दिग्विजय सिंह बने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत के असल शिल्पकार – योगेन्द्र सिंह परिहार

3:47 pm or December 12, 2018
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दिग्विजय सिंह बने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत के असल शिल्पकार

योगेन्द्र सिंह परिहार
मैं धर्म परायण व्यक्ति हूँ और धार्मिक मान्यताओं को शिद्दत के साथ मानता हूँ। हम नर्मदा जी के क्षेत्र के लोग हैं और यहां ये मान्यता है कि नर्मदा जी सिद्धिदात्री हैं उनके दर्शन मात्र से कल्याण हो जाता है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी ने वर्ष 2017 के सितंबर माह में लगभग 3300 किलोमीटर की नर्मदा जी की पैदल परिक्रमा का संकल्प लिया और लगभग 6 महीने में कठिन और दुर्गम रास्तों से होकर परिक्रमा पूरी की। लोगों ने परिक्रमा के शुरुआती दिनों में कहा कि राजा साहब की परिक्रमा का विचार राजनैतिक है। धीरे धीरे जब परिक्रमा दिनों-दिन बढ़ती गई और जब वास्तविकता सामने आई कि पैदल परिक्रमा करना न सिर्फ कठिन है बल्कि नर्मदा जी की कृपा और पूर्वजों के पुण्य-प्रताप के बल पर ही इतनी बड़ी परिक्रमा करना संभव हो सकता है। परिक्रमा के चलते-चलते लोगों के विचार बदल भी गए और लोग दिग्विजय सिंह जी की दृढ़ता और संकल्प बद्धता के कायल भी हो गए। जिन नर्मदा जी के एक बार दर्शन मात्र से उद्धार हो जाता है उन माँ नर्मदा जी की 6 महीने लगातार पैदल परिक्रमा करना, उन्हें दिन में कइयों बार देखना-पूजना ये किसी तपस्या से कम नही था। इस तपस्या के फल के बारे में अनुमान लगाना कल्पना से भी परे है।
लोग कुछ भी कहे कोई भी मनगढ़ंत बात कहें कि दिग्विजय सिंह जी द्वारा की गई परिक्रमा राजनीति से प्रेरित थी लेकिन मैं ये मानता हूँ कि “तुलसी अपने राम को रीझ भझो या खीझ, खेत पड़े को ऊपजे उल्टो सीधो बीज”। अर्थात आप अपने भगवान को कैसे भी भजो, उठते-बैठते, सोते-जागते कैसे भी, उसका फल निश्चित तौर पर वैसे ही मिलता है जैसे किसान अपने खेत में उल्टा-सीधा बीज फेंक देता है और परिणाम स्वरूप उसे अच्छी उपज मिल जाती है। इसी तरह किसी भी संकल्प या उद्देश्य के साथ की गई नर्मदा परिक्रमा का फल मिलना निश्चित था और वो भी कंपकंपाने वाली कड़कड़ाती ठंड और झुलसा देने वाली भीषण गर्मी में की गई नर्मदा जी की पैदल परिक्रमा का अभीष्ट फल मिलकर रहेगा इसका मुझे यकीन था। इस परिक्रमा में एक बात और गौर करने लायक थी कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ का पूजन व अभिषेक सबसे ज्यादा फलदायक किसी नदी के किनारे बने शिवालय में होता है। दिग्विजय सिंह जी को ये सौभाग्य मिला कि उन्होंने पूरी परिक्रमा के दौरान नर्मदा जी के किनारे पर स्थित लगभग सभी शिव मंदिरों में भोलेनाथ का पूजन व अभिषेक निरंतर 6 महीनों तक किया। आप अनुमान लगाइए कि एक सनातन धर्मी वर्ष में एक बार शिव जी का अभिषेक करता है इस उद्देश्य के साथ कि साल भर महाकाल उसकी रक्षा करेंगे। तो फिर 6 महीनों में किसी न किसी दिन शिव पूजन करने का क्या फल हो सकता है इसके बारे में कोई वेदपाठी तपोनिष्ठ ब्राह्मण ही विस्तार से बता सकता है। वेद प्रामाणित वाक्य है “विश्वासम् फल दायकम”। नर्मदा जी की परिक्रमा के दौरान दिग्विजय सिंह जी के मन मे सबसे बड़ी यदि कोई मनोकामना रही होगी तो सिर्फ एक कि वे मध्यप्रदेश में एक बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनते देखें। मेरा ये दृढ़ विश्वास है तपस्या के फल के रूप में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनना तब ही तय हो गया था जब दिग्विजय सिंह जी ने नर्मदा परिक्रमा पूरी की थी। मेरा ऐसा मानना ही भोलेनाथ और नर्मदा जी पर असीम आस्था और विश्वास का प्रतीक है।
