अलविदा वैक्सीन ! स्वागत गोमूत्र !! – सुभाष गाताडे

3:53 pm or January 3, 2019
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अलविदा वैक्सीन ! स्वागत गोमूत्र !!

  • सुभाष गाताडे

काज़ी जैनुस साजिदीन, जो मेरठ के शहर काज़ी हैं, उनके कंधों पर इन दिनों एक नयी जिम्मेदारी आ पड़ी है।

कोईभी शख्स – जो उनकी तकरीरों को इन दिनों सुनता है, वह इस बात से अचरज में पड़ जाता है कि वह आखिर में वैक्सिनेशन की अहमियत पर जोर देते हैं और बताते हैं कि किस तरह वक्त़ पर टीकाकरण करने से बच्चों की जिन्दगियां बच सकती हैं।

वैसे काज़ीसाब अकेले मौलाना नहीं हैं जो आंशिक तौर पर एक नया अवतार धारण किए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में ऐसे कई हैं, जिन्होंने इलाके के सत्तर से अधिक मदरसाओं द्वारा लिए गए इस निर्णय की मुखालिफत की है, जिसके तहत उन्होंने अपने यहां अध्ययनरत बच्चों को टीकाकरण से बचने की सलाह दी है। ‘वॉटसअप युनिवर्सिटी’ पर सक्रिय कुछ मूलवादियों ने यह अफवाह फैला दी है कि खसरा, गलसुआ और रूबेला को रोकने के लिए जो एमएमआर टीका दिया जाता है, वह बच्चों को नपुंसक बना सकता है। कई मदरसों ने बाकायदा माता पिताओं को सलाह दी है कि अगले कुछ दिनों तक अपनी सन्तानों को वहां न भेजें ताकि इस काम के लिए निकले स्वास्थ्य अधिकारियों को बेरंग लौटा दिया जाए।

दिलचस्प है कि इलाके के वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जगह जगह जाकर की मुलाकातों का सकारात्मक असर पड़ा है, जिन्होंने काज़ीसाब जैसे लोगों को जाकर समझाया है कि टीकाकरण न करने से बच्चों के स्वास्थ्य पर किस कदर विपरीत असर पड़ सकता है, कितना प्राणघातक हो सकता है। गौरतलब है कि सरकार की अपनी रिपोर्टें बताती हैं कि वर्ष 2015 में 49,000 बच्च अत्यधिक संक्रमणकारी खसरे की बीमारी से मर गए जो खांसने और छींकने से फैलती है। और अगर वक्त़ पर टीकाकरण किया जाए तो इस अनहोनी को रोका जा सकता है।

अनौपचारिक बातचीत में काज़ीसाब लोगों को बताते हैं कि किस तरह वैश्विक स्तर पर उलेमा संगठनों ने यह बताया है कि यह मुसलमानों का फर्ज है कि वह अपने बच्चों का टीकाकरण करवायें। इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण जानकारी वह देना नहीं भूलते कि कुवैत में एक सेमिनार हुआ था /1995/ जिसका आयोजन इस्लामिक आर्गनायजेशन आफ मेडिकल साईसेंस ने किया था, जिसमें चोटी के 100 इस्लामिक विद्वान शामिल हुए थे, जिन्होंने यह ऐलान किया था कि टीके में जिस जिलेटिन का इस्तेमाल होता है वह पर्याप्त शुद्धिक्रत होता है। (https://www.dnaindia.com/india/report-freaked-out-by-whatsapp-rumours-madrassas-in-western-uttar-pradesh-block-vaccination-drive-2698733)

फिलवक्त इस बात का आकलन करना मुश्किल है कि काज़ीसाहब जैसे लोगों की बातों का प्रभाव कितना हो रहा है। दरअसल इसका आकलन करने के लिए कुछ साल चाहिए जब हम देखें कि खसरे की बीमारी के मामले स्थिर बने हुए हैं या वहां पर अचानक बीमारियों के मामलों में उछाल आया है।

निश्चित ही यह कोई पहली मर्तबा नहीं है कि हम लोगों ने अल्पसंख्यकबहुल इलाकों में टीकाकरण के लिए विरोध की बात सुनी है। टीकाकरण के जरिए मुसलमानों को कथित तौर पर नपुंसक बनाने के ‘पश्चिमी षडयंत्रों’ के बारे में पहले भी चर्चा होती रही है। इस पूरी बहस में गनीमत यही है कि यहां स्वास्थ्य कार्यकर्ता सुरक्षित हैं और उन्हें उस तरह धमकियों, प्रताडनाओं का सामना नहीं करना पड़ता, जैसे कि पड़ोसी मुल्क में करना पड़ता है।

