहर की हिंसा की घटनाओं पर उनकी पूरी खामोशी – जिसमें यूपी पुलिस का एक जांबाज पुलिस अफसर मारा गया था, जो अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता था – जिसके लिए कथित तौर हिन्दुत्व अतिवादियों को जिम्मेदार समझा जा रहा है, उसने बहुत कुछ बयां किया। इतनाही नहीं घटनास्थल के खेतों में पाए गए गोवंश के अंश के बारे में, जो हिंसा का बहाना बने थे, उनका प्रचण्ड सरोकार और अपने पुलिस अधिकारियों को उनके द्वारा दिया गया आदेश कि वह गोवंश की हत्या में संलिप्त लोगों को पकड़े दरअसल इसी बात की ताईद करता है।

पुलिस अफसर की इस मॉब लिंचिंग पर उनकी खामोशी को लेकर जब हंगामा मचा तथा विपक्षी पार्टी और नागरिक समाज के कर्णधारों ने उनके इस मौन की तीखी आलोचना की तब उनके कार्यालय ने दूसरा वक्तव्य जारी किया जिसमें सुबोध कुमार सिंह की मौत का जिक्र था और उनके परिवारजनों को वित्तीय सहायता देने का वायदा था।

कहा जा रहा है कि इन दोनों वक्तव्यों में कुछ घंटों का अन्तराल था।

आखिर एक पुलिसकर्मी की डयूटी के दौरान हत्या पर समवेदना प्रगट करने में और भीड़ की हिंसा की आलोचना करने में इतना वक्त क्यों लगा ?

एक महंथ के तौर पर योगी आदित्यनाथ मनुष्य की तुलना में गाय को वरीयता दे सकते हैं या उनकी आस्था उन्हें जो करने के लिए कहें उसका अनुसरण करते रह सकते हैं, मगर एक दफा मुख्यमंत्राी पद पर आसीन होने के बाद आप को संवैधानिक मान्यताओं का मानना ही पड़ता है, जो संविधान के सामने सबकी बराबरी की बात करता है। क्या वह यह बुनियादी सिद्धांत भूल चुके हैं या इसे चुनिन्दा स्म्रतिलोप की निशानी कहा जा सकता है ?

या यह इस वजह से हुआ क्योंकि सुबोध कुमार सिंह, वही पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने दादरी के अख़लाक की भीड़ द्वारा की गयी हत्या /अक्तूबा 2015/की जांच की थी और उनके घायल बेटे को तत्काल अस्पताल पहुंचाया था और तमाम दबावों को झेलते हुए 26 लोगों को खिलाफ केस दर्ज किया था, जिनमें से कई हिन्दुत्ववादी संगठनों से सम्बद्ध बताए जाते हैं। और उपरी दबाव के चलते उनका तबादला नहीं हुआ होता तो वह मामले को निश्चित ही सिरे तक ले जाते, मगर दो माह के अन्तराल में उनका तबादला किया गया और केस को उतना मजबूत नहीं रखा गया। इसका नतीजा यह हुआ था कि सारे के सारे अभियुक्त जमानत पर बाहर आ सके थे।

या यह इस वजह से हुआ क्योंकि अपराध को लेकर उनका कर्तव्यनिष्ठा का यह रवैया ही सत्ताधारी पार्टी के बीच बेचैनी का सबब बना था जिनके स्थानीय नेताओं ने स्थानीय सांसद भोला सिंह को बाकायदा पत्रा लिख कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया था कि वह ‘‘हिन्दुओं के धार्मिक कार्यों में’’ दखल देते हैं। / देखें, द टेलिग्राफ, 8 दिसम्बर 2018 या एनडीटीवी प्राइम टाईम, 5 दिसम्बर 2018/

उनकी पत्नी ने भी संवाददाताओं को बताया है कि किस तरह उन्हें धमकियां मिलती थीं, जिन्हें वह अपने फोन में ही रेकार्ड करते थे। उनकी हत्या के बाद इस मोबाइल को भी गायब कर दिया गया है।

हम याद कर सकते हैं कि जब गोहत्या पर पाबन्दी का प्रस्ताव विचाराधीन था और उसे अलग अलग राज्यों में पारित करने की योजना की रूपरेखा बन रही थी तब दो जरूरी सवाल उठाए गए थे:

एक, इस पाबन्दी से व्यापक जनता के सस्ते प्रोटीन आहार पर होनेवाला नकारात्मक असर। मालूम हो कि दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और ईसाइयों के लिए बीफ सस्ते प्रोटीन का एकमात्रा स्त्रोत रहता आया है क्योंकि वह गोश्त और मटन की तुलना में तीन गुना सस्ता पड़ता है और लोगों की खाने पीने की पारम्पारिक आदतों का हिस्सा रहा है। उसी वक्त यह बात रेखांकित की गयी थी कि भारत में मीट की खपत दुनिया में सबसे कम स्तर पर है। संयुक्त राष्ट संघ से सम्बद्ध संस्था ‘फुड एण्ड एग्रिकल्चर आर्गनायजेशन’ की 2007 की रिपोर्ट के मुताबिक, 177 मुल्कों की फेहरिस्त में मीट उपभोग में भारत सबसे नीचली पायदान पर है।