दिग्विजय सिंह जी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं उन्हें समझ पाना मुश्किल है क्यूंकि जिस वक्त वे नर्मदा परिक्रमा का अनुष्ठान कर रहे थे उसी दौरान उन्होंने नर्मदा किनारे के क्षेत्रों की नब्ज को भांप लिया था जब वहां के निवासियों ने दिग्विजय सिंह जी के सामने भाजपा सरकार की पोल खोलना शुरू की थी। जनता जिस तरह से सरकार के खिलाफ मुखर हो रही थी उसी वक़्त दिग्विजय सिंह जी ने ये अनुमान लगा लिया था कि मध्यप्रदेश में अब कांग्रेस की सरकार बनाने का समय आ गया है। उनकी पारखी नज़रों ने ये भी जान लिया था कि उन क्षेत्रों में किसे चुनाव लड़ाया जाए जिससे कांग्रेस को जीत हासिल हो सके। उसी दौरान दिग्विजय सिंह जी के मुख से जनता से कहते हुए अक्सर ये बात सुनने को मिल जाती थी कि चिंता मत करो हमारी सरकार बन रही है हम सब ठीक कर देंगे। वे मानते होंगे या नही लेकिन मैं मानता हूँ ये विश्वास उन्हें नर्मदा जी ने ही दिया।
नर्मदा परिक्रमा के तुरंत बाद दिग्गी राजा ने कांग्रेस के लिए अपना दायित्व खुद चुना और प्रदेश कांग्रेस के समन्वय की बड़ी जिम्मेदारी हाथ में ले ली। जहां नर्मदा परिक्रमा के दौरान उन्होंने 100 से अधिक विधानसभाओं को नजदीक से देखा और वहां के ग्रामीण जनों से खुलकर हर विषय पर चर्चा की तो वहीं समन्वय समिति की एकता यात्रा के दौरान 190 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में दौरे कर करीब डेढ़ लाख कार्यकर्ताओं की बातें सुनी और उन क्षेत्रों के छोटे-बड़े नेताओं के साथ वन टू वन चर्चा भी की। समन्वय यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह जी ने मध्यप्रदेश के करीब एक लाख कार्यकर्ताओं के साथ ज़मीन पर बैठकर पंगत में संगत की। उन्होंने कार्यकर्ताओं को पंगत के दौरान ये सौगंध दिला दी कि सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करें। इसी समन्वय का कमाल था कि जिस कांग्रेस के मामले में एक मिथ बन गया था कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है वो मिथ टूट गया और कांग्रेसी एक जुट होकर चुनावी समर में कूदने के लिए प्रतिबद्धता के साथ उठ खड़े हुए।
एक ओर दिग्विजय सिंह जी पहले भी इस बात से जाने जाते थे कि वे समूचे मध्यप्रदेश के कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़े हैं वहीं दूसरी ओर नर्मदा परिक्रमा व एकता यात्रा के बाद नए युवा कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ और मजबूत हो गई। मध्यप्रदेश की नस-नस को पहचानने वाले दिग्विजय सिंह जी को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल किया और टिकिट वितरण के लिए लगभग सभी सीटों पर न सिर्फ उनसे राय ली गई बल्कि उनके साथ विश्लेषणात्मक मशविरा भी किया गया। कमलनाथ जी ने भी दिग्विजय सिंह जी पर पूरा भरोसा जताया और उन्हें चुनावी रणनीति बनाने के लिए व अनुभवी सुझावों के लिए मैनिफेस्टो कमेटी में शामिल कर लिया। कांग्रेस के अविश्वसनीय सामंजस्य से 95 प्रतिशत टिकिट वितरण का काम सही हो गया और चुनावी मैदान में न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरी क्षेत्रों की विधानसभाओं में कांग्रेस ने भाजपा को जबरदस्त टक्कर दे दी। वहीं राहुल गांधी जी ने अरुण यादव जी को बुधनी से चुनाव लड़ाकर समूचे प्रदेश में ये स्पष्ट संकेत दे दिया कि हम भाजपा को न सिर्फ हराना चाहते हैं बल्कि साम्प्रदायिक ताकतों को जड़-मूल से उखाड़ने की भी वास्तविक मंशा रखते हैं।