मालूम हो कि पड़ोसी पाकिस्तान में स्वास्थ्य कार्यकर्ता और उनके सहयोगियों को अधिक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। टीकाकरण के माध्यम से ‘पश्चिमी दुनिया के कथित षडयंत्रा’ को माननेवाली ऐसे संगठन, ऐसी तंजीमें वहां इतना दबदबा रखती हैं कि तालिबानों एवं समविचारी अन्य इस्लामिस्ट संगठनों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं दिखती कि टीकाकरण के काम में मुब्तिला लोगों को मौत के घाट उतार दें। कई अतिवादी संगठनों ने ऐसी अफवाहें फैलायी हैं कि टीकाकरण अभियान दरअसल मुसलमानों को नपुंसक बनान तथा उनके खिलाफ जासूसी करने के हिस्से के तौर पर चलाए जा रहे हैं। पोलियो टीकाकरण के काम में मुब्तिला टीमों पर सरहद प्रांतां में हमले आम बात हैं।

मिसाल के तौर पर, मार्च महिने में /2018/ मिलिटेण्टों ने पाकिस्तान के जनजातीय इलाके – जो अफगाणिस्तान से सटा है -में स्थित सफी तहसील में पोलियो की टीम पर हमला कर दो कर्मचारियों को मार डाला और तीन का अपहरण किया। (https://www.thehindu.com/news/international/two-polio-workers-killed-three-abducted-by-militants-in-pakistan/article23284575.ece) डेढ साल पहले की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘दिसम्बर 2012 के बाद सौ से अधिक लोग ऐसे हमलों में मारे गए हैं।’  (https://www.hindustantimes.com/world-news/polio-worker-shot-dead-in-pakistan-over-100-killed-since-december-2012/story-7nt0hXxatmuGNwrFe2wCsJ.html)

अग्रणी भौतिकीविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हुदभॉय ने कुछ साल पहले – जबकि पेशावर के मिलिटरी स्कूल में तालिबानी मिलिटेण्टों ने 132 बच्चों को मार डाला था – पाकिस्तान के हालात पर बेहद चिन्ता प्रगट करते हुए लिखा था :

अगर पाकिस्तान की कोई्र सामूहिक विवेकबुद्धि होती तो एक अदद तथ्य उसे शीतनिद्रा से जगा देता : अतिवादियों के हाथां 60 से अधिक पोलियो कर्मी की हत्या – ऐसी महिलाएं एवं पुरूष जो विकलांग कर देने वाली एक बीमारी से बच्चों को बचाने के लिए सक्रिय थे।

इसी के चलते हम उस भयानक द्रश्य से रूबरू होते हैं : वक्त वक्त पर, पाकिस्तान में ऐसी तबाहियां मचती रहेंगी। ..इसका एकमात्रा समाधान है मानसिकता में बदलाव। (https://www.dawn.com/news/1151930)

रिपोर्टें बताती हैं कि टीकों के प्रति विरोध महज पाकिस्तान एवं भारत के अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है।

कुछ माह पहले इंडोनेशियाई उलेमा कौन्सिल ने एमएमआर वैक्सिन के खिलाफ फतवा जारी किया। यह इस संदेह के आधार पर किया गया कि टीके में सूअर के शरीर से निकले जिलेटिन को इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने भारत की सिरम इन्स्टिटयूट आफ इंडिया को – जो टीकों के आपूर्ति करते हैं – लिखा कि वे सूअर के शरीर से निकले जिलेटिन को इस्तेमाल न करें। ; (https://www.dnaindia.com/india/report-freaked-out-by-whatsapp-rumours-madrassas-in-western-uttar-pradesh-block-vaccination-drive-2698733)

शायद अब इस मोर्चे पर नए ‘खिलाड़ी’ हैं यूरोप के दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादियों में मौजूद टीकाकरण विरोधी समूह। हालत यह है कि सोशल मीडिया और दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादियों द्वारा बढ़ावा दी जा रही टीका विरोधी आन्दोलन अब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच भी चिन्ता का सबब बना है। यह अकारण नहीं था कि विगत साल खसरे की बीमारी में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखी गयी, जैसी बीते बीस सालों में नहीं दिखी थी। (https://www.theguardian.com/world/2018/dec/21/measles-cases-at-highest-for-20-years-in-europe-as-anti-vaccine-movement-grows) उपरोक्त अख़बार द्वारा ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि 2017 की तुलना में 2018 में खसरे के मामले दुगुना बढ़े और जो इस साल 60 हजार तक पहुंच जाएंगे। खसरे के चलते होने वाली मौतों में भी दुगुना बढ़ोत्तरी हुई है। इस साल अब तक 72 मौतें हो चुकी हैं।