हम जानते हैं कि पाबन्दी पर सख्ती से अमल करने के उन्माद में सत्ताधारी जमातों ने इस बात पर विचार तक नहीं किया था कि व्यापक जनता के प्रोटीन आहार में जो कमी आएगी, उसे पूरा करने का वैकल्पिक रास्ता क्या होगा।

दूसरा सवाल ऐसे बैलों और भैंसों और गायों की देखरेख का था जिनकी किसानों के लिए उपयुक्तता समाप्त हो चुकी है। यह बात सामने लायी जा रही थी कि ऐसे मुल्क में जो आज लोगों की बुनियादी भूख की चुनौती को पूरा करने से कोसों दूर है, वहां यह बोझ किसानों पर ही आएगा, जो उन्हें और गरीब बनाएगा।

देश के अलग अलग भागों से आ रही रिपोर्टें इस बात की ताईद करती हैं कि आवारा गायों और उसके वंशजों की बढ़ती संख्या का सीधा ताल्लुक गोहत्या पर पाबन्दी के फैसले से तथा उनके मालिकों की उन्हें खिलाने की नाकामयाबी से जुड़ा है।

(https://hindi.theprint.in/india/uttar-pradesh-cow-maverick-animal-farmers-crop/34541) मोटे अनुमान के तौर पर एक गाय की एक दिन की देखरेख में 90 से 100 रूपए लग जाते हैं। न केवल इसका विपरीत असर उन संसाधनों के – घास, पानी आदि – की आपूर्ति पर पड़ता है, जो लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके पहले जब गोहत्या पाबन्दी के कानून नहीं बने थे, तब एक किसान अपने अनुत्पादक जानवर को मांस के व्यापारी को बेच सकता था और जिससे उन्हें पांच से दस हजार रूपए मिल सकते थे। आज वह मुमकिन नहीं है:

शहरों और गांवों में आवारा गायों की बढ़ती संख्या और उनके द्वारा फसलों को नष्ट करने या दुर्घटनाओं को जन्म देने का मसला अब गांव नहीं शहर में भी चिन्ता का विषय बन गया है। ; ी ( https://indianexpress.com/article/india/madhya-pradesh-anti-cow-slaughter-act-gau-rakshaks-4784282/)  एक बेहद मोटे अनुमान के हिसाब से मुल्क में लगभग 50 लाख आवारा गायें हैं।  (https://www.washingtonpost.com/world/2018/07/16/amp-stories/why-india-has-million-stray-cows-roaming-country )    इंडियन एक्स्प्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार

‘‘रेल की पटरियों तथा सड़कों पर दुर्घटनाओं के चलते गायों की मौत की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यह सभी ऐसी गायें होती हैं जो दूध देना बन्द करने के बाद आवारा घुमती हैं। वह देसी नस्ल की होती हैं। और यह मसला आनेवाले दिनों में बढ़नेवाला ही हैं। उन्होंने पूछा क्या ‘‘इसे गोहत्या नहीं कहा जाना चाहिए ?’’

; ी( https://indianexpress.com/article/india/cattle-dying-on-tracks-numbers-double-in-one-year-5325031)

यह बात बहुत कम चर्चित है कि किस तरह ऐसी आवारा गाएं जो दुर्घटना का शिकार होती हैं , वह आम लोगों के लिए भी प्राणघातक साबित होती हैं। पंजाब के अधिकारियों के मुताबिक दुर्घटनाओं में फंसी गायों ने विगत ढाई साल में 300 लोगों की मौत हुई है। और यह सब एक राज्य के आंकड़े हैं।

एक तीसरा मुददा जो इधर बीच अधिक सूर्खियों में आया है – उसका ताल्लुक गाय के नाम पर हो रही हत्याओं से है।

‘इंडियास्पेण्ड’’ ने गाय से जुड़ी हिंसा पर अध्ययन किया है और इस बात को उजागर किया है कि किस तरह केन्द्र तथा कई राज्यों में भाजपाशासित सरकारों के गठन के बाद ऐसी मौतों में उछाल आया है।   gSA  ( https://lynch.factchecker.in/)    वर्ष 2012 और 2013 में जहां गोहत्या के नाम पर एक व्यक्ति की भी जान नहीं ली गयी थी जबिकि 2014 के बाद ऐसी हिंसक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं और वर्ष 2015 के बाद से हर साल औसतन दस व्यक्ति गाय के नाम पर मारे गए हैं।

बढ़ती ंिहंसा के साथ गोरक्षा के नाम पर खड़े उग्र समूहों की कारगुजारियां भी सूर्खियों में हैं, जिन पर असामाजिक गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप लगे हैं। बुलन्दशहर में पुलिस अफसर की भीड़ द्वारा हत्या इसी सिलसिले की एक कड़ी है।