टिकिट वितरण के बाद किसी भी दल की सबसे बड़ी लड़ाई होती है अपने असंतुष्ट रूठे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाना और इस काम के लिए स्वयं दिग्विजय सिंह जी जिम्मेदारी के साथ आगे आये। कार्यकर्ताओं में पैठ से वे 80 प्रतिशत रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने में सफल हो गए और वहीं बीजेपी का एक भी बड़ा नेता अपने बागियों को मनाने में सफल नही हो पाया। आपसी मनमुटाव दूर होते ही कार्यकर्ताओं में जीतने की भावना बलवती हो गई और उनके एकजुट होकर चुनाव लड़ने की वजह से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
भारतीय जनता पार्टी की पूरी लड़ाई विकास के मुद्दों से हटकर सिर्फ इसी बात पर केंद्रित रही कि कांग्रेस के बड़े नेताओं में फूट है जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा लेकिन कांग्रेस के संगठित नेताओं को बीजेपी लक्ष्य से एक इंच भी डिगा न सकी। भाजपा नेताओं और खासकर शिवराजसिंह चौहान ने चुनाव को भाजपा बनाम दिग्विजय सिंह बनाने के भरसक प्रयास किये लेकिन हर बार शिवराज को मुंह की खानी पड़ी। यहाँ तक कि ये बातें फैला दी गईं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जी और दिग्विजय सिंह जी में किन्ही सीटों को लेकर विवाद हो गया है। चूंकि ये बात झूठी थी इसीलिए ज्यादा दिन तक नही चल पाई और स्वयं दिग्विजय सिंह जी ने मीडिया से चर्चा करते वक़्त कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मेरे बेटे जैसे हैं, विवाद की सभी खबरें झूठी और निराधार हैं। दिग्विजय सिंह जी तटस्थ थे इसीलिए वे पूरे समय पर्दे के पीछे रहे और मेरे समझ में ये उसी रणनीति का हिस्सा था कि हर बैनर-पोस्टरों से उनकी फोटो को दूर रखा गया। ऐसा करके कांग्रेस ने शिवराज की कोशिशों पर पानी फेर दिया और चुनावी घमासान किसी भी स्तर पर दिग्विजय सिंह जी बनाम भाजपा नही हो पाया। हालांकि दिग्विजय सिंह जी ही कांग्रेस की सरकार बनाने वाले प्रमुख रणनीतिकार थे।
आज मध्यप्रदेश में पूर्ण बहुमत की कांग्रेस की सरकार बनी है तो उस जीत के असल शिल्पकार दिग्विजय सिंह जी ही हैं। 72 वर्ष की उम्र में उन्होंने पूरा प्रदेश पैदल और गाड़ियों से नाप दिया। उन्होंने प्रदेश के हर कार्यकर्ताओं और नेताओं से बात करने में किंचित मात्र भी परहेज़ नही किया। दिग्विजय सिंह जी ने  सभी काँग्रेस जनों को दो टूक शब्दों में एक ही बात समझाई कि अब ये लड़ाई वर्चस्व की नही अस्तित्व की है। उनके अथक प्रयासों से सभी नेतागण एक मंच पर आ गए।  सभी कांग्रेस नेताओं की केमेस्ट्री से विपक्ष के होश उड़ गए। नेता गण जितने एकजुट दिख रहे थे उतने ही आत्म विश्वास से भरे हुए थे। ये कहना ही सर्वथा उचित होगा कि कांग्रेस की जीत संगठन की जीत है, एकता और अखंडता की जीत है। कांग्रेस के हर एक कार्यकर्ता की जीत है। ये जीत प्रदेश की सवा सात करोड़ जनता की जीत है जो मध्यप्रदेश के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए उद्वेलित थी। सर्वजन हिताय व सर्व जन सुखाय की भावना के साथ उन्नति का एक नया सूरज उगेगा और मध्यप्रदेश का हर एक नागरिक प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा।

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