अख़बार के मुताबिक

लोकरंजक दक्षिणपंथी राजनेता – अमेरिका से इटली, पोलेण्ड और फ्रांस तक – टीकाकरण विरोधी मुहिम में जुट  गए हैं, और वह सन्देहवादियों को समर्थन देते दिख रहे हैं और अपनी सन्तानों के टीकाकरण करने के नियमों के विरोध में माता पिता के अधिकार की हिमायत कर रहे हैं, जो टीकाकरण नहीं चाहते हैं।

टीकाकरण के विरोधियों द्वारा जिन तर्कों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह बेहद सरलीक्रत है। यह दावा करते हुए कि वह वैश्वीकरण के विरोधी हैं और मुनाफाखोर बहुदेशीय कम्पनियों की मुखालिफत करते हैं, वह दरअसल ‘फेक न्यूज’ का शिकार होते दिख रहे हैं जिनमें यह दावा किया  है कि यह कम्पनियां आबादी में वायरस/ विषाणु फैला रही हैं ताकि उनके वैक्सिन बिक सकें। मालूम हो कि इटली में सत्तासीन फाईव स्टार मूवमेण्ट – जो व्यवस्थाविरोधी समझा जाता है – और उसकी धुर दक्षिणपंथी सहयोगी पार्टी को कोई संकोच नहीं हुआ जब उसने मुल्क के तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञों की पूरी अग्रणी कमेटी को ही बरखास्त किया।

एक अध्येता के मुताबिक, लोकरंजकवादियों/पाप्युलिस्टों और वैक्सिनविरोधियों के बीच एक दिलचस्प समानता दिखती है, दोनों ‘‘ऑथॉरिटीज यहां तक वैज्ञानिक चिन्तन पर यकीन नहीं करते हैं।’’

अब अगर काज़ीसाब के मुल्क भारत लौटें, यहां हालांकि बहुसंख्यक समुदाय ने अलग अलग कामों के लिए वैक्सिन/टीकों को स्वीकारा है, अब जहां तक ‘‘वैज्ञानिक विशेषज्ञों’’ की बातों को स्वीकारने या उनकी सलाहों को स्वीकारने की बात है, तो उसका रेकार्ड बेहद ख़राब दिखता है। केन्द्र में हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों के उभार के बाद दरअसल छदमविज्ञान को नयी वैधता प्रदान करने की उनकी कोशिशें तेज हो चली हैं (https://thewire.in/the-sciences/the-modi-governments-pseudoscience-drive-is-more-than-an-attack-on-science), अहम मिसाल है ‘काउपैथी’ या ‘गोविज्ञान’ का आगमन। गोविज्ञान अनुसंधान की अग्रणी शाखा के तौर पर उभरा है, जहां गोमूत्रा की तमाम चमत्कारी गुणधर्मों के बारे में आए दिन नए नए दावे प्रस्तुत होते रहते हैं, जैसे कि गोमूत्रा से बनी दवाओं से कैन्सर का इलाज (https://timesofindia.indiatimes.com/india/cow-urine-can-cure-cancer-gujarat-team/articleshow/64833781.cms) और यह इस हक़ीकत के बावजूद कि ‘‘गोमूत्रा मनुष्य मूत्रा से खास अलग नहीं होता। उसमें अधिकतर पानी /95 फीसदी/ तथा इसके अलावा सोडियम, पोटाशियम, फास्फोरस, क्रिटीनिन और एपिथेलियल सेल्स होते हैं। इनमें से किसी में भी कैन्सरविरोधी प्रभाव नहीं होता। (https://www.news18.com/news/buzz/can-cow-urine-really-cure-cancer-this-is-what-oncologists-told-us-1799607.html)

अभी पिछले साल की ही बात है जब एक राष्टीय अभियान समिति बनायी गयी ताकि पंचगव्य की वैज्ञानिक वैधता प्रमाणित की जा सके। गाय के उत्सर्जन से निकलनेवाले पदार्थों में सबसे महत्वपूर्ण पंचगव्य समझा जाता है। उसमें गाय के पांच उत्पाद शामिल होते हैं : दही, घी, दूध, गोबर और मूत्रा। (https://thewire.in/science/panchgavya-svarop-iit-csir-cow-urine)

वैसे गोमूत्रा और गाय के उत्सर्जनों के बारे में विस्त्रत चर्चा फिर कभी।

 

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