मिसाल के तौर पर हयूमन राइटस वॉच ने गोरक्षा के नाम पर बने एक नेटवर्क ‘‘भारतीय गोरक्षा दल’’ के नुमाइन्दे से बात की थी। बात में पाया गया कि 2012 में पंजीक्रत इस संगठन के साथ देश भर के पचास से अधिक समूह जुड़े हैं और उनके साथ दस हजार से अधिक स्वयंसेवक हैं जिनकी हर राज्य में उपस्थिति है। (https://www.hrw.org/news/2017/04/27/india-cow-protection-spurs-vigilante-violence; http://sacw.net/article13237.html)

यह पूछना समीचीन होगा कि क्या वाकई यह समूह गाय के कल्याण के प्रति सरोकार रखते हैं या यह समाजविरोधी तत्वों के जमावड़े हैं, जिन्हें हुकूमत में बैठे लोगों ने वैधता प्रदान की है।

अगर हम ‘इंडिया टुडे’ द्वारा किए गए एक स्टिंग आपरेशन को देखें जिसमें उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा के दो ऐसे बड़े संगठित समूहों पर फोकस किया गया था, तो उनकी कार्यप्रणाली और पुलिस के साथ उनकी सांठंगांठ साफ सामने आती है। समूह द्वारा डाले जाने वाले ‘‘छापों’’ के बारे में उन्होंने कैमरे पर बताया था कि वह रोड ब्लॉक कर देते हैं,  वाहनों से मवेशी हासिल करने के लिए धमकियों, हिंसा का इस्तेमाल करते हैं और उन जानवरों को आपस में ही बांट देते हैं। उसके संगठनकर्ता ने यह भी बताया था कि इसमें शामिल रहनेवालों के लिए थोड़ा बहुत प्रशिक्षण भी दिया जाता है ताकि ‘‘गोतस्कर’’ पर प्राणघातक हमले किस तरह कर सकें, उनकी हडिडयां तोडी जाएं मगर सिर को बचाया जाए, यह सीखा जा सके, जिससे गिरफतारी न हो सके। यह अकारण नहीं था कि उनके दस्ते के किसी भी सदस्य पर छह राज्यों में एक भी केस दर्ज नहीं हुआ था। वे भले ही अपने आप को ‘गायों के मुक्तिदाता’ कहें मगर इंडिया टुडे के टेप पर उन्होंने इस बात को कबूला था कि उनके गैंग पवित्र जानवरों के डाकू हैं जो हाइवे पर सक्रिय रहते हैं।

(http://indiatoday.intoday.in/story/cow-vigilante-gaurakshak-attacks-india-today/1/934085.html)

दो साल पहले जब उना आन्दोलन अपने उरूज पर था – जब मरी हुई गाय को छीलने के आरोप में दलितों पर हमला हुआ था – जिसने व्यापक प्रतिक्रिया को जन्म दिया था तब गुजरात के तत्कालीन मुख्य सचिव जी आर ग्लोरिया ने एक राष्टीय अख़बार को बताया था:

‘‘यह स्वयंभू गोरक्षक वास्तविकता में गुंडे हैं।’ उनके मुताबिक गुजरात में 200 से अधिक ऐसे गोरक्षक समूह हैं जो ‘अपनी आक्रामकता के कारण कानून एवं व्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। और सरकार उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है।’ मुख्य सचिव ने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि नीचले स्तर के पुलिस अधिकारियों की इनके साथ सांठगांठ रहती है।(http://www.thehindu.com/news/national/other-states/vigilantes-are-the-new-security-threat/article8882354.ece)

ेया हम तेलंगाणा की विगत विधानसभा के भाजपा के विधायक राजा सिंह को देख सकते हैं – जो अपने उग्र वक्तव्यों के लिए जाने जाते हैं।उना आन्दोलन के दिनों में ही उनका यह वक्तव्य चर्चित हुआ था:

ऐसे दलित जो मरी हुई गायों के साथ या गाय के मांस के साथ पाए जाते हैं उन्हें पीटा ही जाना चाहिए … ‘‘जो दलित गाय के मांस को ले जा रहा था, जो उसकी पीटाई हुई है, वो बहुत ही अच्छी हुई है।’’ फेसबुक पर साझा किए वीडिओ में सिंह ने यह बात कही थी।

(https://scroll.in/latest/812903/anyone-who-kills-cows-deserves-to-be-beaten-says-bjp-mla-raja-)

रेखांकित करनेवाली बात थी दलितों को दी गयी खुलेआम धमकियों को लेकर काफी हंगामा मचा, मगर भाजपा के राज्य नेत्रत्व ने या उनके केन्द्रीय नेत्रत्व ने इस पूरे मसले की अनदेखी कर यही बताया कि वह क्या सोचते हैं ।

यही वह वक्त़ था जब हिन्दुत्व विचारों की वाहक एक पत्रिका में लेखक ने उना प्रसंग में दलितों की पीटाई को उसी अन्दाज़ में औचित्य प्रदान किया जैसी बात गिरिराज किशोर ने की थी। और यही प्रमाणित किया था कि गिरिराज किशोर गुजर गए हों, मगर हिन्दुत्ववादी जमातों में उपर से नीचे तक वही मानवद्रोही चिन्तन हावी है।

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