अब आदिवासी एवं दलित होंगे निर्णायक – ललित गर्ग

6:44 pm or December 29, 2018
dalit-protests-1280

अब आदिवासी एवं दलित होंगे निर्णायक 

– ललित गर्ग
आगामी लोकसभा चुनावों में आदिवासी एवं दलित की निर्णायक भूमिका होगी, इस बात का संकेत हाल ही में सम्पन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखने को मिला है। कांग्रेस की जीत में दलित-आदिवासी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका बनी है, जबकि भाजपा को इन समुदायों ने आंख दिखायी है। बातों से एवं लुभावने आश्वासनों से ये समुदाय वश में आने वाले नहीं है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों की नाराजगी को नजरअंदाज करने के कारण इन तीनों ही राज्यों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। लोकसभा चुनावों में दलित और आदिवासी समाज की नाराजगी की अनदेखी करना हार का सबब बन सकता है। 
भाजपा सरकार को अपने कार्यक्रमों में व्यापक बदलाव करते हुए आदिवासी एवं दलित समुदाय के लिये नये कार्यक्रम घोषित करने होंगे। इन समुदायों के सांसदों एवं विधायकों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देनी होगी। ताकि इन समुदायों मेें एक सकारात्मक सन्देश जाये कि सरकार को उनकी एवं उनके प्रतिनिधियों की फ्रिक है। पांच राज्यों के चुनाव के दौरान इस दृष्टि से कुछ लापरवाही हुई है।  समग्र देश के आदिवासी समुदाय का नेतृत्व करने वाले गुजरात के आदिवासी समुदाय के संत गणि राजेन्द्र विजयजी आदिवासी अस्तित्व एवं अस्मिता के मुद्दे पर सत्याग्रह कर रहे थे। अनेक कांग्रेसी एवं भाजपा के आदिवासी नेता भी उनके साथ खड़े थे। लेकिन विधानसभा चुनाव के दौरान हुए इस सत्याग्रह पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। भाजपा के सांसद श्री मनसुख वसावा एवं श्री रामसिंह भाई राठवा भी अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे थे। जबकि हाल ही में कांग्रेस से राज्यसभा में निर्वाचित हुए छोटा उदयपुर क्षेत्र के नारणभाई राठवा को पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों में चुनाव प्रचार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, यही कारण है कि उन्होंने अपने समुदाय के लोगों का दिल जीत कर इन तीनों ही राज्यों में चुनावी समीकरण को बदला है। गुजरात के आदिवासी जनजाति से जुड़े राठवा समुदाय में उनको आदिवासी न मानने को लेकर गहरा आक्रोश है वहीं असंवैधाानिक एवं गलत आधार पर गैर-आदिवासी को आदिवासी सूची में शामिल किये जाने एवं उन्हें लाभ पहुंचाने की गुजरात की वर्तमान एवं पूर्व सरकारों की नीतियों का विरोध के बावजूद केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार की उदासीनता ने भाजपा के आदिवासी वोटों की दिशा को बदल दिया है।  इन विकराल होती संघर्ष की स्थितियों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह न केवल गुजरात सरकार बल्कि केन्द्र सरकार के लिये आगामी लोकसभा चुनाव में एक बड़ी चुनौती बन सकता है। 
2014 में भाजपा की शानदार जीत का कारण ये आदिवासी एवं दलित ही बने थे। उस समय लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने विरोधियों के मुकाबले लगभग नौ फीसद की बढ़त मिली थी, जिसमें से लगभग 4.5 फीसद की बढ़त दलितों, आदिवासियों के कारण थी। तब भाजपा को अपेक्षा से अधिक सीटें मिलने का यह बहुत बड़ा कारण था। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों के विधानसभाओं में भाजपा को उस अनुपात में दलित-आदिवासियों के वोट नहीं मिले। जाहिर है कि पार्टी से कहीं न कहीं चूक जरूर हुई, जिसकी वजह से दलितों-आदिवासियों ने उसका साथ छोड़ा।
हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में आदिवासी-दलित समाज की नाराजगी का साफ असर दिखाई दिया। अन्यथा भाजपा जिस शानदार जीत का दावा कर रही थी, वह संभव हो सकता था। हर बार चुनाव के समय आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति इस बार असरकारक नहीं रही। क्योंकि आदिवासी-दलित समाज बार-बार ठगे जाने के लिए तैयार नहीं है। देश में कुल आबादी का 11 प्रतिशत आदिवासी है, जिनका वोट प्रतिशत लगभग 23  हैं। क्योंकि यह समुदाय बढ़-चढ़ का वोट देता है। बावजूद देश का आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात हो गई। भाजपा सरकार वास्तव में आदिवासी समुदाय का विकास चाहती हैं और ‘आखिरी व्यक्ति’ तक लाभ पहुँचाने की मंशा रखती हैं तो आदिवासी हित और उनकी समस्याओं को हल करने की बात पहले करनी होगी। 
आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम चल रहे हैं जिनमें अनेक राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास कर रहे हैं। ऐसी ही कुचेष्टाओं  में जबरन गैर-आदिवासी को आदिवासी बनाने के घृणित उपक्रम को नहीं रोका गया तो आदिवासी समाज खण्ड-खण्ड हो जाएगा। आदिवासी के उज्ज्वल एवं समृद्ध चरित्र को धुंधलाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को राजनीतिक नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। तेजी से बढ़ते आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने का यह बिखरावमूलक दौर भाजपा के लिये गंभीर समस्या बन सकता है। 
आजादी के सात दशक बाद भी देश के आदिवासी-दलित उपेक्षित, शोषित और पीड़ित नजर आते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ और नेता आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते। आज इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है, इस पर कोई ठोस आश्वासन इन निर्वाचित सरकारों से मिलना चाहिए, वह भी मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अक्सर आदिवासियों-दलितों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने वाली बातों को हवा देना एक परम्परा बन गयी है। इस परम्परा को बदले बिना देश को वास्तविक उन्नति की ओर अग्रसर नहीं किया जा सकता। देश के विकास में आदिवासियों-दलितों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थाें में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है और इसी जरूरत को पूरा करने वाले दल आगामी लोकसभा चुनाव में सफलता हासिल करेंगे। 
आदिवासी-दलित समुदाय ने 2014 में कांग्रेस का साथ इसलिए छोड़ा था कि उन्हें लगा था कि उनकी उपेक्षा हो रही है और पार्टी उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है। लिहाजा वे भाजपा के साथ जुड़े। उनके भाजपा से जुड़ने का एक अन्य कारण यह भी था कि नरेंद्र मोदी पिछड़े समाज से आते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि हाल के दिनों में दलितों और आदिवासियों में मान-सम्मान एवं सत्ता में भागीदारी को लेकर महत्वाकांक्षा बढ़ी है। यह केवल अधिकारों को लेकर ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सामाजिक-राजनीति के स्तर पर नेतृत्व को लेकर भी है। ऐसे में अगर उन्हें लगता है कि उनका नेता उनके अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा रहा है तो फिर उस नेता और उस पार्टी से उनकी विरक्ति भी हो जाती है। अब दलितों- आदिवासियों के घर पर भोजन करना और उनके महापुरुषों के स्मारक इत्यादि बनाना ही काफी नहीं रह गया है। वे केवल इतने से ही संतुष्ट नहीं होने वाले। उन्हें पर्याप्त मान-सम्मान और वास्तविक राजनीतिक भागीदारी भी देनी होगी। अब राजनीतिक दलों को अपने मन से यह गलतफहमी निकाल देनी चाहिए कि दलितों को आसानी से लुभाया जा सकता है। राजनीतिक दल विशेष से नाराजगी की स्थिति में दलितों आदिवासियों का वोट निर्णायक हो जाता है। राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में 36 में से 32 सीटों पर भाजपा के दलित उम्मीदवार जीते थे और इस बार केवल 11 पर इनकी जीत हासिल हुई। इसी तरह इस बार 25 में से 9 आदिवासी जीते हैं, जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में 18 आदिवासी उम्मीदवार जीते थे। यह स्थिति भाजपा की इन समुदायों के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है, वहीं कांग्रेस के नाराणभाई राठवा के प्रयासों ने राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासी वोटों की मानसिकता को बदलने में निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया है। क्योंकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में दलितों और आदिवासियों के अच्छे-खासे वोट हैं और वे वोट भी जमकर देते हैं। इसी कारण चुनावों में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाती है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से कई जगहों पर पिछड़े और मुस्लिम समाज का वोट निर्णायक होता है। स्पष्ट है कि जिस तरह अन्य जातियों की नाराजगी को राजनीतिक दल गंभीरता से लेते हैं, वैसे ही दलितों और आदिवासियों की नाराजगी की परवाह करने की जरूरत है। जिस प्रांत से प्रधानमंत्री एवं भाजपा अध्यक्ष आते हो, उस प्रांत में आदिवासी समुदाय की उपेक्षा और उनकी स्थिति डांवाडोल होना एक गंभीर चुनौती है।
आदिवासी जन-जाति के साथ हो रहा सत्ता का उपेक्षापूर्ण व्यवहार गुजरात के समृद्ध एवं विकसित राज्य के तगमे पर एक प्रश्नचिन्ह है। यह कैसी समृद्धि है और यह कैसा विकास है जिसमें आदिवासी अब भी समाज की मुख्य धारा से कटे नजर आते हैं। यह कैसा राजनीतिक समीकरण है जिसमें जीत की दिशा तय करने वाले समुदायों की ही घोर उपेक्षा हो रही है। लोकसभा चुनाव के परिणामों में आदिवासियों एवं दलितों की निर्णायक भूमिका बनने वाली है, इसलिये राजनीतिक दलों को इन समुदायों के प्रति अपनी सोच को बदलना ही होगा।
Tagged with:     , , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in